भारत की 'ब्रह्मोस' का लोहा मान रही दुनिया, फिलीपींस के बाद अब इंडोनेशिया खरीदेगा ये मिसाइल

फिलीपींस के बाद अब इंडोनेशिया भी भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम खरीदने जा रहा है. यह डील लगभग 300 मिलियन डॉलर की है और दिसंबर 2025 में समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं.

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  • इंडोनेशिया ने भारत से लगभग 300 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल खरीदने का समझौता किया है.
  • भारत अगले 36 महीनों में इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की तीन बैटरियां सौंपेगा.
  • ब्रह्मोस मिसाइल की रेंज लगभग 290 किलोमीटर है और यह सुपरसोनिक गति तथा कम रडार सिग्नेचर वाली है.
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नई दिल्ली:

फिलीपींस के बाद अब इंडोनेशिया भी भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल खरीदने जा रहा है. यह डील लगभग 300 मिलियन डॉलर की बताई जा रही है और दिसंबर 2025 में इसके समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे. इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता रिको रिकार्डो सिरैत ने इस सौदे की पुष्टि की है. यह कदम इंडोनेशिया के व्यापक सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है, खासकर समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए.

समझौते के अनुसार भारत अगले 36 महीनों में इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की तीन बैटरियां सौंपेगा.

दुश्मनों पर जमकर गरजती है ब्रह्मोस

ब्रह्मोस, DRDO और रूस की NPO मशिनोस्ट्रोयेनीय का संयुक्त प्रोजेक्ट है, जो अपनी 290 किलोमीटर रेंज, सुपरसोनिक गति, रैमजेट इंजन, और कम रडार सिग्नेचर के कारण दुनिया की सबसे घातक क्रूज़ मिसाइलों में गिना जाता है. यह तटीय सुरक्षा, समुद्री युद्धपोतों, दुश्मन के ठिकानों और रणनीतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को सटीकता से नष्ट करने की क्षमता रखती है.

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क्यों बढ़ी इंडोनेशिया की जरूरत?

उत्तर नटूना सागर में इंडोनेशिया और चीन के बीच बढ़ता समुद्री तनाव इसकी बड़ी वजह है. चीन का ‘नाइन‑डैश लाइन' दावा इंडोनेशिया के विशेष आर्थिक क्षेत्र से टकराता है. चीन के कोस्ट गार्ड जहाज कई बार इंडोनेशिया की ऊर्जा खोज गतिविधियों में दखल दे चुके हैं. यहां तक कि चीन के युद्धपोतों ने इंडोनेशिया की सरकारी कंपनी पर्टामिना के सर्वे में भी अवरोध पैदा किया.

इसी दबाव ने इंडोनेशिया को अपनी समुद्री रक्षा रणनीति मजबूत करने पर मजबूर किया और ब्रह्मोस उसी कमी को पूरा करता है, क्योंकि इंडोनेशिया के पास इतनी रेंज और क्षमता वाली सतह‑से‑सतह मिसाइल प्रणाली नहीं थी.

भूराजनैतिक महत्व क्यों बड़ा है?

ब्रह्मोस मिसाइल पर अमेरिकी CAATSA प्रतिबंध लागू नहीं होते, क्योंकि इसके कई महत्वपूर्ण हिस्से भारत में बनते हैं. दक्षिण‑पूर्व एशिया में ब्रह्मोस की पकड़ तेजी से बढ़ रही है. फिलीपींस इसे पहले ही इस्तेमाल कर रहा है, वियतनाम भी खरीदने पर विचार कर रहा है.

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ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की सफलता के बाद इसकी प्रतिष्ठा और बढ़ी है, जिससे कई देशों की मांग बढ़ी है. अगर ब्रह्मोस की तैनाती इस क्षेत्र में बढ़ती है, तो यह दक्षिण चीन सागर में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है, जहां कई देशों का चीन से समुद्री विवाद जारी है.

भारत के लिए क्या मतलब?

यह सौदा भारत को एक उभरते रक्षा निर्यातक राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगा. साथ ही, इससे इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र में भारत‑इंडोनेशिया की रणनीतिक साझेदारी मजबूत होगी और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा भी सुदृढ़ होगा. यानी, ब्रह्मोस सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक और सामरिक प्रभाव शक्ति का नया प्रतीक बनता जा रहा है.

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