- कोच्चि में ईरानी नौसैनिक जहाज आईआरआईएस लवन को तकनीकी खराबी के बाद आपातकालीन अनुमति देकर डॉकिंग की सुविधा दी गई
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र सीमा समझौते और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर ईरानी जहाज को डॉक होने की अनुमति दी
- जयशंकर ने बताया कि जहाज में युवा कैडेट थे और स्थिति बिगड़ने के बावजूद भारत ने मानवीय दृष्टिकोण से कार्य किया
अमेरिका-इजरायल से जारी युद्ध के बीच केरल के कोच्चि में शुक्रवार को एक ईरानी नौसैनिक जहाज 'आईआरआईएस लवन' डॉकिंग करने आया. भारत ने तकनीकी खराबी की रिपोर्ट मिलने के बाद आपातकालीन अनुमति दी थी. यह घटना उस समय हुई, जब जियोपॉलिटिकल बदलाव के हालात बने हुए हैं. अभी हाल की ताजा घटना में एक ईरानी युद्धपोत के अमेरिकी टॉरपीडो से डूबने की घटना के बाद हलचल मची हुई है. रायसीना डायलॉग 2026 के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र सीमा समझौते (UNCLOS) और अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करता है. इसी आधार पर ईरानी जहाज को कोच्चि में डॉक होने की अनुमति दी गई.
हमें ईरानी पक्ष से मैसेज मिला था
रायसीना डायलॉग 2026 विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने विस्तार से बताया कि आखिर मिडिल ईस्ट में बिगड़े हालात के बीच कैसे ईरानी जहाज भारत के बंदरगाह पर आकर रुका है. भारतीय विदेश मंत्री ने बताया, ' मैं भी संयुक्त राष्ट्र सीमा समझौते (UNCLOS) और अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करता हूं. हमें ईरानी पक्ष से मैसेज मिला था कि एक जहाज, जो संभवतः उस समय हमारी सीमाओं के सबसे करीब था, हमारे बंदरगाह में आना चाहता था. वे बता रहे थे कि उन्हें कुछ तकनीकी समस्याएं आ रही हैं. 1 मार्च को हमने उन्हें अंदर आने की अनुमति दे दी, लेकिन उन्हें आने में कुछ दिन लगे और फिर वे कोच्चि में डॉक हुए. उनमें कई युवा कैडेट थे.'
श्रीलंका में भी ऐसी ही स्थिति थी
विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया, 'जब जहाज रवाना हुए थे और जब वे यहां पहुंचे, तो स्थिति बिल्कुल अलग थी. वे बेड़े की समीक्षा के लिए आ रहे थे और फिर वे एक तरह से घटनाओं के गलत पक्ष में फंस गए. जाहिर है, श्रीलंका में भी ऐसी ही स्थिति थी, उन्होंने जो निर्णय लिया, उसमें से एक दुर्भाग्यवश बच नहीं पाया. हमने कानूनी मुद्दों से परे मानवता के दृष्टिकोण से स्थिति का सामना किया और मुझे लगता है कि हमने सही काम किया.'
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हिंद महासागर एकमात्र ऐसा महासागर...
भारतीय विदेश मंत्री, 'ईरानी जहाज के भारतीय बंदरगाह पर आने को लेकर सोशल मीडिया पर काफी बहस चल रही है. लेकिन इस बहस में जाने से पहले हिंद महासागर की वास्तविकता को समझना चाहिए. डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में रहा है. पिछले पांच दशकों में जिबूती में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी इस सदी के पहले दशक के शुरुआती दौर में ही सामने आई. हंबनटोटा का अस्तित्व इसी दौरान उभरा. अगर हमें हिंद महासागर के प्रति एक विशेष भावना या पहचान विकसित करनी है, तो उसे संसाधनों, कार्यों, प्रतिबद्धताओं और व्यावहारिक परियोजनाओं से समर्थित होना होगा. हिंद महासागर एकमात्र ऐसा महासागर क्यों है, जिसका नाम किसी देश के नाम पर रखा गया है, क्योंकि हम इसके ठीक बीच में स्थित हैं. हमारी प्रगति से हिंद महासागर के अन्य देशों को लाभ होगा. जो हमारे साथ मिलकर काम करेंगे, उन्हें और अधिक लाभ मिलेगा. भारत का उदय भारत द्वारा ही निर्धारित होगा. यह हमारी शक्ति से निर्धारित होगा, न कि दूसरों की गलतियों से.'
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