- संविधान संशोधन बिल संसद में पारित करने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है
- लोकसभा में कुल सदस्यों की संख्या 540 है और संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए कम से कम 360 वोट जरूरी हैं
- राज्यसभा में भी उसी प्रक्रिया के तहत दो तिहाई बहुमत चाहिए, लेकिन वहां सरकार के लिए स्थिति थोड़ी अनुकूल है
सरकार जिन तीन बिलों को संसद में पेश करेगी उनमें से एक 131वां संविधान संशोधन बिल है. संविधान के मुताबिक़ संविधान संशोधन बिल को पारित करवाने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की ज़रूरत पड़ती है. दोनों सदनों में संख्या बल को देखें तो लोकसभा में सरकार के सामने बड़ी चुनौती आने वाली है. जबकि बाक़ी दोनों बिलों को पारित करवाने के लिए केवल 50 फीसदी बहुमत की ज़रूरत पड़ेगी, जो सरकार के पास दोनों सदनों में आसानी से मौजूद है.
दो तिहाई बहुमत की जरूरत
संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक, संविधान में बदलाव से जुड़े बिलों को पारित करवाने के लिए विशेष बहुमत की ज़रूरत होती है. विशेष बहुमत का मतलब होता है सदन की कुल संख्या का बहुमत और वोटिंग कर रहे सदस्यों की दो तिहाई संख्या. उदाहरण के लिए , अभी लोकसभा में सदस्यों की कुल संख्या 540 है, क्योंकि तीन सीट फ़िलहाल रिक्त हैं. इसका मतलब बहुमत का आंकड़ा 271 होता है. अगर हम मान लें कि सभी सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेंगे, तो किसी संविधान संशोधन बिल को पारित करवाने के लिए कम से कम 360 सांसदों के वोटों की ज़रूरत होगी. क्योंकि 540 का दो तिहाई 360 होता है. इसका मतलब, इस बिल को पारित करवाने के लिए कम से कम 271 और अधिकतम 360 वोटों की ज़रूरत पड़ेगी. यही प्रक्रिया राज्य सभा में भी अपनाई जाती है. हालांकि लोकसभा की तुलना में राज्यसभा के आंकड़े थोड़े सरकार के पक्ष में दिखाई देते हैं.
बिल पारित करवाने के लिए 320 वोटों की ज़रूरत
वैसे सबकुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वोटिंग वाले दिन कितने सांसद वोट करते हैं. उदाहरण के लिए , अगर 480 सांसद ही वोट करते हैं तो बिल को पारित करवाने के लिए 320 वोटों की ही ज़रूरत पड़ेगी. माना जा रहा है कि केंद्र सरकार के विरोध में होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस महिला आरक्षण बिल के पक्ष में है. वहीं बंगाल में चुनाव में अब आ गया है. लिहाज़ा लोकसभा में पार्टी के सभी 28 सांसद वोटिंग में मौजूद नहीं रहेंगे. इसी तरह चुनाव के चलते डीएमके के भी सभी सांसदों के मौजूद रहने पर भी सवाल है, जबकि पार्टी तीन बिलों में से एक परिसीमन बिल के बिल्कुल खिलाफ़ है.
एनडीए और इंडिया गठबंधन में कितने सदस्य?
संख्या बल को देखें तो लोकसभा में एनडीए के घटक दलों के सांसदों की संख्या 292 है, जबकि कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन के सदस्यों की संख्या 231 है. जबकि 17 सदस्य ऐसे हैं जो दोनों में से किसी गठबंधन में शामिल नहीं हैं. यानि लोकसभा में अगर 450 से ज़्यादा सदस्यों ने वोट किया तो सरकार को दूसरी पारियों के समर्थन की भी ज़रूरत पड़ेगी.
विपक्ष के सामने बिल के विरोध का जोखिम
हालांकि सरकार के सूत्रों का कहना है कि तीनों बिलों के स्वरूप को देखते हुए कोई भी राजनीतिक दल इनका विरोध एक सीमा से आगे नहीं कर पाएगा और उसे उनका समर्थन करना पड़ेगा. सूत्रों का कहना है कि महिलाओं के आरक्षण का विरोध करने का जोख़िम कोई भी पार्टी नहीं उठा सकती, इसलिए तमाम विरोध के बावजूद विपक्ष के भी कई घटक दल संविधान संशोधन बिल के साथ ही तीनों बिलों का समर्थन करेंगे और बिल पारित हो जाएंगे.













