ईरान युद्ध के बीच दिल्ली में सेमिनार, वकील-फौजी-प्रोफेसर सबने कहा- अमेरिका की कार्रवाई गलत

ईरान युद्ध के बीद दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में एक सेमिनार का आयोजन किया गया. इसमें सुप्रीम कोर्ट के वकील, रिटायर्ड फौजी, पत्रकार और प्रोफेसर शामिल हुए. उन्होंने एक सुर में ईरान पर अमेरिका की कार्रवाई को गलत बताया.

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  • दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में ईरान जंग पर सेमिनार में अंतरराष्ट्रीय कानून और नागरिक सुरक्षा पर चर्चा हुई
  • सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय हेगड़े ने ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताया
  • प्रोफेसर श्रीनिवास बुर्रा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोर देशों के लिए जवाबदेही का मुख्य माध्यम है
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नई दिल्ली:

ईरान-अमेरिका जंग के कारण पूरी दुनिया में फैली अशांति को लेकर दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में एक सेमिनार किया गया. इस सेमिनार में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े, साउथ एशिया यूनिवर्सिटी के प्रो. श्रीनिवास बुर्रा, वरिष्ठ पत्रकार कमर आगा, ईरानी दूतावास में सांस्कृतिक परामर्शदाता डॉ. फरीदोद्दीन फरीदासर, रिटायर्ड मेजर जनरल बिशंबर दयाल और ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह मुजताब के भारत में उप-प्रतिनिधि डॉ. मोहम्मद हुसैन जियाईनिया भी शामिल थे. सेमीनार में अंतरराष्ट्रीय कानून पर भी चर्चा हुई. साथ ही नागरिकों की सुरक्षा भी अहम मुद्दा था.

किसने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय हेगड़े ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि शक्तिशाली देश संयम और जिम्मेदारी के साथ बर्ताव करें. उन्होंने कहा कि ईरान पर इजरायल‑अमेरिका का हमला संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के नियमों का उल्लंघन करता है.. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के खिलाफ पूर्व‑निवारक युद्ध (प्री‑एम्प्टिव वॉर) अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अनुमेय नहीं है.

प्रो. श्रीनिवास बुर्रा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों के आधार पर इस युद्ध को सही ठहराना कठिन है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 2(4) का सबसे अधिक उल्लंघन पश्चिमी देशों ने किया है और इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोर देशों के लिए अपनी बात रखने और जवाबदेही तय करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है.

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डॉ. फरीदोद्दीन फरीदासर ने कहा कि मानवीय पीड़ा और वैश्विक स्तर पर अपनाए जा रहे दोहरे मापदंडो को देखना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शांतिपूर्ण वार्ताओं के बीच युद्ध शुरू किया गया, जिसमें ईरान के निर्दोष बच्चों की जान गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान को ही दोषी ठहराने के प्रयास किए गए. उन्होंने वैश्विक समुदाय से अपील की कि वह दोहरे मानदंडों को त्यागे, उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाए और न्याय के पक्ष में खड़ा हो.

वरिष्ठ पत्रकार कमर आगा ने कहा कि इस युद्ध का उद्देश्य क्षेत्र के तेल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना है, जैसा कि वेनेज़ुएला के मामले में देखा गया. उन्होंने क्षेत्रीय देशों को चेतावनी दी कि वे बाहरी शक्तियों को अपनी विदेश नीति तय न करने दें.

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डॉ. मोहम्मद हुसैन जियाईनिया ने इस जटिल और तकनीकी विषय पर चर्चा के लिए मंच उपलब्ध कराने के लिए आयोजकों का धन्यवाद किया. उनके संबोधन से पहले मिनाब स्कूल से जुड़े दो वीडियो दिखाए गए, जिन्हें देखकर दर्शक भावुक हो गए. इन दृश्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ईरान पर हुए हमलों को अत्यंत क्रूर बताया और नागरिकों और स्कूलों पर हुए हमलों का हवाला दिया. उन्होंने संप्रभुता, नागरिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानदंडों के पालन की जरुरत पर जोर दिया. साथ ही संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को जैसी संस्थाओं से अपने चार्टर के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता निभाने का आग्रह किया.

रिटायर्ड मेजर जनरल बिशंबर दयाल ने बल प्रयोग के बजाय संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या दुनिया फिर उस दौर की ओर लौट रही है, जहां बलपूर्वक किसी देश पर कब्जा कर लिया जाता था. उन्होंने कहा कि भविष्य में हमले या परमाणु हथियारों की आशंकाओं के आधार पर युद्ध को सही नहीं ठहराया जा सकता. युद्ध कोई समाधान नहीं है. सभी विवादों का समाधान बातचीत के जरिए ही होना चाहिए और सभी देशों को समान अधिकार प्राप्त हैं.

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विश्व शांति पर जोर

जहां प्रोग्राम में विश्व में शांति की बात पर जोर दिया गया. वहीं प्रोग्राम के अंत में सभी लोगों ने राष्ट्रगान गाकर इस प्रोग्राम का समापन किया. इस कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय कानून की अखंडता को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए. विशेष रूप से बल प्रयोग से जुड़े कानूनी ढांचे, नागरिकों की सुरक्षा और संघर्ष रोकने में कूटनीति की भूमिका को लेकर. इसमें सक्रिय कूटनीतिक वार्ताओं के बीच सैन्य कार्रवाइयों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई और चेतावनी दी गई कि ऐसी कार्रवाइयां बाध्यकारी कानूनी मानदंडों को कमजोर करती हैं और कूटनीति की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती हैं.

कितना होगा असर 

पैनलिस्टों ने 1945 के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था, बलपूर्वक क्षेत्र अधिग्रहण पर प्रतिबंध, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भूमिका और वैश्विक राजनीति में एकतरफा कथानकों और दोहरे मानदंडों पर चर्चा की. वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि अपनी सीमाओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोर देशों के लिए आक्रामकता को चुनौती देने और जवाबदेही तय करने का एक अहम साधन बना हुआ है.. पैनल ने सामूहिक रूप से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के सख्त पालन, अटकलों पर आधारित पूर्व‑निवारक युद्धों को खारिज करने और सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक समाधानों को प्राथमिकता देने की अपील की.

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