स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप इजरायल के साथ कैसे बन सकता है गेमचेंजर

इजरायल को स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनर बनाने की अहमियत का पता इसी से चलता है कि वह केवल चौथा ऐसा देश है जिसे भारत ने यह दर्जा दिया है. क्या है स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और दो देशों के बीच यह कैसे काम करता है?

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  • PM मोदी ने किया बड़ा एलान. भारत और इजरायल ने आपसी रिश्तों को स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक अपग्रेड किया.
  • अब सिर्फ हथियारों की खरीद नहीं, बल्कि रक्षा तकनीक के संयुक्त विकास, AI, क्वांटम और साइबर सहयोग पर फोकस.
  • चुनिंदा रणनीतिक साझेदार देशों को यह दर्ज देकर भारत अपने भरोसेमंद साथियों के साथ भविष्य की तैयारी कर रहा है.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने येरुशलम में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ खड़े होकर कहा कि भारत और इजरायल अपने रिश्ते को स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप के रूप में अपग्रेड कर रहे हैं. इस एक एलान ने दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नई ऊंचाई दी. अब यह रिश्ता केवल दोस्ती या रक्षा सौदों तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि साझा तकनीक, सुरक्षा में साझेदारी और संकट की घड़ी में साथ खड़े रहने की औपचारिक प्रतिबद्धता की ऊंचाई तक पहुंच चुका है. आसान शब्दों में समझें तो स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप में दो देशों के बीच विभिन्न स्तर पर आपसी सहयोग होता है जबकि स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप में भरोसे की गारंटी जुड़ जाती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले इजरायल दौरे के वक्त साल 2017 में भारत और इजरायल के रिश्ते स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुंचे थे. उनके दूसरे दौरे पर इजरायल को स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप देना उससे एक कदम आगे है. भारत ने यह दर्जा बहुत कम देशों को दिया है. इसका मतलब होता है कि दोनों देश एक-दूसरे को प्राथमिकता वाले रणनीतिक साझेदार मानते हैं. नियमित उच्चस्तरीय शिखर बैठकें, रक्षा तकनीक में ट्रांसफर और जॉइंट डेवलपमेंट, खुफिया सहयोग, और उभरती तकनीकों में साझेदारी इस ढांचे का हिस्सा होते हैं.

Photo Credit: PIB

इजरायल भारत का लंबे समय से भरोसेमंद रक्षा साझेदार रहा है. मिसाइल सिस्टम से लेकर ड्रोन-रडार और एयर डिफेंस तक, इजरायल ने भारत को कई अहम सैन्य उपकरण दिए हैं. अब नई साझेदारी के तहत ये रिश्ता बेचने-खरीदने से बढ़कर संयुक्त विकास करने पर होगा. इजरायल के मीडिया के मुताबिक एयर डिफेंस सिस्टम, लेजर पर आधारित एयर डिफेंस प्रोग्राम और एडवांस टेक्नोलॉजी में भारत की भागीदारी पर समझ बन रही है. इसका मतलब ये है कि भविष्य के युद्ध के लिए दोनों देश मिलकर तकनीक विकसित कर सकते हैं.

संकट में साथ खड़े रहने की समझ

सूत्रों के मुताबिक, यह अपग्रेड उस भरोसे को औपचारिक मान्यता देता है जो दोनों देशों ने संकट की घड़ी में दिखाया है. भारत ने इजरायल के कठिन समय में समर्थन दिया है और इजरायल ने भी भारत की सुरक्षा जरूरतों को प्राथमिकता दी है. अब इस रिश्ते में एक तरह का अनकहा सुरक्षा आश्वासन शामिल हो जाता है. इस नई साझेदारी में AI, क्वांटम, साइबर सिक्योरिटी और डिसरप्टिव टेक्नोलॉजी (पुरानी तकनीकों को बदलने) पर खास जोर है. स्टार्टअप और डिफेंस इनोवेशन में इजरायल की दुनिया के शीर्ष देशों में गिनती होती है. भारत के पास बड़ा बाजार, प्रतिभा और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है. लिहाजा दोनों के बीच साझेदारी से केवल डिफेंस में नहीं बल्कि डिजिटल और साइबर स्पेस में भी ताकत बढ़ाएगी.

किन देशों को मिला है यह दर्जा

इजरायल से पहले केवल तीन देश ऐसे हैं जिन्हें भारत ने स्पेशल स्ट्रैटेजिक दर्जा दे रखा है. इसमें सबसे पहला नाम भारत के सबसे पुराने रक्षा साझेदार रूस का आता है. साल 2010 से रूस को स्पेशल और प्रीविलेज्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनर का दर्जा मिला हुआ है. इस साझेदारी के केंद्र में रक्षा और ऊर्जा सहयोग है. रूस के बाद साल 2014 में जापान के साथ स्पेशल स्ट्रैटेजिक ऐंड ग्लोबल पार्टनरशिप की साझेदारी हुई, जिसमें हाई टेक और समुद्री सुरक्षा पर फोकस है. एक साल बाद 2025 में दक्षिण कोरिया के साथ स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप हुआ, जिसे खास तौर पर नौसैनिक और औद्योगिक सहयोग के लिए किया गया. इजरायल से ठीक पहले फ्रांस के साथ रिश्तों को भी भारत ने स्पेशल ग्लोबल स्ट्रैटेजिक साझेदारी में अपग्रेड किया है. इसमें राफेल, न्यूक्लियर और स्पेस के क्षेत्र में सहयोग शामिल है. अब इजरायल इस खास क्लब का हिस्सा बनने जा रहा है.

कूटनीतिक संदेश क्या है

यह अपग्रेड तीन साफ संदेश देता है. पहला, भारत अपनी सुरक्षा नीति में टेक्नोलॉजी और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रख रहा है. दूसरा, मध्य पूर्व में भारत संतुलित लेकिन मजबूत रणनीतिक उपस्थिति चाहता है. तीसरा, भरोसेमंद साझेदारों के साथ दीर्घकालिक संस्थागत ढांचा तैयार किया जा रहा है.

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क्या बदलेगा जमीन पर

इस साझेदारी से इजरायल के साथ संयुक्त रक्षा उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तेज होंगे. वहीं टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से खुफिया और साइबर सहयोग में अब पहले से अधिक मजबूत होंगे. जबकि AI और क्वांटम जैसे क्षेत्रों में साझा रिसर्च के बढ़ने की भी संभावना है. सबसे अहम जो इजरायली अपनी सेना की तकनीकी क्षमताओं के लिए जाना जाता है उससे संकट के समय में राजनीतिक और सैन्य तालमेल करना पहले की तुलना में अब अधिक आसान होगा.

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