BMC में ठाकरे राज का अंत, महायुति ने कैसे ढहाया शिवसेना का सबसे पुराना किला?

बीजेपी की अगुआई वाले महायुति गठबंधन ने मुंबई में 'ठाकरे ब्रांड' की उस राजनीति को ध्वस्त कर दिया है, जिसे एक दौर में मुंबई में अपराजेय माना जाता था.

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  • महायुति गठबंधन ने ठाकरे ब्रांड की उस राजनीति को ध्वस्त कर दिया, जिसे कभी मुंबई में अजेय माना जाता था
  • चौंकाने वाली बात यह रही कि 'मराठी मानुष' का वोट बैंक भी पूरी तरह ठाकरे भाइयों के पक्ष में नहीं रहा
  • सीएम देवेंद्र फडणवीस और महायुति ने उस नब्ज को पकड़ा जिसे ठाकरे भाइयों ने नजरअंदाज कर दिया
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मुंबई:

मुंबई के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है. एशिया की सबसे अमीर महानगर पालिका, बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के चुनाव नतीजों ने न सिर्फ ठाकरे परिवार की विरासत को तगड़ा झटका दिया है, बल्कि मुंबई के सियासी किले की शक्लोसूरत भी बदल दी है. बीजेपी की अगुआई वाले महायुति गठबंधन ने 'ठाकरे ब्रांड' की उस राजनीति को ध्वस्त कर दिया है, जिसे एक दौर में मुंबई में अपराजेय माना जाता था.

मुंबई के किले पर महायुति का कब्जा

बीएमसी के इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी का मेयर बनने का रास्ता साफ हो गया है. महायुति गठबंधन (बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना) ने कुल 118 सीटें जीतकर बहुमत के आंकड़े (114) को पार कर लिया है. दूसरी तरफ, 20 साल के बाद एक साथ आए ठाकरे भाई उद्धव व राज ठाकरे, शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन महज 96 सीटों पर सिमट गया.  ठाकरे, पवार, MNS को 72 सीटें मिली और कांग्रेस के खाते में 24 सीटें आई हैं. हजारों करोड़ के बजट वाली बीएमसी पर अब तक ठाकरे परिवार का जो वर्चस्व था, वह अब खत्म हो गया है.

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कांग्रेस की इस रणनीति, या फिर रणनीति की कमी का नतीजा यह हुआ कि कई वार्डों में विपक्षी वोट तीन या चार हिस्सों में बंट गए. इससे महायुति के उम्मीदवारों के लिए मामूली बहुमत के साथ भी जीत हासिल करना बेहद आसान हो गया. अगर विपक्ष एकजुट होता तो वह कड़ी चुनौती पेश कर सकता था लेकिन संगठन के अंदर की प्रतिद्वंद्विता और पुरानी रंजिशों ने इस एकता की राह में रोड़े अटका दिए.

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ठोस विजन की कमी से टूटे वोटर

ठाकरे गुट के पास भविष्य को लेकर किसी ठोस और प्रभावशाली विजन की कमी नजर आई. मराठी अस्मिता को खतरे में बताकर डर पैदा करने वाला उनका चुनाव प्रचार उन वोटरों के बीच बेअसर साबित हुआ जो 21वीं सदी के शहरी जीवन की वास्तविकताओं और चुनौतियों से जूझ रहे हैं. मुंबई में आबादी के बदलते स्वरूप को पार्टी के रणनीतिकारों ने या तो पूरी तरह अनदेखा किया या फिर उसे अपना विरोधी बना लिया. ऐसा लगा मानो वे आज के दौर के दशकों पुराने ढर्रे पर चुनाव लड़ रहे हों. नतीजा सबके सामने है. 

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