राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर सपा, कांग्रेस मुखर, पर मायावती की बसपा ने क्यों ओढ़ी चुप्पी? इनसाइड स्टोरी

मजहबी ध्रुवीकरण की स्थिति में बसपा की चिंता है कि वोटर सपा और भाजपा के बीच बंट सकते हैं. ऐसी स्थिति में बसपा को करारा झटका लगेगा. यही कारण है कि मायावती नहीं चाहतीं कि यह मामला तूल पकड़े और चुनावी मुद्दा बने.

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नई दिल्ली:

राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले पर समाजवादी पार्टी काफी मुखर है. सीधे अखिलेश यादव की ओर से भाजपा को निशाने पर लिया जा रहा है. राम मंदिर के चढ़ावे से चोरी की तुलना वह बाबर तक से कर रहे हैं. कांग्रेस भी काफी हमलावर है, लेकिन पूर्व सीएम मायावती कमोबेश शांत हैं. उनका हाल ही में एक बयान आया था, जिसमें उन्होंने चढ़ावा चोरी की आलोचना की थी. फिर एक नसीहत भी देती दिखीं कि इस मसले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. उनकी बात से साफ है कि वह इस मसले पर कोई राजनीति नहीं करना चाहतीं यानी उन्हें चढ़ावा चोरी विवाद से कोई चुनाव फायदा मिलने की उम्मीद नहीं दिखती. आखिर ऐसा क्यों? 

मुश्किल में बहुजन समाज पार्टी!

इसका जवाब देते हुए जानकार कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में बसपा की राजनीति का आधार कभी धर्म नहीं रहा. मायावती ने बहुजन की राजनीति की और फिर 2007 से 2012 के दौरान तो सर्वजन की ओर बढ़ती दिखीं. इसका फायदा भी उन्हें मिला था. अब वह मुश्किल वक्त में हैं, लेकिन अब भी बसपा को नहीं लगता कि मजहबी राजनीति किसी तरह का फायदा पहुंचाएगी. मजहबी ध्रुवीकरण की स्थिति में बसपा की चिंता है कि वोटर सपा और भाजपा के बीच बंट सकते हैं. ऐसी स्थिति में बसपा को करारा झटका लगेगा. यही कारण है कि मायावती नहीं चाहतीं कि यह मामला तूल पकड़े और चुनावी मुद्दा बने. ऐसे में उनकी यही नसीहत है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर राजनीति से बचा जाए.

ध्रुवीकरण से बचने की कोशिश

हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, जैसी बात कहकर मायावती ने हमेशा ही मजहब के नाम पर किसी तरह के ध्रुवीकरण से बचने का प्रयास किया है. राम मंदिर मामले में भी उनका रुख इसी नीति का संकेत दे रहा है. मायावती की राजनीति का मुख्य आधार बहुजन समाज रहा है. इसी में उन्होंने ब्राह्मणों और मुस्लिमों को साधने की कोशिश बीच-बीच में की है. इसलिए वह ऐसा कोई मसला नहीं छेड़ना चाहतीं, जिससे उनका यह वोटों का समीकरण किसी तरह बिखरे. मायावती की कोशिश है कि हिंदुत्व की राजनीति के वह खिलाफ न दिखें. ऐसी स्थिति में ब्राह्मण अथवा सवर्ण वोटर उनसे दूर जाता दिख सकता है.

बहुजन के साथ सवर्ण और मुस्लिम जोड़ना चाहती हैं मायावती 

फिलहाल उनकी कोशिश यही है कि बहुजन समाज को साथ रखा जाए और सवर्णों को भी साध लिया जाए. इसके अतिरिक्त मुस्लिम बहुल सीटों पर मुसलमान कैंडिडेट देकर सपा के इस वर्ग को भी तोड़ने का प्रयास हो. मायावती की यही चुनावी रणनीति है और वह किसी भी हाल में इससे भटकना नहीं चाहतीं. ऐसे में उनका स्पष्ट संदेश है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी जैसे मामले से बचा जाए. 

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