- पालमपुर में देश का दूसरा भव्य ट्यूलिप गार्डन CSIR-हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान ने विकसित किया.
- गार्डन पूरी तरह स्वदेशी ट्यूलिप पौध से विकसित किया गया, जिससे भारत ट्यूलिप बल्ब उत्पादन में आत्मनिर्भर बनेगा.
- पालमपुर का ट्यूलिप गार्डन पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है, पिछले वर्ष 4.5 लाख से अधिक सैलानी आए थे.
धौलाधार की बर्फीली चोटियों की गोद में बसा पालमपुर इन दिनों किसी रंगीन सपने जैसा नजर आ रहा है. पहली नजर में यह नजारा आपको श्रीनगर की 'जन्नत' का अहसास करा सकता है. लेकिन हकीकत में यह हिमाचल प्रदेश का उभरता हुआ 'ट्यूलिप डेस्टिनेशन' है. कश्मीर के बाद अब पालमपुर में देश का दूसरा भव्य ट्यूलिप गार्डन पर्यटकों के स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार है. इस बाग को CSIR-हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने अपनी कड़ी मेहनत से विकसित किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को ट्यूलिप बल्ब के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना और पर्यटन को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है.
प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफर्स के लिए एक नया स्वर्ग
पालमपुर की ठंडी हवाओं और अनुकूल जलवायु के बीच खिले ये ट्यूलिप न केवल आंखों को सुकून दे रहे हैं, बल्कि वैज्ञानिकों की उस सफलता की कहानी भी कह रहे है, जहां विदेशी फूलों को अब भारतीय मिट्टी में नई पहचान मिल रही है. जहां पहले ट्यूलिप देखने के लिए सिर्फ कश्मीर का ही विकल्प था, वहीं अब हिमाचल का यह गार्डन प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफर्स के लिए एक नया स्वर्ग बन गया है. लाल, पीले और बैंगनी रंगों की चादर ओढ़े यह गार्डन न केवल हिमाचल के पर्यटन में चार चांद लगा रहा है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी उम्मीद की नई किरण लेकर आया है.
पूरी तरह स्वदेशी ट्यूलिप पौध से विकसित किया गया
पालमपुर में स्थित CSIR-IHBT संस्थान ने इस वर्ष अपनी गौरवमयी उपलब्धि के साथ ट्यूलिप गार्डन के द्वार पर्यटकों के लिए खोल दिए हैं. इस बार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह देश का पहला ऐसा गार्डन है जो पूरी तरह स्वदेशी ट्यूलिप पौध से विकसित किया गया है. अब तक भारत इन खूबसूरत फूलों के लिए नीदरलैंड, हॉलैंड और अफगानिस्तान जैसे देशों पर निर्भर था, लेकिन संस्थान ने लाहौल-स्पीति की बर्फीली वादियों में शोध कर अंतरराष्ट्रीय स्तर की पौध तैयार करने में सफलता हासिल की है. धौलाधार की पहाड़ियों के बीच खिले ये ट्यूलिप अपनी अद्भुत समरूपता, गहरे रंगों और आकर्षक बनावट से कश्मीर का अहसास अब हिमाचल में ही करा रहे हैं.
इस सीज़न में संस्थान ने छह अलग-अलग किस्मों के लगभग 50,000 ट्यूलिप बल्ब लगाए हैं, जो पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बने हुए हैं. संस्थान की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष यहां साढ़े चार लाख से अधिक सैलानी पहुंचे थे और इस बार भी एक लाख से अधिक दर्शकों के आने की संभावना है. डॉ. सुदेश कुमार यादव (निदेशक, CSIR-IHBT) के अनुसार, 'फ्लोरीकल्चर मिशन' के तहत यह कदम न केवल पर्यटन को नई दिशा दे रहा है, बल्कि विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में भी नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है. संस्थान अब विभिन्न निजी कंपनियों के साथ मिलकर ऑफ-सीजन में भी ट्यूलिप उगाने और बड़े पैमाने पर बल्ब उत्पादन करने के प्रयोग कर रहा है.
सौंदर्यीकरण के लिए 22,000 ट्यूलिप बल्ब उपलब्ध कराए गए
पालमपुर की इस सफलता की महक अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक भी पहुंच गई है. संस्थान ने नई दिल्ली नगर परिषद (NDMC) के साथ एक विशेष समझौता किया है, जिसके तहत इस वर्ष दिल्ली के सौंदर्यीकरण के लिए 22,000 ट्यूलिप बल्ब उपलब्ध कराए गए हैं. इसके अतिरिक्त, दिल्ली स्थित CSIR मुख्यालय में भी 1,000 से अधिक ट्यूलिप खिलखिला रहे हैं. स्थानीय स्तर पर भी संस्थान सक्रिय है और हिमाचल वन विभाग के सहयोग से पालमपुर के प्रसिद्ध 'सौरभ वन विहार' में भी 3,000 बल्ब लगाकर ट्यूलिप की खूबसूरती बिखेरने का प्रयोगात्मक प्रयास शुरू किया गया है.
वैज्ञानिक डॉ. भव्य भार्गव ने बताया कि लाहौल-स्पीति में पिछले 5 वर्षों के कड़े शोध के बाद स्वदेशी जलवायु में ट्यूलिप तैयार करना एक बड़ी क्रांति है. वर्तमान में लाहौल-स्पीति के लगभग 50 किसान इस मुहिम से जुड़ चुके हैं और करीब डेढ़ लाख बल्बों का उत्पादन कर रहे हैं. संस्थान का आगामी पांच वर्षों का लक्ष्य हिमाचल में 23 लाख बल्ब तैयार करने का है, ताकि विदेशों से आयात पर निर्भरता पूरी तरह खत्म की जा सके. चूंकि हिमाचल की जलवायु उस समय भी फूलोत्पादन के लिए अनुकूल रहती है जब मैदानी इलाकों में गर्मी बढ़ जाती है, ऐसे में यह मॉडल किसानों की आय दोगुनी करने और भारत को 'ट्यूलिप हब' बनाने में मील का पत्थर साबित होगा.













