जिनसे खेलती थीं घर-घर... मां की साड़ियों से ही पिता ने तीन बच्चियों को फांसी पर लटकाया, मुजफ्फरपुर की घटना दिल दहला देगी

बिहार के मुजफ्फपुर से एक दर्दनाक खबर सामने आई है, एक पिता ने अपने बच्चों के साथ फांसी लगा ली, जिसमें तीन बच्चियों और पिता की मौत हो गई है और दो बेटे चमत्कारिक ढंग से बच गए हैं.

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  • मुजफ्फरपुर में एक पिता ने अपने पांच बच्चों को फांसी पर लटका कर आत्महत्या की जिसमें तीन बच्चियों की मौत हुई
  • छह वर्षीय शिवम और पांच वर्षीय चंदन ने खुद को साड़ियों से बनी रस्सी खोल कर पिता के कृत्य से बचाया
  • पड़ोसियों के अनुसार परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था और बड़ी बेटी 12 वर्ष की घर का पालन-पोषण कर रही थी
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दिल्ली-एनसीआर में स्मॉग और फॉग की खबरों के बीच सुबह-सुबह बिहार से दिल दहलाने वाली खबर सामने आई कि एक पिता ने अपने 5 बच्चों को फांसी से लटका कर सुसाइड कर लिया है, जिसमें 3 बच्चियों और पिता की दर्दनाक मौत हो गई और दो बेटे चमत्कारिक ढंग से बच गए. तस्वीरें सामने आईं तो दिल दहल गया. छोटी-छोटी तीन बच्चियां मां की साड़ियों से बने फंदों में कैद होकर दुनिया को अलविदा कह गईं. सपने देखना तो अभी इन बच्चियों ने शुरू भी नहीं किया होगा, उससे पहले ही काल ने उन्हें लील लिया. जो वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं, उसमें दिख रहा है कि कच्चा घर है और घर के अंदर दो चूल्हे वो भी मिट्टी के...पास में तीन अंडों के खोल रखे हैं, जिनसे साफ है कि रात में अंडे की सब्जी बनी होगी. न ज्यादा बर्तन न कोई डिब्बे और सामान, एक संदूक और दो चारपाई जरूर दिखीं. देखकर ही समझ आ रहा है कि घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. पड़ोसियों ने मीडियाकर्मियों को बताया कि इन पांच बच्चों की मां की मौत पिछले साल हो गई थी. पिता भी कमाते नहीं थे, बस घूमते रहते थे. खाना-पीना बड़ी लड़की संभाल रही थी, वो भी पड़ोस और दूसरे लोगों की मदद से जो इन्हें सरकारी राशन और अन्य मदद दे जाते थे.घर ऐसे ही चल रहा था, लेकिन किसी को नहीं पता था कि पिता बच्चियों के लिए इतना भयावह कदम उठा लेगा कि बच्चों के साथ खुद की जीवनलीला भी ऐसे समाप्त कर लेगा.

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वो संदूक जिस पर पैर रखकर बचे शिवम और चंदन

ऐसे बचे शिवम और चंदन

खैर, इसे खुशनसीबी कहें, चमत्कार कहें या गनीमत कहें कि 6 साल का शिवम और 5 साल का चंदन अपने पिता के भयावह कृत्य से बच गया. शिवम की आंखों में पिता और बहनों को खोने का खौफ साफ दिख रहा था. रविवार रात जो उनके घर में हुआ वह उसे कभी भुला नहीं पाएगा. उसने बताया कि पिता मैदान (शौच) गए थे, वहां से लौटे और सबको फांसी पर लटकाकर खुद भी फांसी लगा लिए. शिवम से जब पूछा गया कि आप कैसे बचे तो उन्होंने बताया,'' मैंने खुद ही अपनी साड़ी से बनी रस्सी खोल ली.'' ऐसा लगता है कि नीचे रखी पेटी से दोनों बेटों का पैर टकराया और दोनों गले में बंधी साड़ी खोलकर बचने में कामयाब रहे.

घटनास्थल पर नहीं मिला कोई सुसाइड नोट

घटना होने के बाद कई घंटे बाद तक डर के कारण दोनों बच्चे दुबके रहे और आंख भी नहीं खोल रहे थे. मरने वालों में पिता अमरनाथ राम और तीन बहनें 12 साल की अनुराधा, 11 साल की शिवानी और 7 साल की राधिका शामिल हैं.तीनों ही बहनें बड़ी थीं, जो मां के जाने के बाद दोनों छोटे भाइयों को खिलाने, सुलाने और पालने की जिम्मेदारी निभा रही थीं. पुलिस को घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला और ये कारण भी पता नहीं चल पाया कि आखिर अमरनाथ ने इतना दर्दनाक कदम क्यों उठाया. पुलिस इस मामले की गहराई से जांच कर रही है. 

बिहार मुजफ्फपुर सुसाइड केस की जांच में जुटे पुलिसकर्मी

मां की यादों के रूप में जुड़ी साड़ियों से ही मौत मिलेगी किसने सोचा था

कहीं अंधविश्वास का एंगल तो नहीं है, इसे लेकर भी जांच की जा रही है. वैसे इस घटना की तस्वीरें देख दिल्ली के बुराड़ी में घटी घटना की भी याद आ गई, जहां परिवार के सभी 11 सदस्य फांसी से लटके मिले थे. पुलिस ने सुसाइड के कारण से जुड़ा कोई औपचारिक बयान नहीं दिया, लेकिन पड़ोसियों का कहना है कि वह अपनी पत्नी की मौत के बाद मानसिक रूप से परेशान रहता था और वह कोई काम धंधा भी नहीं करता था, बड़ी लड़की ही घर को संभाल रही थी. लोग खाने का राशन आदि दे देते थे तो वह बनाकर सबका पेट भर देती थी. वह बच्ची खुद 12 साल ही थी, लेकिन बड़ों की तरह अपने भाई-बहनों को संभाल रही थी, जिसकी जान उसकी मां की ही साड़ी से पिता ने ले ली. ये वही साड़ियां थीं, जो उसकी मां की यादें थीं, जिनसे वे तीनों घर-घर खेलती होंगी,मां को याद कर सिर पर रख लेती होंगी, लेकिन क्या पता था इन्हीं से पिता फंदा बनाकर बच्चियों को लटका देगा.

बेटियों ने रात में बनाई थी अंडे की सब्जी

खैर जांच जारी है, पिता की क्या स्थिति थी, क्या मामला था ये कुछ दिन में साफ हो जाएगा, लेकिन ये तीनों बच्चियां जो संसार को देखे बिना ही संसार से चली गईं, उसके लिए कौन जिम्मेदार है... किस पर भरोसा किया जाए, जब घरवाले ही जान लेने पर उतारू हैं. कहने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि कोई भी मजबूरी हो बच्चियों की जान लेने की क्या जरूरत थी, लेकिन सबकुछ घटना के बाद ही कहा जाता है, पहले इस घर के खामोश तूफान पर किसी की नजर नहीं गई, अगर गई होती तो शायद ये बच्चियां दुनिया में होतीं.

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