खरगे की चिट्ठी, समाजवादी, आरजेडी के हस्ताक्षर, फिलहाल टल गया महिला आरक्षण से जुड़ा बिल?

महिला आरक्षण से जुड़े बिल को लेकर सरकार ने फिलहाल कदम पीछे खींच लिए हैं. खरगे की चिट्ठी और विपक्षी दलों के हस्ताक्षरों के बाद बजट सत्र में बिल लाने की संभावना कम दिख रही है, अब विशेष या मानसून सत्र विकल्प बन सकता है.

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  • सरकार महिला आरक्षण बिल को बजट सत्र में लाने पर विचार नहीं कर रही है, विशेष सत्र बुलाने का विकल्प देख रही है
  • विपक्षी दल सर्वदलीय बैठक की मांग कर रहे हैं ताकि महिला आरक्षण बिल पर विस्तार से चर्चा हो सके
  • महिला आरक्षण बिल के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा
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नई दिल्ली:

महिला आरक्षण से जुड़े बिल को सरकार मौजूदा बजट सत्र में लाने पर फिलहाल विचार नहीं कर रही है. संसद की कार्य मंत्रणा समिति (BAC) की बैठक में सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि महिला आरक्षण बिल के लिए एक विशेष सत्र बुलाया जा सकता है या फिर इसे मानसून सत्र में लाने पर भी विचार किया जा सकता है. बीएसी की बैठक में जिन 4 विधेयकों की सूची दी गई है, उसमें महिला आरक्षण से जुड़ा बिल शामिल नहीं है. सूत्रों के मुताबिक सरकार इस बजट सत्र के बाद एक छोटा ब्रेक लेने और उसके बाद हफ्ते भर के भीतर संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस बिल को पास कराने के विकल्प पर भी विचार कर रही है.

सर्वदलीय बैठक की मांग के बाद बदला रुख

महिला आरक्षण से जुड़े बिल को लेकर यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार को एक पत्र लिखकर इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी. अपने पत्र में खरगे ने यह भी कहा था कि सरकार इस बिल को लेकर क्या करना चाहती है, इस पर चर्चा जरूरी है. खरगे के इस पत्र पर समाजवादी पार्टी, डीएमके, वाम दल, आरजेडी समेत सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने हस्ताक्षर किए हैं. हालांकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इस बिल से अपने आप को अलग रखा है.

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जल्दबाजी के खिलाफ विपक्ष

दरअसल विपक्षी दलों की मांग है कि विधानसभा चुनाव के बाद महिला आरक्षण से जुड़े बिल पर बैठक बुलाई जाए. इस मुद्दे पर मल्लिकार्जुन खरगे और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के बीच बातचीत भी हुई है. विपक्ष का मानना है कि सरकार को इस बिल पर किसी तरह की कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. विपक्ष को ये भी आशंका है कि सरकार महिला आरक्षण बिल को बंगाल चुनाव को ध्यान में रखकर ला रही है, ताकि चुनाव में महिलाओं की भागीदारी को बड़ा मुद्दा बनाया जा सके और ममता बनर्जी के महिला कार्ड की काट के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा सके.

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दो‑तिहाई बहुमत की जरूरत

विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण से जुड़े बिल में संशोधन संविधान संशोधन के दायरे में आता है, जिसके लिए संसद में दो‑तिहाई बहुमत की जरूरत होगी. मौजूदा लोकसभा में विपक्ष के समर्थन के बिना यह संभव नहीं है, इसलिए सरकार को उन्हें विश्वास में लेना चाहिए.

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संशोधन में क्या प्रस्ताव था

सरकार इस सत्र में महिला आरक्षण कानून में संशोधन लाना चाहती थी. प्रस्तावित संशोधन के तहत लोकसभा और विधानसभा में महिला सांसदों और विधायकों की संख्या एक‑तिहाई करने की बात है. इसके तहत लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़कर 816 हो सकती है, जिसमें महिला सांसदों के लिए कुल 273 सीटें आरक्षित होंगी. सीटों के नए निर्धारण के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने का भी प्रावधान है.

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अमित शाह की विपक्षी दलों से बैठक

इस मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह ने कई विपक्षी और क्षेत्रीय दलों के नेताओं से बैठक भी की थी. इनमें एनसीपी (एसपी), बीजेडी, शिवसेना (उद्धव गुट) और वाईएसआर कांग्रेस के नेता शामिल थे. हालांकि अब सरकार महिला आरक्षण बिल पर फिलहाल दोबारा विचार करने के लिए तैयार नजर आ रही है. यही वजह है कि 29 मार्च को इस बिल के संसद में आने की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है.

क्या है नारी शक्ति वंदन अधिनियम

केंद्र सरकार ने 2023 में महिला आरक्षण के लिए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पास किया था. इसमें लोकसभा और राज्यसभा के साथ-साथ सभी राज्यों की विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है. इससे लोकसभा में सांसदों की संख्या 816 और महिला सांसदों की संख्या 273 हो जाएगी. 2023 में सरकार ने जो 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पास किया था, वह लोकसभा-राज्यसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है. इस कानून में एससी-एसटी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है. उनके लिए आरक्षण के अंदर ही आरक्षण का प्रावधान किया गया है. यानी, एससी-एसटी की महिलाओं को 33% आरक्षण के अंदर ही आरक्षण दिया जाएगा.

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