राज्यसभा को मिलेगा नया उपसभापति? हरिवंश की वापसी मुश्किल, जेडीयू का नियम आ रहा है आड़े

क्या राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की ऊपरी सदन में वापसी मुश्किल है? दरअसल, देखना दिलचस्प होगा कि क्या जेडीयू हरिवंश को तीसरा राज्यसभा का कार्यकाल देती है.

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राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश (फाइल फोटो)
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  • राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण का कार्यकाल अप्रैल में खत्म हो रहा है
  • देखना दिलचस्प है कि क्या जेडीयू हरिवंश को अपवाद के तहत तीसरा कार्यकाल देगी
  • मौजूदा रणनीति में हरिवंश का संसद के ऊपरी सदन में वापसी मुश्किल दिख रही है
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नई दिल्ली:

इस साल अप्रैल में बिहार की पांच राज्य सभा सीटों पर होने जा रहे चुनाव में कई नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिल सकते हैं. 2018 से राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की राज्य सभा में तीसरी बार वापसी मुश्किल दिख रही है क्योंकि जेडीयू इस बार जातिगत समीकरणों को साधते हुए किसी अन्य नेता को मौका देना चाह रही है.


जेडीयू का नियम आ रहा है आड़े 

हरिवंश अप्रैल 2014 से राज्य सभा के सांसद हैं. उनका दूसरा कार्यकाल इस साल अप्रैल में समाप्त हो रहा है. जेडीयू नेताओं का मानना है कि पार्टी के नियम के अनुसार दो कार्यकाल के बाद तीसरा कार्यकाल अपवाद के रूप में ही दिया जा सकता है. ऐसे में हरिवंश की राज्य सभा में वापसी मुश्किल है. बिहार से राज्य सभा का गणित पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में है. पांच में से चार सीटों पर एनडीए की जीत तय है. इनमें से दो सीटें जेडीयू के खाते में जाएंगी. वर्तमान में जेडीयू के दो सांसद हरिवंश और केंद्रीय राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर हैं. जेडीयू नेताओं के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर को फिर से राज्य सभा दी जा सकती है ताकि अति पिछड़े वर्ग की नुमाइंदगी हो सके। इस तरह वे मोदी सरकार में भी मंत्री के तौर पर बने रहेंगे.

हरिवंश पर लटकी हुई है तलवार 

लेकिन तलवार हरिवंश पर लटकी हुई है। उन्हें राज्य सभा के दो कार्यकाल मिल चुके हैं. इसके अलावा वे 9 अगस्त 2018 को राज्य सभा के उपसभापति भी चुने गए थे और नौ अप्रैल 2020 तक इस पद पर रहे थे. इसके बाद वे 14 सितंबर 2020 को फिर से इस पद पर चुने गए और अभी इस पद पर बने हुए हैं.

जेडीयू से खट्टा-मीठा रिश्ता

हरिवंश नीतीश कुमार के काफी करीबी माने जाते हैं। 2018 में जब उन्हें उपसभापति बनाने का प्रस्ताव बीजेपी की ओर से आया तो नीतीश कुमार ने इसका समर्थन किया. उनके पक्ष में नवीन पटनायक और जगन मोहन रेड्डी से वोट भी मांगे. जेडीयू सूत्रों के अनुसार हरिवंश को यह पद जेडीयू कोटे से नहीं दिया गया था. लेकिन अगस्त 2022 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग हो कर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई तब सबकी नजरें हरिवंश पर लगीं कि वे इस्तीफा देंगे या नहीं. तब उन्होंने संवैधानिक पद पर विराजमान होने का हवाला देकर इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था. इसे लेकर जेडीयू ने आंखें भी तरेरी थी. जब वे नए संसद भवन के उद्घाटन में गए तो जेडीयू ने खुले आम उनकी आलोचना भी की थी. तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष ललन सिंह ने उन्हें आड़े हाथों भी लिया था. बाद में उन्हें अपनी टीम से बाहर भी कर दिया था. माना जा रहा है कि जेडीयू के कई नेता इस बात से अब भी नाराज हैं कि हरिवंश ने तब नीतीश कुमार का साथ क्यों नहीं दिया था. यह अलग बात है कि खुद नीतीश ही अब वापस बीजेपी के साथ आ चुके हैं और कई बार बोल चुके हैं कि अब कहीं और नहीं जाएंगे.

बीजेपी से नजदीकी

नीतीश के नजदीक रहे हरिवंश बीजेपी के काफी नजदीक आ चुके हैं. जेडीयू के बीजेपी से अलग होने के बावजूद अपने पद से इस्तीफा न देकर वे बीजेपी की नजरों में गए थे. विपक्ष के बहिष्कार के बावजूद उन्होंने नए संसद भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में हिस्सा लिया था और प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ की थी. तब जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा था कि हरिवंश ने अपने पद के लिए अपनी लेखनी और जमीर को बेच दिया. लल्लन सिंह खुल कर कह चुके थे कि नीतीश कुमार को बीजेपी के करीब लाने वालों में हरिवंश भी शामिल थे. सितंबर 2020 में राज्यसभा के विपक्ष के आठ सांसद दो कृषि विधेयकों पर हंगामे और नियम पुस्तिका फाड़ने जैसी घटनाओं के कारण निलंबित किए गए. निलंबन के बाद वे धरने पर बैठे. अगले दिन उप-सभापति हरिवंश ने उनसे मुलाकात कर चाय पिलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कदम को विनम्रता और महानता का प्रतीक बताते हुए हरिवंश के आचरण को "प्रेरक" और "राजनेता जैसा" कहा.

कुछ दिन में होगा फैसला 

जेडीयू नेताओं का मानना है कि उपसभापति कौन बने, यह तय करना बीजेपी का काम है. ऐसा नहीं है कि जब हरिवंश को पहली बार उपसभापति बनाया गया तो ऐसा जेडीयू के कोटे से किया गया. लिहाजा फिर कोई जेडीयू नेता उपसभापति बने या न बने, यह बीजेपी पर ही निर्भर करेगा. दूसरी ओर लोक सभा में डिप्टी स्पीकर का पद 2019 से ही खाली है. हालांकि कुछ नेता मानते हैं कि राज्य सभा में उपसभापति का पद खाली नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि उपराष्ट्रपति इसके सभापति होते हैं और वे पूरे समय कार्यवाही का संचालन नहीं कर सकते. वैसे राज्य सभा में एनडीए को बहुमत है लिहाजा उसे अपना नया उपसभापति चुनने में कोई परेशानी नहीं आएगी.

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