श्रीकृष्ण जन्म भूमि-शाही मस्जिद विवाद में मुस्लिम पक्ष भी रखेगा अपनी दलील

आरोप लगाया गया है कि श्रीकृष्ण जन्म भूमि के बड़े हिस्से पर करीब चार सौ साल पहले औरंगजेब के फरमान से मंदिर ढहाने के बाद केशवदेव टीले और भूमि पर अवैध कब्जा कर शाही ईदगाह मस्जिद बनाई गई थी. इस याचिका में भी संसद से पारित धर्मस्थल कानून (प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट) 1991 को चुनौती दी गई है.

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नई दिल्ली:

श्रीकृष्ण जन्म भूमि-शाही मस्जिद विवाद (Shri Krishna Janmabhoomi-Shahi Masjid dispute) में मथुरा जिला अदालत में कृष्ण जन्म भूमि विवाद में हिंदू पक्षकारों की ओर से दलील पूरी हो गई है. अब मुस्लिम पक्ष दलीलें पेश करेगा. अगली सुनवाई अगले साल पांच जनवरी को तय की गई. मुस्लिम पक्षकार यानी शाही ईदगाह को लेकर दलीलें दी जाएंगी. याचिकाकर्ताओं के वकील विष्णु शंकर जैन के मुताबिक अब अदालत में  फिजिकल सुनवाई हो रही है. भगवान कृष्ण विराजमान की ओर से करीब सवा साल पहले दायर इस सिविल सूट की सुनवाई अब तक चार जजों के सामने हो चुकी है, क्योंकि पहले के जजों का तबादला हो चुका है.

अब मौजूदा जिला जज ने याचिकाकर्ता भगवान कृष्ण विराजमान के अंतरंग सखाओं यानी याचिकाकर्ताओं की दलील तो सुन ली है. अब विरोधी पक्ष  की ओर से दलील होगी. दरअसल भगवान कृष्ण विराजमान की ओर से श्री कृष्ण जन्म स्थान की 13.37 एकड़ जमीन वापस दिलाने की गुहार अदालत से लगाई गई है.आरोप लगाया गया है कि इसके बड़े हिस्से पर करीब चार सौ साल पहले औरंगजेब के फरमान से मंदिर ढहाने के बाद केशवदेव टीले और भूमि पर अवैध कब्जा कर शाही ईदगाह मस्जिद बनाई गई थी. इस याचिका में भी संसद से पारित धर्मस्थल कानून (प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट) 1991 को चुनौती दी गई है.

याचिकाकर्ता का कहना है कि धर्म स्थलों की संभाल और कानून व्यवस्था ये सब राज्य सूची का विषय है. इस बाबत कानून और नियम बनाने का अख्तियार राज्य सरकारों को ही है केंद्र को नहीं है. ऐसे में संसद ने ये कानून बनाकर राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है. केंद्र का ये अतिक्रमणकारी कदम संविधान के संघीय ढांचे की व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला है. लिहाजा अदालत इसे अवैध घोषित कर रद्द करे.

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ये वाद भगवान श्रीकृष्ण विराजमान, कटरा केशदेव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर की ओर से उनकी अंतरंग सखी के रूप में वकील रंजना अग्निहोत्री और छह अन्य सखाओं ने दायर किया है. हालांकि प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट 1991 इस मामले में आड़े आया हुआ है. इस कानून के जरिये अयोध्या में कभी विवादित रहे राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक मामले को ही अदालती फैसले के मुताबिक बदलाव की छूट मिली थी.

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मथुरा काशी सहित सभी धार्मिक और आस्था उपासना स्थलों के विवाद या स्थिति पर 15 अगस्त 1947 जैसी ही स्थिति बहाल रखने का प्रावधान किया गया है. इससे पहले मथुरा सिविल जज ने इस याचिका को खारिज कर दिया था. फिर इसे जिला जज की अदालत में चुनौती दी गई

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