- राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो वर्ष बाद मंदिर का स्वरूप बहु-मंजिली धार्मिक संरचना बन चुका है.
- लगभग 1600 करोड़ रुपये की लागत से बना राम मंदिर परिसर सनातन संस्कृति और भारतीय स्थापत्य कला का जीवंत उदाहरण है.
- मंदिर परिसर में राम परिवार के साथ वाल्मीकि, विश्वामित्र, निषादराज जैसे रामायण पात्रों के मंदिर भी स्थापित हैं.
22 जनवरी 2024 को ‘जय श्रीराम' के उद्घोष के साथ जब रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी, तो ऐसा लगा मानो इतिहास ने अपनी अधूरी पंक्ति पूरी कर ली हो. सदियों का इंतज़ार, दशकों की राजनीति और वर्षों की कानूनी लड़ाई, सब एक क्षण में सिमट आए थे.
लेकिन आज, प्राण प्रतिष्ठा के दो साल बाद अयोध्या में खड़े होकर तस्वीर और साफ दिखती है. राम मंदिर ने इतिहास पूरा किया, लेकिन राजनीति नहीं.
अब सिर्फ गर्भगृह नहीं, राम दरबार
इन दो वर्षों में राम मंदिर सिर्फ ‘स्थापित' नहीं हुआ, बल्कि उसका स्वरूप भी बदला है. मंदिर की ऊपरी मंजिलों का निर्माण पूरा हो चुका है
प्रथम तल पर अब राम दरबार विराजमान है. राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान एक साथ विराजमान हैं. यह उस 'राजा राम' का प्रतीक है, जो केवल वनवासी नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम शासक हैं.
राम मंदिर अब एक-स्तरीय आस्था नहीं, बल्कि बहु-मंज़िली धार्मिक संरचना बन चुका है.
1600 करोड़ का परिसर: पूजा स्थल से सांस्कृतिक प्रतीक तक
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तीसरी वर्षगांठ के मौके पर मंदिर परिसर एक भव्य, सुव्यवस्थित और आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण स्वरूप में सामने है. करीब 1600 करोड़ रुपये की लागत से बना यह परिसर अब सनातन संस्कृति का केंद्र, भारतीय स्थापत्य का जीवंत उदाहरण और आधुनिक प्रबंधन का मॉडल बन चुका है.
क्या-क्या बदला राम जन्मभूमि परिसर में?
- मुख्य मंदिर का निर्माण पूर्ण
- गर्भगृह में बाल स्वरूप रामलला के दर्शन
- प्रथम तल पर राम परिवार की स्थापना
- करीब 800 मीटर लंबा परकोटा, जिसके भीतर भगवान शंकर, गणेश, सूर्यदेव, हनुमान, माता भगवती, माता अन्नपूर्णा के मंदिर हैं.
- इन छोटे मंदिरों ने पूरे परिसर को एक विराट धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र में बदल दिया है.
- मंदिर के शिखर पर अब 'ॐ' के चिन्ह और कोविदार वृक्ष की आकृति वाली धर्म ध्वजा शान से लहर रही है.
श्री राम के साथ रामायण के पात्र
राम मंदिर परिसर सिर्फ आस्था नहीं, समावेशन का भी संदेश देता है. यहां महर्षि वाल्मीकि, विश्वामित्र, वशिष्ठ, अगस्त्य और श्रीराम से जुड़े निषादराज, देवी अहिल्या, माता शबरी के मंदिर भी बनकर तैयार हैं. यह पूरा विकास राम के जीवन-दर्शन को मूर्त रूप देता है.
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अयोध्या में राम मंदिर के गर्भगृह में बाल स्वरूप में विराजमान रामलला
सुविधाओं का विस्तार: आस्था के साथ व्यवस्था
बीते दो वर्षों में अयोध्या की जमीन पर सिर्फ मंदिर नहीं बना, बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चर भी बदला है.
- 100 फीट चौड़ा राम जन्मभूमि पथ
- सुव्यवस्थित दर्शन मार्ग
- एलईडी स्क्रीन से सूचना प्रसारण
- स्थायी कैनोपी
- शुद्ध पेयजल
- स्वच्छ शौचालय
- दिव्यांगों के लिए व्हीलचेयर सुविधा
- जूता-चप्पल और सामान रखने के लिए लॉकर
- 25 हजार लोगों की क्षमता वाला तीर्थयात्री सुविधा केंद्र
- आधुनिक अस्पताल
- हाईक्लास एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन
आज अयोध्या केवल तीर्थ नहीं, व्यवस्थित धार्मिक नगरी बन चुकी है.
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विदेशियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है ये रामनगरी
अब अयोध्या में सिर्फ़ देशी श्रद्धालु नहीं आते. विदेशी डिप्लोमैट, बौद्ध देशों के प्रतिनिधि, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के सांस्कृतिक दूत, प्रवासी भारतीय प्रतिनिधिमंडल आते रहते हैं. विदेशी मेहमानों का अयोध्या आना अब राजनयिक प्रोटोकॉल का हिस्सा बनता जा रहा है. काशी और उज्जैन के बाद वैश्विक धार्मिक मानचित्र पर अयोध्या स्थायी बिंदु बन चुकी है. राम मंदिर भारत की धार्मिक सॉफ्ट पावर का स्थायी स्टेशन बन गया है.
सवाल भी उठे, लेकिन दिशा बदली
इन दो वर्षों में विस्थापन, जमीन विवाद, मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे. लेकिन गौर करने वाली बात यह रही कि सवाल मंदिर पर नहीं, प्रबंधन पर हुए.
दो साल बाद क्या हासिल
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दो साल बाद तस्वीर साफ है. राम मंदिर ने इतिहास बदला, अयोध्या ने भूगोल बदला, भारत ने सांस्कृतिक आत्मविश्वास पाया है. रामलला अब टेंट में नहीं बल्कि गर्भगृह में विराजमान हैं और अयोध्या अब सिर्फ आस्था की नगरी नहीं, भारत की पहचान की प्रयोगशाला बन चुकी है.













