सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों में महिला खतना प्रथा पर प्रतिबंध लगाने संबंधी याचिका पर केंद्र को नोटिस दिया

अदालत ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दावा किया गया है कि यह प्रथा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करती है.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खतना प्रथा पर प्रतिबंध लगाने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई
  • चेतना वेलफेयर सोसाइटी ने याचिका दायर कर बताया कि खतना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है
  • याचिका में पॉक्सो अधिनियम के तहत नाबालिगों के जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना अपराध माना गया है

सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों, विशेषकर दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिलाओं का खतना (एफजीएम) करने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने संबंधी याचिका पर विचार करने के लिए शुक्रवार को सहमत हो गया. न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर याचिका पर केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए.

किसने दायर की याचिका

अदालत ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी' की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दावा किया गया है कि यह प्रथा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करती है. याचिका में कहा गया है, “पॉक्सो (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत किसी नाबालिग के जननांगों को गैर-चिकित्सकीय कारणों से छूना कानून का उल्लंघन है. याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने महिला खतना को लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन करार दिया है.”

2018 में केंद्र का जवाब

इससे पहले 2018 में, दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा था. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करता है. इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि इसके लिए दंड विधान में सात साल तक कैद की सजा का प्रावधान भी है.

तब किसकी थी याचिका

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समाज में आम रिवाज के रूप में प्रचलित इस इस्लामी प्रक्रिया पर रोक लगाने वाली याचिका पर केरल और तेलंगाना सरकारों को भी नोटिस जारी किया था. याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट में वकील सुनीता तिहाड़ की याचिका पर कोर्ट में सुनवाई चल रही थी. तिहाड़ ने कहा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं.

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याचिका में लड़कियों का खतना करने की ये परंपरा न तो इंसानियत के नाते और न ही कानून की रोशनी में जायज है. क्योंकि ये संविधान में समानता की गारंटी देने वाले अनुच्छेदों में 14 और 21 का सरेआम उल्लंघन है. लिहाजा मजहब की आड़ में लड़कियों का खतना करने के इस कुकृत्य को गैर जमानती और संज्ञेय अपराध घोषित करने का आदेश देने की प्रार्थना की गई थी.

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