सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत आदेश पर न्यायिक मजिस्ट्रेट से मांगा स्पष्टीकरण

न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ एक व्यक्ति द्वारा दायर उस आवेदन पर विचार कर रही है, जिसे सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के पिछले साल सात मई के विशिष्ट अंतरिम आदेश के विपरीत जून में मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत (judicial custody) में भेजा गया था.

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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा है.
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने महाराष्ट्र के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट (judicial magistrate) से उनके द्वारा पारित उस हिरासत आदेश की व्याख्या करने के लिए कहा है जो शीर्ष अदालत के आदेश के विरोधाभासी था. न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ एक व्यक्ति द्वारा दायर उस आवेदन पर विचार कर रही है, जिसे शीर्ष अदालत के पिछले साल सात मई के विशिष्ट अंतरिम आदेश के विपरीत जून में मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत में भेजा गया था. शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि कथित धोखाधड़ी मामले के संबंध में उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.

पीठ ने जांच अधिकारी द्वारा राज्य की ओर से दायर किए गए जवाबी हलफनामे में प्रस्तुत किए गए हलफनामे पर संज्ञान लिया. हलफनामे में कहा गया था कि 18 जून, 2022 को मजिस्ट्रेट ने उस व्यक्ति के खिलाफ स्वत: से एक गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी किया था और बाद में निर्देश दिया कि उसे अदालत में पेश किये जाने के बाद न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाए और वारंट को रद्द करने के लिए एक आवेदन दायर किया जाए.

पीठ ने कहा, "हालांकि, मामले में आगे कुछ भी कहने से पहले, हम 24 जून, 2022 को आदेश पारित करने वाले मजिस्ट्रेट को स्पष्टीकरण का अवसर देना उचित समझते हैं." पीठ ने कहा कि मामले में शीर्ष अदालत द्वारा पारित आदेशों की प्रतियां और पुलिस निरीक्षक द्वारा दाखिल किये पांच जुलाई के हलफनामे की एक प्रति उस मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकती है, जिन्होंने 24 जून का आदेश पारित किया था.

गत 13 जुलाई को पारित अपने आदेश में पीठ ने कहा, "लातूर के पुलिस निरीक्षक द्वारा दायर पांच जुलाई, 2022 के जवाबी हलफनामे में दी गई जानकारी को ध्यान में रखते हुए... हम प्रथम दृष्टया पाते हैं कि मामले से निपटने वाले मजिस्ट्रेट को हिरासत आदेश की व्याख्या करने की आवश्यकता है." पीठ ने मामले को सुनवाई के लिए दो सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध किया.

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शीर्ष अदालत ने चार जुलाई को इसे आश्चर्यजनक बताया था कि पुलिस ने पिछले साल सात मई के उसके विशेष अंतरिम आदेश के बावजूद उस व्यक्ति के खिलाफ गैर जमानती वारंट हासिल किया था. अदालत में दाखिल जवाबी हलफनामे में पुलिस ने कहा था कि उन्होंने न तो गैर जमानती वारंट जारी करने का अनुरोध किया था और न ही उस व्यक्ति की हिरासत मांगी थी. सात जुलाई को, पीठ ने कहा था कि चार जुलाई को ही उसे अनुपालन रिपोर्ट मिल गई थी कि उस व्यक्ति को रिहा कर दिया गया है. पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उस व्यक्ति की गिरफ्तारी का जिक्र किया गया था और उसे रिहा करने का अनुरोध किया गया था.

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