Jammu and Kashmir News: जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में नियंत्रण रेखा (LoC) के बिल्कुल करीब बसे आखिरी गांव में एक अद्भुत नजारा देखने को मिला. बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर ऐतिहासिक लोहार देवता मंदिर में भव्य हवन और भंडारे का आयोजन किया गया. यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना बल्कि सीमा पर सांप्रदायिक एकता की एक मिसाल भी पेश की.
अधिकारियों ने मांगी शांति और खुशहाली की दुआ
इस पवित्र समारोह में प्रशासन और सेना के बड़े अधिकारियों ने शिरकत की. उपायुक्त अशोक कुमार शर्मा, 10 ब्रिगेड के कमांडर अमित और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अजय कुमार ने विशेष रूप से पहुंचकर पूजा-अर्चना की. सभी ने प्रदेश में शांति, समृद्धि और आपसी भाईचारे के लिए प्रार्थना की.
विभाजन की टीस और मंदिर का पुनरुद्धार
लोहार देवता मंदिर का इतिहास काफी गहरा है. बंटवारे से पहले रावलकोट, बाग और सुधनुती जैसे इलाकों से हजारों श्रद्धालु यहां आते थे. विभाजन के बाद यह इलाका बेहद संवेदनशील हो गया और मंदिर कई सालों तक उपेक्षित रहा. 1990 के दशक में पुंछ नगर समिति के पूर्व मेयर राजिंदर सिंह के संकल्प से मंदिर की खोई हुई रौनक वापस लौटी. उनके प्रयासों से मंदिर का नवीनीकरण हुआ और तब से हर साल यहां बुद्ध पूर्णिमा पर भव्य मेला लगता है.
सांप्रदायिक भाईचारे की अनोखी मिसाल
यह मंदिर आज पुंछ में भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक है. जहां एक तरफ हिंदू और सिख श्रद्धालु जम्मू, हरियाणा और दिल्ली से अपने 'कुल देवता' के दर्शन करने आते हैं वहीं दूसरी ओर स्थानीय मुस्लिम समुदाय साल भर इस मंदिर की सुरक्षा और देखरेख करता है. इस अवसर पर पीर पंजाल अवामी विकास मंच के अध्यक्ष मोहम्मद फरीद मलिक और पूर्व DDC सदस्य इमरान ज़फ़र ने भी शामिल होकर एकता का संदेश दिया.
परंपराएं और चमत्कारिक झरना
मंदिर परिसर में लोग अपने बच्चों का मुंडन करवाने और नवविवाहित जोड़े सुखी जीवन का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं. मंदिर की एक और खासियत यहां की प्राकृतिक जलधारा है. सूखे के समय भी यह झरना कभी नहीं सूखता और पूरे गांव की प्यास बुझाता है.














