हार के बाद मातोश्री में आज क्‍यों जश्‍न, शिवसेना के विजयी प्रत्याशियों का लगा जमावड़ा

उद्धव ठाकरे खुद नवनिर्वाचित उम्मीदवारों का अभिनंदन कर और जीत की बधाई दे रहे हैं. इस अवसर पर पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा जश्न की भी तैयारी की गई है, जिससे यह बैठक एक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखी जा रही है.

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  • उद्धव ठाकरे की शिवसेना को मुंबई बीएमसी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा और उनका आखिरी किला भी ढह गया
  • चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे ने सभी नवनिर्वाचित शिवसेना उम्मीदवारों को मातोश्री में बुलाकर जीत की बधाई दी
  • शिवसेना (यूबीटी) ने बीएमसी चुनाव में 65 सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन सत्ता पूरी तरह से खो दी
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मुंबई:

ठाकरे परिवार का मुंबई का किला ढह गया है, बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को हार का सामना करना पड़ा है. लेकिन उद्धव ठाकरे ने हार नहीं मानी है. उद्धव ठाकरे ने आज शिवसेना के सभी नवनिर्वाचित उम्मीदवार को मातोश्री बुलाया है. चुनाव नतीजों के बाद मुंबई के मातोश्री बंगले पर शिवसेना के सभी विजयी प्रत्याशियों का जमावड़ा लगा हुआ है. उद्धव ठाकरे खुद नवनिर्वाचित उम्मीदवारों का अभिनंदन कर और जीत की बधाई दे रहे हैं. इस अवसर पर पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा जश्न की भी तैयारी की गई है, जिससे यह बैठक एक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखी जा रही है. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने बृहन्मुंबई महानगपालिका (BMC) चुनाव में कड़ी टक्‍कर दी और 65 सीटों पर जीत दर्ज की. 

एकनाथ ने भेद दिया ठाकरे का आखिरी किला 

बीएमसी चुनाव के नतीजों के साथ उद्धव ठाकरे का जो आखिरी किला बचा था वो भी ढह गया. ठाकरे को जिस बात का गुमान था कि बीएमसी में उनकी सत्ता है, वो भी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. जिस तरह के अनुमान एग्जिट पोल में लगाए जा रहे थे, चुनाव का रिजल्ट कमोबेश वही रहा. दरअसल, बीएमसी चुनाव में जिन दो नेताओं पर लोगों की खास नजरें थी वो थे उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे. 2022 में शिवसेना की टूट हुई थी और उसके बाद ये पहली बार था, जब बीएमसी के चुनाव हुए हैं. ऐसे में इसको लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे कि क्या उद्धव अपना आखिरी किला बचा पाएंगे या फिर शिंदे इसे भी तोड़ देंगे. चुनावी नतीजे से साफ है कि उद्धव का आखिरी किला शिंदे ने भेद दिया है.

ठाकरे ब्रदर्स का आगे का रास्ता अब क्या होगा?

बाला साहेब ठाकरे की विरासत को लेकर भी जंग थी कि विरासत उद्धव के पास है या फिर शिंदे के पास. चुनावी परिणाम ने ये भी साफ कर दिया. वैसे तो विधानसभा के चुनाव में ही ये साफ हो गया था, लेकिन उद्धव के पास एक बड़ा किला बचा था, तो ऐसे में इसको लेकर लड़ाई जारी थी, जो कि अब पूरी तरह से क्लियर हो गई है. ऐसे में एक सवाल ये उठता है कि बिना कांग्रेस के चुनावी ताल ठोक रहे ठाकरे ब्रदर्स यानि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के आगे का रास्ता अब क्या होगा...? 

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उद्धव और राज ठाकरे के बीच बीते दो दशकों से कड़वाहट चल रही थी. बीएमसी से सत्ता न चली जाए इसके लिए उद्धव ठाकरे ने साम दाम दंड भेद सबकुछ लगा दिया था. यहां तक की दो दशकों की कड़वाहट भूलकर दोनों भाई एक साथ आ गए थे, लेकिन चुनावी परिणाम बता रहे हैं कि उन्हें इसका कोई फायदा नहीं मिला. चुनावी परिणाम न सिर्फ उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ा सबक है बल्कि ये भी साफ हो गया कि मतलब की राजनीति के लिए भाई राज के साथ अचानक से साथ आना जनता को कहीं से भी रास नहीं आया. हालांकि, कुछ इलाके जहां मराठी बहुल आबादी है, वहां उन्हें थोड़ा बहुत फायदा जरूर हुआ है.

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