- अमरनाथ गुफा में बर्फ के शिवलिंग का इस साल यात्रा के आधे समय में ही असामान्य रूप से तेजी से पिघलना देखा गया
- हिमालयी क्षेत्र में तापमान औसत से तेज़ी से बढ़ रहा है और इससे ग्लेशियरों का क्षेत्रफल दो दशकों में कम हुआ है
- जलवायु परिवर्तन, अटलांटिक महासागर की हीटवेव और स्थानीय बदलावों ने अमरनाथ शिवलिंग के पिघलने में भूमिका निभाई है
भूखे को अन्न प्यासे को पानी, जय बाबा बर्फानी. ऐसे नारे लगाते हुए भक्तों के जत्थे अमरनाथ जी की गुफा की ओर बढ़ रहे हैं. हर साल होने वाली इस यात्रा को लेकर इस बार लोगों में काफी उत्साह है. लेकिन भक्तों के लिए चिंता बढ़ाने वाली भी एक खबर है. वह यह कि प्राकृतिक रूप से बर्फ से बनने वाले शिवलिंग का आकार छोटा हो गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि बर्फ पिघल रही है और उसका असर शिवलिंग पर भी पड़ा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक- 57 दिन की यात्रा पूरी होने से पहले ही बर्फ का शिवलिंग 90 प्रतिशत से ज्यादा पिघल गया है. खैर शिवलिंग का पिघलना ही मुद्दा नहीं है, असली चिंता की बात ये है कि इतनी तेजी से शिवलिंग कैसे गायब हुआ. प्रशासन से लेकर श्रद्धालु तक सब हैरान हैं. बर्फ के शिवलिंग का पिघलना सीधे हिमालय पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर खतरे की घंटी बजा रहा है.
हिमालय और क्लाइमेट चेंज
जैसे ही बर्फ के शिवलिंग के पिघलने की खबरें सामने आईं तो वैज्ञानिकों और पर्यावरण के जानकारों ने लगातार गर्म हो रहे हिमालय को लेकर हुई रिसर्च रिपोर्टों की तरफ इशारा किया. विशेषज्ञ इसे लेकर लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालयी पर्वत श्रृंखला दुनिया के औसत से भी तेज गर्म हो रही है. अमरनाथ गुफा समुद्र तल से 3, 888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. बता दें कि गुफा और आसपास के ग्लेशियरों के पास असामान्य रूप से तापमान उस सीमा से ऊपर चला गया है जो कि बर्फ को बनाए रखने के लिए जरूरी है.
बढ़ते तापमान से इतर बारिश के पैटर्न में बदलाव भी इस बात पर असर डालते हैं कि गर्मी शुरू होने से पहले शिवलिंग कितना बड़ा बन पाएगा. The Himalaya Initiative के स्ट्रैटेजिक एडवाइजर और डायरेक्टर डॉ एकलव्य शर्मा (जिन्हें 2024 में पर्यावरण विज्ञान में काम करने के लिए पद्मश्री भी मिला है) ने बताया कि इस साल अमरनाथ में बर्फ के शिवलिंग का असामान्य रूप से तेजी से पिघलना हिमालयी क्रोयोस्फीयर (Himalayan cryosphere) यानी हिमालयी हिममंडल का कमजोर होना दर्शा रहे हैं और ये तेजी से पिछल रहे हैं.
हालांकि किसी एक घटना को पूरी तरह जलवायु परिवर्तन से नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन ये लंबे समय से चले आ रहे गर्म होने के उस ट्रेंड से जरूर मेल खा रहा है, जिस पर दशकों से वैज्ञानिक हिमालय को लेकर चेतावनी दे रहे हैं . हैरानी की बात ये हैं कि हिमालय दुनिया के औसत से तेज गर्म हो रहा है, क्योंकि ऊंचाई पर तापमान तेजी से बढ़ता है. इसे एलीवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग(Elevation-Dependent Warming) कहते हैं. डॉ. शर्मा ने जोखिमों के बढ़ने की चेतावनी देते हुए कहा कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह होता रहा तो इस सदी के अंत तक क्षेत्र के कुछ ऊंचे इलाकों में तापमान 5°C तक बढ़ सकता है.
उन्होंने आगे बताया कि इस तेज गर्मी की वजह से पहले से ही ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और बर्फ वाला एरिया कम हो रहा है. बेशक, गर्मी की घटनाएं भी बहुत हो रही हैं. हिमालय पर अपनी रिसर्च का हवाला देते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि हमारे हालिया अध्ययन में सामने आया कि 2000 से 2022 के बीच हिमालय की बर्फ और ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 23% से ज्यादा घट गया है और 2010 के बाद नुकसान की रफ्तार और तेज हो गई है.
उधर, पश्चिमी हिमालय के उन इलाकों में सबसे तेजी से गर्मी बढ़ रही है, जहां अमरनाथ गुफा लगभग 3,900 मीटर पर स्थित है. ग्लेशियरों का पिघलना या मौसम की बर्फबारी में कमी आना या बर्फ की प्रतिष्ठित प्राकृतिक संरचनाओं में बदलाव आना, संदेश एक ही है कि हिमालय की जलवायु अभूतपूर्व तेजी से बदल रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के डायरेक्टर प्रोफेसर बी डब्ल्यू पांडे ने धरती पर पड़ रहे असर को समझाते हुए कहा कि पहले अमरनाथ गुफा का शिवलिंग एक महीने में पिघलता था, लेकिन इस बार ये आधे समय से भी कम यानी 15 दिन दिन के भीतर गायब हो गया. ये सब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की वजह से है. जलवायु परिवर्तन का ऐसा दौर चल पड़ा है जिसमें पूरा हिमालय पूर्व से पश्चिम तक प्रभावित हो रहा है. बढ़ते तापमान से इस क्षेत्र में बर्फ और पूरे जलविज्ञान चक्र बदल रहा है. गहरी चिंता जताते हुए प्रोफेसर पांडे ने चेतावनी दी कि जो वनस्पति और जीवजंतु पहले 3,888 मीटर की ऊंचाई तक सीमित थे वे अब 4,500 मीटर से भी ऊपर चले गए हैं.
एक्सपर्ट ने बताई शिवलिंग के पिघलने की वजह
जलवायु का अध्ययन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हिमालय में हो रही ऐसी परेशानियां कोई अकेली घटना नहीं है बल्कि इसके तार ये बड़े पैमाने पर हो रहे वायुमंडलीय बदलावों से भी जुड़े हुए हैं. इसे लेकर प्रोफेसर बीडब्ल्यू पांडे ने कहा कि गर्मियों में अटलांटिक महासागर से आने वाली हीटवेव भूमध्य सागर और यूरोप को प्रभावित करती है और सीधे उत्तर-पश्चिमी हिमालय तक पहुंचती है. अटलांटिक की हीटवेव और ग्लोबल वार्मिंग से हुए जलवायु परिवर्तन की वजह से अमरनाथ मंदिर का शिवलिंग जल्दी पिघल गया. हिमालय का तापमान सीधे अटलांटिक के तापमान और बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होता है.
गुफा का अपना एक वातावरण होता है
बता दें कि गुफा की अपनी एक नाजुक सूक्ष्म-जलवायु है, जिसका बर्फ को पिघलने से बचाने के लिए जमाव बिंदु या उससे नीचे रहना जरूरी है. बाहरी गर्मी के स्रोत इस संतुलन को बुरी तरह से बिगाड़ देते हैं. पहलगाम आतंकी हमले के एक साल बाद ये यात्रा हो रही है. इसमें श्रद्धालुओं की भारी बढ़ोतरी देखी जा रही है. सिर्फ पहले 4 दिनों में ही 93,000 से ज्यादा तीर्थयात्री आ चुके थे.अमरनाथ गुफा पर जुटने वाली भीड़ के चलते भी वहां उमस बढ़ रही है. इससे तापमान प्रभावित हुआ है और बर्फ पिघलने की यह भी एक वजह है.तीर्थयात्रियों की इस भारी भीड़ ने भी प्राकृतिक गुफा पर दबाव बढ़ा दिया और रोजाना तय की गई सीमा की भी अनदेखी हुई.आईआईटी बॉम्बे की प्रोफेसर शर्मिष्ठा पटनायक का कहना है कि इस समस्या को समझने के लिए सिर्फ मौसम के आंकड़ों से आगे बढ़कर देखना होगा.
वह कहती हैं कि वैज्ञानिक अक्सर शिवलिंग के पिघलने को सिर्फ जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय प्रभाव से जोड़ते हैं, लेकिन मैं इस संकट को अन्य पहलुओं से भी देखती हूं, जैसे बढ़ता तापमान और कम बर्फबारी से लेकर सर्दियों के दिनों की घटती संख्या. तीर्थयात्रियों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी की तरफ इशारा करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि हजारों तीर्थयात्रियों का आना और उनके लिए भारी बुनियादी ढांचे के निर्माण के कारण नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र (जीव-पौधे-मिट्टी-पानी-जलवायु का आपसी तंत्र) पर अत्यधिक दबाव पड़ा. गुफा का प्राकृतिक सूक्ष्म वातावरण इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ.श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण पैदा हुई गर्मी और गुफा के अंदर लगाई गई लाइटों से भी पूरा इकोसिस्टम गड़बड़ा जाता है. हालांकि उन्होंने आगे ये भी कहा कि भारत एक धार्मिक देश है और तीर्थयात्रियों को पूरी तरह से नियंत्रित करना या प्रतिबंधित करना बहुत मुश्किल है. इसका सही समाधान प्रशासन के पास है कि वे इस स्थान को कैसे प्रभावी ढंग से मैनेज और रेगुलेट करें.
गुफा के आसपास निर्माण और श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाओं का भी पड़ा प्रभाव
पिछले कुछ दशकों में ज्यादा ऊंचाई वाले ट्रैक को सुरक्षित और अधिक सुलभ बनाने के लिए वहां इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े बदलाव किए गए हैं हालांकि इन परिवर्तनों के कारण भी गुफा के आसपास गर्मी बढ़ रही है. भारी मशीनरी लगाने से लेकर अस्थायी आवासों के विस्तार, बिजली, सौलर लाइट और सामुदायिक रसोई को मंदिर के करीब ले जाने तक ये सभी स्थानीय परिवेश में गर्मी बढ़ाने में योगदान करते हैं हालांकि ये समाधान यात्रियों की यात्रा को सुखद कर सकते हैं, लेकिन इससे वो एक और बड़ी समस्या खड़ी कर रहे हैं.
प्रोफेसर शर्मिष्ठा पटनायक ने बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर अक्सर मंदिर की नाजुक आंतरिक संरचना की अनदेखी करता है. पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाना वहां के पूरे प्राकृतिक तंत्र को प्रभावित करता है बल्कि ये गुफा की सूक्ष्म जलवायु को भी सीधे प्रभावित करता है. मंदिर के पास भारी मशीनरी, जेनरेटर और सहायक उपकरणों द्वारा पैदा हुई गर्मी के कारण गुफा का गुफा का तापरोधन( ये क्षमता कि वो बाहर की गर्मी को अंदर न घुसने दे और अंदर का तापमान ठंडा बनाए रखे)प्रभावित हुआ है, जिससे भीतर पिघलने की प्रक्रिया तेज हुई.
पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि तीर्थस्थल की रक्षा करने का मतलब है आस्था और वहां के पर्यावरण की परिस्थितियों के बीच नाजुक संतुलन को बनाए रखना है. गुफा की सूक्ष्म जलवायु को प्रभावित होने से बचाने के लिए तीर्थयात्रियों की दैनिक संख्या सीमा, कड़ी पुलिसिंग, एंट्री और एक्जिट गेट पर नियंत्रण,उच्च उत्सर्जन वाले बुनियादी ढांचे पर अंकुश, गुफा के अंदर और आसपास स्थायी और अस्थायी निर्माण गतिविधियों को पर लगाम लगाकर ही संभव हो पाएगा. वैसे सबसे बड़ी चुनौती आध्यात्मिक और वैज्ञानिक जगत के बीच संतुलन बनाए रखना है.
प्रोफेसर शर्मिष्ठा ने कहा कि हमें इसमें मामले सक्सेसफुल अप्रोच के लिए स्थानीय संस्थानों के साथ सहयोग करके सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं की पहचान करनी चाहिए. हमें ये याद रखना चाहिए कि स्थानीय लोग पूरी तरह से इसी तीर्थयात्रा पर निभर है, जिसमें टट्टू सेवाएं भी शामिल हैं.यहां की गतिविधियों को मनमाने ढंग से प्रतिबंधित करने से भी उन्हें नुकसान पहुंचता है. यानी हमें स्थानीय संस्थानों के साथ मिलकर कड़े पर्यावरण नियमों की आवश्यकता है. आखिर में बता दें कि अमरनाथ के लिए वैश्विक जलवायु खतरे के बीच हमें बड़े पैमाने पर यहां बड़े पैमाने पर पर्यटक को संतुलित करना होगा. डॉक्टर एकलव्य शर्मा ने आखिर में कहा कि इस नाजुक पर्वतीय प्रणाली की रक्षा करना न केवल इसकी पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए जरूरी है, बल्कि जैव विविधता, जल सुरक्षा और लाखों लोगों की आजीविका की रक्षा के लिए भी आवश्यक है, जो इसके निचले इलाकों में बहने वाली नदियों पर निर्भर हैं.