- असम सरकार ने चाय बागान मजदूरों की दिहाड़ी को अप्रैल से 250 से बढ़ाकर 280 रुपये करने का फैसला किया है
- मिशन वसुंधरा योजना के तहत चाय बागान मजदूरों को दशकों से रह रही जमीन के पट्टे प्रदान किए जा रहे हैं
- करीब साढ़े तीन लाख परिवारों को चाय बागानों में जमीन का मालिकाना हक मिलने से मजदूरों में उत्साह देखा जा रहा है
असम के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों की प्रदेश की सरकार चुनने में अहम भूमिका होती है. ये लोग ऊपरी असम की करीब 35 विधानसभाओं को प्रभावित करते हैं. चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकार के दो बड़े एलान से असम के चाय बागानों में एक बार फिर कमल खिलने के आसार नजर आ रहे हैं. असम के चाय बागान मजदूरों को दिन के फिलहाल 250 रुपये मिलते हैं जो 1 अप्रैल से बढ़कर 280 रुपए हो जाएगा. यानी 9 अप्रैल को होने वाले मतदान से ठीक पहले चाय बागान मजदूरों की दिहाड़ी में तीस रुपए का इजाफा होने जा रहा है.
इसके साथ ही सरकार ने चाय बागान मजदूरों को उस जमीन का मालिक बना दिया जिस पर उनके पूर्वज दशकों से रह रहे थे. मिशन वसुंधरा के तहत राज्य सरकार चाय बागान में काम करने वाले परिवारों को जमीन का पट्टा जारी कर रही. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इसके तहत 760 चाय बागानों के करीब साढ़े तीन लाख परिवारों को उस जमीन का हक मिलेगा जहां वो रह रहे हैं. मार्च के महीने में पीएम मोदी ने लाभार्थियों को डिजिटल पट्टा वितरित किया. हालांकि अभी इसकी शुरुआत ही हुई है लेकिन इसने सभी मजदूरों में जमीन मालिक बनने की उम्मीद जगाई है.
ज़मीन पट्टे को लेकर भी जबरदस्त उत्साह है. बागान में काम कर रही विजय मिर्धा ने कहा कि हम सरकार से संतुष्ट हैं. दो सौ साल हो गया और अब जा कर मोदी जी ने हमें ज़मीन का अधिकार मिला है. इससे हमारा सम्मान बढ़ेगा. हालाँकि उन्होंने दिहाड़ी बढ़ाने और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की माँग भी की. क्या विपक्ष ज़्यादा दिहाड़ी का वादा करे तो मूड बदलेगा? ज्यादातर मज़दूर कहते हैं इसी सरकार से उम्मीद है.
इसका कारण टी बोर्ड इंडिया के पूर्व चेयरमैन पीके बेजबरुआ ने समझाया. उन्होंने बताया कि 2016 के बाद से बीजेपी सरकार ने चाय बागान के इलाक़ों में विकास के काम भी किए हैं. इससे पहले इन इलाकों में नियमों का हवाला देकर सरकारी योजनाओं के तहत काम नहीं होता था. अब जमीन पट्टा मिलने और दिहाड़ी बढ़ाने से बीजेपी की जमीन और मजबूत ही हुई है.
चाय बागान मजदूर जोगदू दुसाध को जमीन पट्टा मिल चुका है. जमीन का डिजिटल पट्टा दिखाते हुए उनकी ख़ुशी साफ़ दिख रही थी. उन्होंने कहा कि जमीन का मालिक बन कर बहुत अच्छा लग रहा है.असम में चाय की खेती के लिए करीब दो सौ साल पहले अंग्रेज़ इन मजदूरों के परिजनों को देश के अलग-अलग आदिवासी इलाकों से लेकर आए थे. मजदूर अब मालिक बन रहे हैं. हालांकि इन मजदूरों की अनुसूचित जनजाति के दर्जे की माँग अभी भी लंबित है. इस को लेकर कांग्रेस बीजेपी सरकार को घेर रही है. लेकिन केवल सवालों से कुछ नहीं होने वाला. चाय बगानों के मौजूदा सूरतेहाल से तो यही लगता है कि कमल की फसल लहलहा रही है. इन मजदूरों को फिर से अपने पाले में करने के लिए कांग्रेस को काफ़ी मशक़्क़त करनी होगी और लंबा इंतजार भी.
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