- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के गांधीनगर में 31 मार्च 2026 को सम्राट संप्रति संग्रहालय का उद्घाटन किया
- सम्राट संप्रति, सम्राट अशोक के पोते थे जिन्होंने जैन धर्म के प्रचार और सवा लाख मंदिरों का निर्माण कराया
- संग्रहालय में 2200 साल पुरानी जैन मूर्तियां, पांडुलिपियां, कलाकृतियां और मुगल सम्राट अकबर का फरमान भी है
Samrat Samprati Museum at koba tirth : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मार्च 2026 को महावीर जयंती पर गुजरात के गांधीनगर (कोबा तीर्थ) में सम्राट संप्रति संग्रहालय (Samrat Samprati Museum) का उद्घाटन किया. सम्राट संप्रति सम्राट अशोक के पोते थे. जिस तरह सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार दुनिया भर में किया, वैसा ही महान कार्य सम्राट संप्रति ने जैन धर्म के लिए किया. उनका साम्राज्य पाटलिपुत्र, उज्जैन से लेकर अफगानिस्तान तक फैला था. उन्होंने सवा लाख मंदिरों और जिनालयों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया. ये संग्रहालय जैन धर्म की विरासतों का खजाना है. इस संग्रहालय में जैन धर्म की 2200 साल पुरानी मूर्तियां, कलाकृतियां और दस्तावेज हैं.
कौन थे सम्राट संप्रति?
यह म्यूजियम मौर्य वंश के सम्राट संप्रति को समर्पित है. वो सम्राट अशोक के पोते थे और उन्होंने 224 से 215 ईसा पूर्व तक शासन किया था. उन्हें जैन धर्म का महान संरक्षक माना जाता है. सम्राट अशोक ने जैसे बौद्ध धर्म का प्रचार किया, वैसे ही सम्राट संप्रति ने पूरे भारत में अहिंसा और जैन धर्म के सिद्धांतों को फैलाया. उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग 1.25 लाख जैन मंदिरों का निर्माण या जीर्णोद्धार करवाया था.
samrat samprati museum
संग्रहालय की खासियतें
यह म्यूजियम श्री महावीर जैन आराधना केंद्र कोबा परिसर में है. ये म्यूजियम सात भव्य गैलरी में बांटा गया है. इनमें से प्रत्येक भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं का अनोखा उदाहरण पेश करता है. यहां 2000 से अधिक दुर्लभ खजाने सुरक्षित हैं. 200 ईसा पूर्व से लेकर मध्यकाल तक की पत्थर और धातु की नक्काशीदार मूर्तियां शामिल हैं. सदियों पुरानी दुर्लभ जैन पांडुलिपियां और ताड़ के पत्ते (Palm leaf) पर ग्रंथ लिखे गए हैं. इसमें मुगल सम्राट अकबर का मूल फरमान भी प्रदर्शित है, जो जैन धर्म के प्रति उनके सम्मान को दिखाता है.
2200 साल पुरानी विरासत
सम्राट संप्रति संग्रहालय में चांदी के रथ, प्राचीन सिक्के, तीर्थ पट और यंत्र पट्ट जैसी कलाकृति भी हैं. यहां इमर्सिव (Immersive) ऑडियो-विजुअल इंस्टॉलेशन, डिजिटल डिस्प्ले और आध्यात्मिक संगीत मन मोह लेता है. म्यूजियम में उन प्राचीन मंदिरों के अवशेष, नक्शे और उस समय की स्थापत्य कला (Architecture) के प्रमाण मौजूद हैं जो 2200 साल पुरानी निर्माण शैली को जीवंत करते हैं.सम्राट संप्रति म्यूजियम में 2200 साल पुराने इतिहास का उल्लेख मुख्य रूप से मौर्य साम्राज्य और सम्राट संप्रति के शासनकाल 224 ईसा पूर्व से जुड़ा है. आज से 2200 साल पहले ये स्वर्णिम युग था.
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samrat samprati museum Gallery
कौन थे जैन संत आचार्य पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज
इस म्यूजियम की परिकल्पना प्रसिद्ध जैन संत आचार्य पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज ने की थी. उन्होंने पिछले 60 सालों में भारत और नेपाल में लगभग 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा कर इन दुर्लभ प्राचीन पुरावशेषों को इकट्ठा किया. इस भव्य परियोजना को टोरेंट ग्रुप (Torrent Group) के यूएनएम फाउंडेशन (UNM Foundation) की मदद से तैयार किया गया है.यूएनएम फाउंडेशन ही इस म्यूजियम का संचालन और रखरखाव करेगा.
सम्राट संप्रति का शासन काल
सम्राट संप्रति, महान सम्राट अशोक के पोते और कुणाल के पुत्र थे. 2200 साल पहले जब उन्होंने मगध की गद्दी संभाली तो उनका साम्राज्य पाटलिपुत्र (आज के पटना) से लेकर उज्जैन और अफगानिस्तान की सीमाओं तक फैला था. म्यूजियम में उनके शासनकाल की गौरवगाथा और प्रशासनिक व्यवस्था को दिखाया गया है.
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दो हजार साल पुरानी प्रतिमाएं
म्यूजियम की सबसे बड़ी खासियत वहां रखीं 200 ईसा पूर्व यानी करीब 2200 साल पुरानी प्रतिमाएं हैं. इनमें तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं और मौर्यकालीन कला के नमूने शामिल हैं.प्राचीन लिपियां और शिलालेखों की प्रतिकृतियां और प्राचीन लिपियों (जैसे ब्राह्मी) के साक्ष्य मौजूद हैं. ये दस्तावेज बताते हैं कि कैसे सम्राट संप्रति ने अहिंसा के संदेश को शिलालेखों के माध्यम से आम जनता तक पहुंचाया था.
उज्जैन और पाटलिपुत्र का जुड़ाव
सम्राट संप्रति ने उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया था. म्यूजियम में उज्जैन और मालवा क्षेत्र से प्राप्त उन पुरावशेषों को रखा गया है जो 2200 साल पहले के व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्रों की कहानी कहते हैं. आमतौर पर मौर्य वंश के इतिहास में केवल चंद्रगुप्त और अशोक की चर्चा होती है, लेकिन यह म्यूजियम इतिहास के उस खोए हुए पन्ने को सामने लाता है, जिसने भारत की सांस्कृतिक एकता और अहिंसा की परंपरा को मजबूती दी थी.













