जब चार साल के भीतर गिरी 45 राज्य सरकारें- दलबदल का एक दौर ये भी था

दलबदल की राजनीति का केंद्र हरियाणा बना. 1967 में कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन मात्र एक सप्ताह के भीतर राव बीरेंद्र सिंह ने विधायकों का एक बड़ा गुट तोड़कर सरकार गिरा दी और 'विशाल हरियाणा पार्टी' बनाकर खुद मुख्यमंत्री बन गए.

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देश में दलबदल को लेकर सख्त है कानून
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  • उस समय दलबदल की राजनीति इतनी व्यापक थी कि अनेक विधायकों को मंत्री पद देकर प्रोत्साहित किया गया था
  • 1968 में दलबदल की समस्या को रोकने के लिए गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी
  • दलबदल के कारण अनेक राज्यों में बार-बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा और चुनाव कराने पड़े
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नई दिल्ली:

भारत में आज अगर एक मजबूत दलबदल विरोधी कानून है तो इसके बनने के पीछे अपना इतिहास और जरूरत है. देश ने तिकड़म, तोड़-फोड़ और दलबदल का एक ऐसा दौर भी देखा है जब लोगों के मन में लोकतंत्र के भविष्य के प्रति ही शंका उत्पन्न होने लगी थी.उस दौर को अस्थिरता का युग कहा जाता है जब केवल 1967-71 के भीतर ही राज्यों में 45 सरकारें बनीं और बिगड़ीं. यह वह दौर था जब स्वतंत्रता के बाद से चला आ रहा कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हुआ और गठबंधन सरकारों का प्रयोग शुरू हुआ था. राजनीतिक अस्थिरता के इस दौर में केवल चार वर्षों में ही 16 बार अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया. 1800 से अधिक विधायकों ने दल-बदले और करीब 115 दलबदलू विधायकों को पुरस्कार स्वरूप मंत्री पद प्रदान किए गए. यही वह दौर था जिसमें भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम' के मुहावरे का चलन प्रारंभ हुआ था. ताजा उदाहरण AAP के 7 सांसदों को है. शुक्रवार को राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि वो अपने छह अन्य सांसद साथियों के साथ आम आदमी पार्टी का साथ छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का ऐलान किया है. 

दरअसल, 1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 8 राज्यों में बहुमत नहीं मिला. कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास (तमिलनाडु), केरल, राजस्थान और पंजाब में बहुमत से दूर रह गई. मद्रास में डीएमके ने पूर्ण बहुमत हासिल किया, लेकिन अन्य राज्यों में 'संयुक्त विधायक दल' (संविद) की गठबंधन सरकारें बनीं. विचारधारा के आधार पर बेमेल यह गठबंधन अंतर्विरोधों से परिपूर्ण थे. इनमें दक्षिणपंथी भारतीय जनसंघ और धुर वामपंथी दल एक साथ थे. वैचारिक तालमेल शून्य था और इस बेमेल गठबंधन ने ही दलबदल की जमीन तैयार की. कई प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं ने भी मुख्यमंत्री बनने की चाहत में अपनी पार्टी तोड़ दी थी. केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भी राज्यपालों के माध्यम से विपक्षी गठबंधन की सरकारों को अस्थिर किया और कई मौकों पर बहुमत साबित करने का मौका दिए बिना ही अनुच्छेद 356 का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

राजनीतिक अस्थिरता का दौर

उत्तर भारत के प्रमुख राज्यों में जबर्दस्त दलबदल हुआ. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और पंजाब- पाँच राज्यों ने ही उस दौर में करीब 30-32 सरकारें बनते और बिगड़ते देखीं. इसी तरह पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल और ओडिशा में गठबंधन स्थिर सरकारें नहीं दे सके. दक्षिण भारत में केरल में गठबंधन प्रयोग के कारण सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकीं.अगर राज्यवार बात करें तो बिहार में 1967 से 1971 के बीच 9 बार मुख्यमंत्री बदले गए. इसका मतलब है कि केवल बिहार ने ही इस 45 की संख्या में 9 का योगदान दिया. उत्तर प्रदेश में इस अवधि में 4 अलग-अलग सरकारें बनीं और गिरीं. पंजाब और पश्चिम बंगाल में भी 3 से 4 बार सत्ता का हस्तांतरण हुआ.

दलबदल का यह दौर इतना व्यापक और भयानक था कि इस बारे में तत्कालीन गृह मंत्री वाई बी चव्हाण की अध्यक्षता में 1968 में एक समिति का गठन किया गया था. इस समिति ने 1967 के चुनाव के बाद के एक वर्ष के भीतर ही सैकड़ों दलबदल दर्ज किए थे. यह दलबदल पर सबसे पहला और प्रमाणिक आधिकारिक दस्तावेज है. इसी तरह प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष सी कश्यप की पुस्तक द पॉलिटिक्स ऑफ डिफेक्शन- अ स्टडी ऑफ स्टेट पॉलिटिक्स इन इंडिया में सिलसिलेवार ढंग से इन घटनाओं का उल्लेख किया गया है. उन्होंने लिखा है कि कैसे 1967 के बाद विधायकों की खरीद-फरोख्त से सरकारें ताश के पत्तों की तरह गिरीं.

दलबदल की राजनीति का केंद्र हरियाणा बना. 1967 में कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन मात्र एक सप्ताह के भीतर राव बीरेंद्र सिंह ने विधायकों का एक बड़ा गुट तोड़कर सरकार गिरा दी और 'विशाल हरियाणा पार्टी' बनाकर खुद मुख्यमंत्री बन गए. इसी दौरान विधायक गया लाल ने नौ घंटे में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद तत्कालीन राजनीति में दलबदलुओं के लिए 'आया राम, गया राम' का जुमला प्रसिद्ध हुआ. अंततः, निरंतर अस्थिरता के कारण नवंबर 1967 में यहाँ राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.

लंबा है दल-बदल का इतिहास

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के चंद्रभानु गुप्त ने सरकार बनाई, लेकिन वह केवल 18 दिन चली. कांग्रेस के कद्दावर नेता चौधरी चरण सिंह ने 17 विधायकों के साथ बगावत की और 'भारतीय क्रांति दल' का गठन किया. उन्होंने जनसंघ और सोशलिस्टों के साथ मिलकर 'संविद' सरकार बनाई. हालांकि, गठबंधन के सहयोगियों के साथ वैचारिक मतभेदों के चलते यह सरकार भी फरवरी 1968 में गिर गई और राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन चला गया. मध्य प्रदेश में दलबदल का नेतृत्व ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने किया. उन्होंने कांग्रेस के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के खिलाफ मोर्चा खोला. गोविंद नारायण सिंह ने 36 कांग्रेसी विधायकों के साथ पाला बदला और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनाई. यह पहली बार था जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता छीनी गई थी. हालांकि, गुटीय राजनीति और दलबदल के खेल के कारण यह सरकार भी 1969 तक ही चल सकी.

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बिहार से पंजाब तक एक जैसी रही है कहानी

बिहार इस दौर में राजनीतिक अस्थिरता की पराकाष्ठा पर था. 1967 से 1971 के बीच यहाँ नौ बार मुख्यमंत्री बदले गए. महामाया प्रसाद सिन्हा की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार दलबदल के कारण गिरी. इसके बाद बी.पी. मंडल ने 'शोषित दल' बनाया और कांग्रेस के समर्थन से मात्र 31 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने. स्थिति इतनी हास्यास्पद हो गई थी कि विधायक सुबह एक दल में होते थे और शाम तक दूसरे खेमे में.पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी के नेतृत्व में 'बांग्ला कांग्रेस' और वामपंथियों ने 'यूनाइटेड फ्रंट' की सरकार बनाई. लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पी.सी. घोष को दलबदल के लिए उकसाया, जिससे सरकार गिर गई. पी.सी. घोष मुख्यमंत्री बने लेकिन उनकी सरकार भी अस्थिर रही. यहां दलबदल के साथ-साथ राजनीतिक हिंसा ने भी लोकतंत्र को चोट पहुँचाई. पंजाब में 'अकाली दल' (संत फतेह सिंह गुट) ने अन्य दलों के साथ मिलकर 'पॉपुलर यूनाइटेड फ्रंट' की सरकार बनाई. लेकिन लक्ष्मण सिंह गिल ने 16 विधायकों के साथ दलबदल किया और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई. यह सरकार भी नौ महीने में गिर गई. पंजाब में भी इस दौर में बार-बार राष्ट्रपति शासन और मध्यावधि चुनाव देखने को मिले.

इन 45 सरकारों के गिरने के पीछे कुछ निश्चित पैटर्न थे. आंकड़ों के अनुसार, दलबदल करने वाले हर आठवें विधायक को मंत्री पद दिया गया. राजनीतिक निष्ठा की कीमत 'लाल बत्ती' बन गई थी. केंद्र में सत्तासीन कांग्रेस पर आरोप लगे कि उसने राज्यपालों के पद का उपयोग करके विपक्षी सरकारों को अस्थिर किया. 'संविद' सरकारों के पास कांग्रेस विरोध के अलावा कोई साझा एजेंडा नहीं था, जिससे वे आंतरिक दबाव में टूट गईं.

इंदिरा गांधी को भी मिला था भारी बहुमत

यह बताता है कि उस दौर में दलबदल एक संक्रामक बीमारी की तरह फैल चुका था, जहाँ एक भी विधायक का पाला बदलना पूरी सरकार को धराशायी करने के लिए पर्याप्त था. यही कारण है कि 1971 में जनता ने फिर से 'मजबूत केंद्र' और 'स्थिर सरकार' के नारे पर इंदिरा गांधी को भारी बहुमत दिया, क्योंकि लोग इस 'आया राम, गया राम' की अस्थिरता से थक चुके थे. इंदिरा गांधी ने तब 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ भारी बहुमत हासिल किया था जिसने दलबदल की इस पहली लहर पर कुछ समय के लिए विराम लगा दिया.

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राजीव गांधी सरकार ने बनाया था दलबदल विरोधी कानून

तब चव्हाण समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं.  यह सिफारिश की गई थी कि मंत्रिमंडल का आकार सदन की कुल संख्या का दस से 11 प्रतिशत से अधिक न हो. बाद में 2003 में 91वें संशोधन के जरिए इसे 15 प्रतिशत पर रखा गया. समिति ने कहा था कि यदि कोई विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है तो कम से कम एक वर्ष तक उसके मंत्री, मुख्यमंत्री या किसी लाभ के पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए. समिति ने दल बदलने को मतदाताओं के साथ विश्वासघात माना था और दलबदलुओं को टिकट न देने की सिफारिश की थी. इसमें दलबदल को परिभाषित भी किया गया था. इस रिपोर्ट के आधार पर ही 1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने दलबदल विरोधी कानून बनाया था जिसमें बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान 2003 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे.

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