मोदी सरकार का कोई बिल नहीं गिरा, तो महिला आरक्षण पर कैसे गड़बड़ा गया गणित? समझिए कहां फंसा पेंच

लोकसभा में मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल पास क्यों नहीं करा पाई? ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से संख्या बल नहीं मिल पाया.

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  • महिला आरक्षण बिल को संविधान में संशोधन की आवश्यकता थी, जिसके लिए संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिए था
  • बिल में अगली जनगणना और सीटों के परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू करने की शर्त रखी गई थी
  • विपक्ष ने सरकार पर राजनीतिक साजिश रचने का आरोप लगाया और तुरंत लागू करने की मांग की थी
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लोकसभा में शुक्रवार को सरकार ने महिला आरक्षण यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पेश किया. लेकिन यह बिल दो तिहाई बहुमत ना होने की वजह से गिर गया. मोदी सरकार का यह पहला ऐसा बिल था जिसे वो पास न करा पाए. लेकिन जो बीजेपी हर दांव सोच समझकर रखती है आखिर इस बिल को पास क्यों नहीं करा पाई? ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से संसद में मोदी सरकार का गणित गड़बड़ा गया? आइए समझते हैं.

संख्या बल जुटाना था बेहद मुश्किल

संसद में साधारण बिल पास कराना एक बात है, लेकिन महिला आरक्षण बिल और परिसीमन के लिए संविधान में संशोधन कराना पड़ेगा. संविधान में बदलाव के लिए 'विशेष बहुमत' यानी दो तिहाई वोटों की जरूरत होती है. NDA के पास बहुमत तो है लेकिन दो तिहाई के जादुई आंकड़े का छूने की पावर नहीं है. ऐसे में इस बिल को पास कराने के लिए सरकार को विपक्षी दलों के सहयोग की जरूरत थी, जो कि उन्हें मिल नहीं पाया.

परिसीमन और जनगणना की शर्त

महिला आरक्षण बिल की शर्त में लिखा है कि आरक्षण तभी लागू होगा जब अगली जनगणना और उसके बाद सीटों का 'परिसीमन'होगा. सरकार ने परिसीमन के गणित को भी समझाया. लेकिन विपक्ष इसके लिए राजी नहीं हुआ. कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के दलों ने आरोप लगाया कि सरकार परिसीमन करके एक राजनीतिक साजिश रचने की कोशिश कर रही है. विपक्ष का यह भी तर्क था कि सरकार इसे 2029 या उसके बाद तक टालना चाहती है, जबकि इसे तुरंत लागू किया जा सकता था.

कोटा के भीतर कोटा की मांग

विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण के कोटा के भीतर स्पेशल कोटा की भी मांग की. समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग की. वहीं कांग्रेस ने मांग है कि इस 33% आरक्षण में OBC महिलाओं के लिए अलग से कोटा तय हो और इसे जाति जनगणना से जोड़ा जाए. वहीं सरकार ने साफ किया कि धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान संविधान में नहीं है. इसके अलावा ओबीसी आरक्षण की मांग को भी सरकार ने नहीं माना.

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दक्षिण बनाम उत्तर का नैरेटिव

जब इस बिल पर चर्चा शुरू हुई तो दूसरी ओर से दक्षिण बनाम उत्तर का नैरेटिव भी चलने लगा. दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि अगर परिसीमन जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो उनकी लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी और ज्यादा आबादी वाले उत्तर भारतीय राज्यों का संसद में वर्चस्व बढ़ जाएगा. DMK जैसे विपक्षी दल इसे दक्षिण के खिलाफ साजिश के रूप में पेश कर रहे हैं.

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