कर्मचारी के प्रमोशन में एडहॉक सेवा को दरकिनार नहीं कर सकते, इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रोन्नति पर बड़ा फैसला

एडहॉक सेवा से जुड़ा एक मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा. जिसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को नियमित किए जाने के बाद प्रमोशन के लिए पात्रता निर्धारित करते समय उसकी एडहॉक सेवा को अवश्य गिना जाना चाहिए.

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"प्रमोशन पर विचार करते समय ad hoc सेवा नहीं की जा सकती नजरअंदाज"

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को कहा कि कर्मचारियों की प्रमोशन पर विचार करते समय उसकी एडहॉक सेवाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी की नियुक्ति एक कानूनी प्रक्रिया के जरिए की गई हो और कर्मचारी ने निरंतर सेवा दी हो, तो प्रमोशन पर विचार करते समय उसकी एडहॉक सेवाओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. बता दें कि एडहॉक सेवा आमतौर पर एक टेम्पररी या ऑन-डिमांड रोल होती है, जो किसी खास, तुरंत के मकसद के लिए होती है.

न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार की दो विशेष अपीलों को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी और याचिकाकर्ताओं के पक्ष में पूर्व के आदेश को सही ठहराया. अदालत ने कहा कि कर्मचारी को नियमित किए जाने के बाद प्रमोशन के लिए पात्रता निर्धारित करते समय उसकी एडहॉक सेवा को अवश्य गिना जाना चाहिए. यदि कनिष्ठ कर्मचारी को पहले ही प्रमोट किया जा चुका है, तो एक वरिष्ठ कर्मचारी उसी तिथि से प्रमोशन पाने का हकदार होगा, भले ही उसे बाद में नियमित किया गया हो.

'ad hoc' शब्द का अर्थ 'for a particular purpose' मतलब 'किसी विशेष कार्य हेतु' होता है. कई समय से ad hoc नियुक्ति बहुत चलन में है. अगर स्थाई नियुक्ति की प्रक्रिया में किसी कारण से देरी हो रही होती है, तब उस पद पर 'ad hoc' नियुक्ति की जाती है. आगे जाकर ये नियुक्ति पक्की भी हो जाती है.

क्या है पूरा मामला

यह मामला अनिल कुमार और शैलेंद्र सिंह नाम के व्यक्तियों से जुड़ा है. जिन्हें 1986 में आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में एडहॉक आधार पर जूनियर इंजीनियर के तौर पर नियुक्त किया गया था और बाद में नियमित किया गया. विवाद तब शुरू हुआ जब इन व्यक्तियों की नियुक्ति के बाद नियुक्त हुए कर्मचारियों को 18 जनवरी, 1995 से सहायक अभियंता के पद पर प्रमोट कर दिया गया, जबकि इन याचिकाकर्ताओं को प्रमोशन का लाभ देने से मना कर दिया गया.

इससे पूर्व, एकल न्यायाधीश की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को राहत दी थी जिसे चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने दलील दी कि चूंकि याचिकाकर्ता उस समय नियमित कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उन्हें पिछली तिथि से प्रोन्नति नहीं दी गई. इस दलील को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को प्रोन्नति का लाभ देने से मना करना अन्याय होगा.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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