ठेले पर सब्ज़ी नहीं, सुरेश सहारिया की बीमार पत्नी थीं... जो पैदल चला वो था सिस्टम

जब प्रशासन को खबर मिली तो अधिकारी आए. इस पूरे मामले में सीएमचो डॉक्टर रामहित कुमार का कहना है जब यह सूचना हम लोगों  को प्राप्त हुई तो इनकी जानकारी के लिए एक टीम पहुंचाई. य

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भोपाल:

मध्यप्रदेश के विदिशा के तिलाखेड़ी रोड पर कोई तमाशा नहीं था.टूटी फूटी सड़क पर कुछ वाहन थे, बस एक बूढ़ा आदमी था और उसका ठेला.ठेले पर सब्ज़ी नहीं थी. ठेले पर उनकी पत्नी थीं.नाम सुरेश सहरिया, पत्नी का नाम गंगाबाई.गंगाबाई चल नहीं सकतीं। घुटनों में दर्द है, कमर जवाब दे चुकी है, सांस भी अक्सर साथ छोड़ देती है. दवा चाहिए. डॉक्टर तक पहुंचना है. पर साधन नहीं है. इसलिए ठेला चलता है.चार किलोमीटर का रास्ता विदिशा के तिलाखेड़ी से खरीफाटक तक सामान्य आदमी के लिए कुछ नहीं, पर सुरेश सहारिया के लिए एक पहाड़ है. हर धक्का उनके शरीर से ज़्यादा उनके मन को थकाता है.

गंगाबाई धीमे से कहती हैं कि दस बरस हो गए बीमारी को। अब चल नहीं पाती. ठेले पर ही जाती हूं. पैसे कहां हैं.सुरेश चुप रहते हैं, फिर कहते हैं. सरकारी अस्पताल में कोई पूछता नहीं. अकेला हूं, उसे संभालना मुश्किल हो जाता है. इसलिए निजी डॉक्टर के पास जाता हूं. ऑटो के पैसे नहीं हैं, तो ठेला ही सहारा है. इनकी तबीयत ठीक नहीं है और कोई साधन नहीं है. बहुत दिनों से ले जा रहा हूं तकरीबन 3-4 किलोमीटर लेकर जाता हूं.

यह वही ठेला है जिससे सुरेश कभी सब्ज़ी बेचते थे, आज वही ठेला उनकी पत्नी को ढोता है.शायद जीवन ऐसे ही होता है जो हाथ कमाने के लिए उठता है, वही हाथ एक दिन सहारा बन जाता है.डॉक्टर का नाम है पद्म जैन. इलाज वहां होता है. भरोसा वहां मिलता है. सरकारी अस्पताल दूर नहीं है पर वहां पहुंचने का साहस, शक्ति और धैर्य चाहिए. जो उम्र के साथ कम हो जाता है.

जब प्रशासन को खबर मिली तो अधिकारी आए. इस पूरे मामले में सीएमचो डॉक्टर रामहित कुमार का कहना है जब यह सूचना हम लोगों  को प्राप्त हुई तो इनकी जानकारी के लिए एक टीम पहुंचाई. यह बुजुर्ग दंपति हैं इस वजह से एंबुलेंस के लिए संपर्क नहीं कर पाए अगर एंबुलेंस के लिए संपर्क करते तो उन्हें उपलब्ध कराई जाती.पर सुरेश ने बताया नहीं। शायद उन्हें लगा कोई सुनेगा नहीं. शायद उन्हें लगा ठेला तेज़ है.

इस कहानी में कोई अपराधी नहीं है. न कोई आरोपी. बस दो बूढ़े लोग हैं. और एक व्यवस्था है जो उनके लिए बनी है, पर उनके पास नहीं पहुंची. तिलाखेड़ी रोड पर उस दिन कोई हादसा नहीं हुआ था. पर एक सच्चाई ज़रूर चली थी ठेले पर.और वह सच्चाई यह थी कि जब दवा ठेले पर चलने लगे,तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं इंसान पैदल छूट गया है. 

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