एक्सप्रेसवे को खतरे का गलियारा नहीं बना सकते; रोड पर भारी वाहनों की पार्किंग पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, गाइडलाइंस जारी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन का अधिकार’ केवल गैर‑कानूनी तरीके से जीवन छीने जाने से सुरक्षा नहीं देता, बल्कि यह राज्य पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वह ऐसा सुरक्षित माहौल बनाए, जहां मानव जीवन की रक्षा हो सके और उसका सम्मान किया जाए.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों पर कई कड़े दिशा-निर्देश जारी किए
  • राष्ट्रीय राजमार्गों पर भारी या व्यावसायिक वाहनों की सड़क पर पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है
  • अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 60 दिनों के भीतर सभी निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया है
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए पूरे देश में लागू होने वाले कई दिशा‑निर्देश जारी किए हैं.इनमें एक्सप्रेसवे पर भारी वाहनों की पार्किंग पर प्रतिबंध भी शामिल है. जस्टिस जे.के. महेश्वरी और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि नेशनल हाईवे देश की कुल सड़क लंबाई का केवल 2 प्रतिशत हैं, लेकिन इन पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में करीब 30 प्रतिशत मौतें होती हैं. सुप्रीम कोर्टने सड़क परिवहन मंत्रालय, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को सड़कें सुरक्षित बनाने के निर्देश दिए हैं. अदालत ने कहा कि अवैध पार्किंग, ब्लैक स्पॉट जैसी टाली जा सकने वाली वजहों से एक भी जान जाना राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता है.

एक भी जान जाना सुरक्षा व्यवस्था में कमी...

अदालत ने अपने 13 अप्रैल के आदेश में कहा कि टाली जा सकने वाली वजहों से एक भी जान का जाना राज्य की सुरक्षा जिम्मेदारी में कमी को दिखाता है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन का अधिकार' केवल गैर‑कानूनी तरीके से जीवन छीने जाने से सुरक्षा नहीं देता, बल्कि यह राज्य पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वह ऐसा सुरक्षित माहौल बनाए, जहां मानव जीवन की रक्षा हो सके और उसका सम्मान किया जाए.

क्या है पूरा मामला?
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) मामले में दिया है. यह मामला 2 और 3 नवंबर 2025 को राजस्थान के फलौदी और तेलंगाना के रंगारेड्डी में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 34 लोगों की मौत के बाद दर्ज किया गया था. अदालत ने कहा कि इन हादसों के पीछे प्रणालीगत लापरवाही और बुनियादी ढांचे की गंभीर खामियां थीं, जिनके कारण ये भीषण हादसे हुए. 

न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने देश‑भर के लिए दिशा‑निर्देश जारी करते हुए कहा,“यात्रियों की सुरक्षा को गरिमा के साथ जीने के अधिकार का एक अहम हिस्सा मानते हुए, जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राज्य का दायित्व है, यह जरूरी है कि इन समस्याओं की जड़ में जाकर समाधान किया जाए.इसी उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत यह अंतरिम निर्देश जारी किए जा रहे हैं.”
पीठ ने यह भी दोहराया कि कोई भी आर्थिक या प्रशासनिक कमी मानव जीवन की पवित्रता से बड़ी नहीं हो सकती. अदालत ने कहा कि दिए गए कड़े समय‑सीमा वाले निर्देश इस बात को दर्शाते हैं कि यह संवैधानिक जिम्मेदारी कितनी तत्काल और गंभीर है.

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सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर किसी भी भारी या व्यावसायिक वाहन को सड़क पर खड़ा या रोका नहीं जाएगा. ऐसे वाहन केवल निर्धारित पार्किंग बे, ले‑बाय या वे‑साइड सुविधा क्षेत्रों में ही खड़े किए जा सकेंगे.अदालत ने कहा है कि इस आदेश को लागू करने के लिए एडवांस्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ATMS) के जरिए रियल‑टाइम अलर्ट राज्य पुलिस को भेजे जाएंगे. इसके साथ ही जीपीएस के साथ समय‑मुद्रित फोटो सबूत और एकीकृत ई‑चालान प्रणाली का भी इस्तेमाल किया जाएगा.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन निर्देशों का पालन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), राज्य पुलिस, राज्य परिवहन विभाग के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को करना होगा. साथ ही, संबंधित जिलों के जिला मजिस्ट्रेट इन सभी विभागों के साथ मिलकर नियमित निरीक्षण और गश्त के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करेंगे. अदालत ने कहा कि इस आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर इन सभी निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

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ये अहम निर्देश भी शामिल

सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देशों में यह भी शामिल है कि राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) के राइट ऑफ वे (ROW) यानी सड़क की सीमा के भीतर किसी भी नए ढाबे, होटल, खाने‑पीने की दुकान या किसी भी व्यावसायिक निर्माण की अनुमति तुरंत प्रभाव से नहीं दी जाएगी. अदालत ने निर्देश दिया है कि जिला मजिस्ट्रेट 7 अगस्त 2025 को जारी सीएनएच एक्ट की प्रक्रिया और एसओपी के अनुसार 60 दिनों के भीतर सभी अवैध और अनधिकृत निर्माणों को हटाने या ध्वस्त करने की कार्रवाई सुनिश्चित करें.

कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी विभाग, प्राधिकरण या स्थानीय निकाय हाईवे से जुड़े सुरक्षा क्षेत्रों में किसी भी स्थान के लिए लाइसेंस,एनओसी या व्यापार अनुमति तब तक जारी या नवीनीकृत नहीं करेगा, जब तक कि पहले एनएचएआई या पीडब्ल्यूडी से मंजूरी न ली जाए. इसके साथ‑साथ, ऐसे सभी मौजूदा लाइसेंसों की 30 दिनों के भीतर समीक्षा की जाएगी. इसके अलावा अदालत ने निर्देश दिया कि जहां‑जहां से राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है, वहां संबंधित जिला मजिस्ट्रेट 15 दिनों के भीतर हर जिले में जिला हाईवे सुरक्षा टास्क फोर्स का गठन करें. यह टास्क फोर्स जिला प्रशासन, पुलिस, एनएचएआई (या संबंधित भूमि एजेंसी), पीडब्ल्यूडी और स्थानीय निकायों के अधिकारियों को शामिल करते हुए बनाई जाएगी.

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