RPF की इस महिला इंस्पेक्टर को लोग कर रहे 'सैल्यूट', रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दिया पुरस्कार

RPF इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा ने कहा, "रेलकर्मी के तौर पर हमारा दायित्व है यात्रियों और उनके सामानों की सुरक्षा करना विशेष कर बच्चों और कमजोर लोगों की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य है. यही वजह है कि हम निरंतर यह काम कर रहे हैं जिसमें हमें सफलता भी मिल रहे हैं."

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रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के हाथों सम्मान प्राप्त करती RPF इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा.
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  • रेलवे का ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते अभियान बच्चों को बाल मजदूरी और तस्करी से बचाकर परिवारों से मिलाने का मिशन है.
  • RPF इंस्पेक्टर चंदना ने वर्ष 2024 में 152 बच्चों को सुरक्षित बचाकर उनके परिवारों से मिलाने का कार्य किया.
  • चंदना को बाल मजदूरी से बच्चों की सुरक्षा के लिए भारतीय रेलवे का अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार प्रदान किया गया.
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नई दिल्ली:

भारतीय रेलवे ना सिर्फ यात्रियों को उनके मंजिल तक पहुंचा रही है, बल्कि उन्हें अपने बिछड़ों से भी मिला रहीं है. इसके लिए रेलवे "ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते" मुहिम चला रहा है जिसके अब तक नतीजे अच्छे देखने को मिल रहे हैं. यही वजह है कि रेलवे अपने उन कर्मचारियों को सम्मानित भी कर रहा है जो इस मुहिम को साकार करने में जुटे हैं और ऐसा ही कार्य किया है आरपीएफ इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा ने, जिन्हें हाल ही में रेल मंत्रालय ने सम्मानित किया है. उत्तरी रेलवे के लखनऊ मंडल में तैनात RPF इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा को हाल ही में भारतीय रेलवे का सर्वोच्च सम्मान अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार दिया गया है. चंदना को बच्चों को बाल मजदूरी से बचाने के लिए यह सम्मान मिला है. 

चंदना ने ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते के तहत साल 2024 में 152 बच्चों को सुरक्षित बचाकर उनके परिवारों से मिलाया. इसके अलावा, बचपन बचाओ समिति के साथ मिलकर 41 बच्चों को बाल श्रम और तस्करी से मुक्त कराया तथा उन्हें बाल कल्याण समिति को सौंपा. ऐसे में उनके साहस, समर्पण और बच्चों की सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को सम्मानित किया गया.

क्या है ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते

ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते भारतीय रेलवे सुरक्षा बल (RPF) द्वारा चलाया गया एक मिशन है, जिसका उद्देश्य रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में खतरे में पड़े या खोए हुए बच्चों जैसे भागे हुए, अनाथ, या शोषण के शिकार की पहचान करना और उन्हें बचाकर उनके परिवारों से मिलाना है, ताकि उन्हें बाल श्रम, अपराध या मानव तस्करी से बचाया जा सके. साल 2018 में शुरू हुए इस अभियान के तहत RPF हजारों संख्या में बच्चों को बचाकर उनके परिवार से मिलाया है.

प्लेटफॉर्म पर महिलाओं को बच्चों के बीच आरपीएफ इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा.

चंदना सिन्हा ने कहा, "रेलकर्मी के तौर पर हमारा दायित्व है यात्रियों और उनके सामानों की सुरक्षा करना विशेष कर बच्चों और कमजोर लोगों की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य है. यही वजह है कि हम निरंतर यह काम कर रहे हैं जिसमें हमें सफलता भी मिल रहे हैं."

RPF में आने का कैसे हुआ मन?

चंदना सिन्हा ने बताया कि दूरदर्शन पर “उड़ान” सीरियल को देखकर उन्हें मन में वर्दी पहनकर देश सेवा करने की इच्छा जगी. इसी प्रेरणा से उन्होंने साल 2010 में नौकरी शुरू की और 2024 से इस अभियान का हिस्सा बनकर काम करना शुरू किया. 

कैसे करते हैं बच्चों की पहचान?

उन्होंने कहा कि बच्चों की पहचान करना कठिन काम होता है. लेकिन इसके" हम प्रतिदिन 10 घंटे से भी अधिक समय यात्रियों के बीच रहते हैं. हर गतिविधि पर नजर रखते हैं. कई बार शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन बारीकी से देखने पर सच्चाई सामने आ जाती है. कई बार हम सिविल ड्रेस में यात्रियों के साथ घुल-मिलकर रहते हैं, ताकि संदिग्ध गतिविधियों को समय रहते पहचाना सके. " उन्होंने कहा कि कई बार सख्ती से पेश आने पर सच्चाई का पता चलता है.

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आरपीएफ इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा.

ऑनलाइन गेम और इंटरनेट का बच्चों पर असर 

चंदना ने कहा कि जो मामले सामने आ रहें हैं उसमें अधिकतर लड़के और लड़कियों की उम्र 12 से 15 साल की होती है. "ज्यादातर 12 से 15 साल की उम्र के बच्चे बहकावे में आकर घर से भाग रहें हैं, जिसकी मुख्य वजह ऑनलाइन गेम और इंटरनेट हैं. ये दोनों बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डाल रहा है."

उन्होंने बताया कि आजकल कई बच्चे और बच्चियाँ फ्री फायर जैसे ऑनलाइन गेम और स्नैपचैट के जरिये अनजान लोगों के संपर्क में आ जाते हैं. फिर उन्हें धीरे-धीरे बहलाया- फुसलाया जाता है और घूमाने या बेहतर जीवन के सपने दिखाकर घर से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया जाता है. जिसकी वजह से बच्चों पर असर हो रहा है. 

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मां-बाप की डांट का बच्चों पर बुरा असर 

RPF इंस्पेक्टर चंदना सिन्हा ने कहा, "हम जिन बच्चों और किशोरों को पकड़ रहे हैं उसमें यह देख रहें हैं कि कईयों पर इंटरनेट का दुष्प्रभाव गहरा असर डाल रहा है." वहीं, अच्छे घरों के बच्चों में समस्या एटीट्यूड को लेकर देखी जा रहीं है. कई बच्चे माता-पिता की डाँट से नाराज होकर घर छोड़ देते हैं क्यूंकि उन्हें लगता है कि वे अपने दम पर कुछ भी कर लेंगे. जबकि गरीबी और रोजगार की तलाश में कई लोग मानव तस्करी का शिकार हो रहें हैं. 

उन्होंने कहा कि अभी हम ऐसे मामलों में सिर्फ 1 प्रतिशत से भी कम लोगों तक पहुँच पा रहे हैं, लेकिन इसकी तादाद ज्यादा है. अगर हमें इसको और अच्छे से रोकना है तो आगे बहुत अधिक काम करना होगा. छत्तीसगढ़ की निवासी चंदना सिन्हा ने कहा बचाए गए बच्चों की काउंसलिंग भी कराई जाती है जिससे वे दोबारा ऐसी गलती न करें. साथ ही माता-पिता की भी काउंसलिंग कराई जाती है, जिससे वे बच्चों को बेहतर समझ सकें.

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