त्रिभाषा फॉर्मूले पर बहस के बीच जानें-राष्ट्रभाषा बनने से कैसे पिछड़ी हिंदी, राजेंद्र प्रसाद ने याद दिलाया था मुगल काल

भाषा के सवाल पर संविधान सभा में भी डिबेट हुई थी. इस दौरान राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि देश की सभी भाषाओं को विकसित होने का मौका मिलना चाहिए. उन्होंने हिंदी को लेकर नसीहत दी थी कि इस भाषा को बोलने वाले लोगों को इसका विकास करना चाहिए कि सभी स्वीकार करें.

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  • CBSE ने त्रिभाषा फॉर्मूला लागू किया है, जिसमें नौवीं कक्षा के लिए तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी
  • बोर्ड ने कहा कि किसी भाषा को थोपने का दबाव नहीं होगा और विदेशी भाषाओं को हटाया नहीं जा रहा है
  • राजेंद्र प्रसाद ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर कहा था कि थोपना संभव नहीं और सभी भाषाओं का सम्मान जरूरी है
नई दिल्ली:

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE ने स्कूलों में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू किया है. इस मामले का विरोध करते हुए कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो अदालत ने इस पर जवाब मांग लिया है. इस पर सीबीएसई ने कहा कि देश भर में हमारे आधे से ज्यादा स्कूलों में 9वीं क्लास में बच्चों को तीन भाषाएं पढ़ाने के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं हैं. इसके अलावा बोर्ड ने यह भी कहा कि किसी के ऊपर किसी भाषा विशेष को पढ़ने का दबाव भी नहीं रहेगा. इसके अलावा विदेशी भाषा का प्रश्न भी आया. इस पर बोर्ड ने कहा कि हम विदेशी भाषाओं को हटा नहीं रहे हैं. 

भाषा को लेकर ऐसी ही डिबेट संविधान सभा में भी हुई थी. तब संविधान की मूल कॉपी अंग्रेजी में ही तैयार हुई थी और फिर हिंदी में उसका अनूदित संस्करण प्रस्तुत किया गया था. संविधान सभा के सदस्य आरवी धुलेकर ने भाषा वाला सवाल उठाया था. इस पर संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने विस्तार से बात की थी. उन्होंने हिंदी को ही राष्ट्रभाषा बनाए जाने के सवाल पर कहा था कि ऐसा वर्तमान में संभव नहीं है. उनका कहना था कि हमें कोई भाषा थोपनी नहीं चाहिए बल्कि उसे इस तरह से विकसित करना चाहिए कि सभी लोग उसे सहज रूप से स्वीकार कर लें. 

इसके अलावा उन्होंने भारत की भाषायी, सांप्रदायिक विविधता के बारे में भी बात की थी कि कैसे इसका सम्मान किया जाना चाहिए. अब नई शिक्षा नीति में जिस त्रिभाषा नीति की बात कही गई है, उसे भी हिंदी, क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान और अंग्रेजी सीखने की जरूरत के बीच संतुलन के नाम पर लाया गया है. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा की मीटिंग में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने विस्तार से हिंदी, अंग्रेजी की बहस को लेकर जवाब दिया था. उनका कहना था कि हमने हिंदी और अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया है. उन्होंने कहा था कि संविधान सभा को जिन समस्याओं को सुलझाने में काफी समय लगा, उनमें से एक देश के आधिकारिक उद्देश्यों (राजकाज) के लिए भाषा से संबंधित है.

'स्विट्जरलैंड जैसे छोटे से देश में हैं तीन आधिकारिक भाषाएं'

उन्होंने कहा था, 'यह एक स्वाभाविक इच्छा है कि हमारी अपनी भाषा होनी चाहिए. देश में प्रचलित भाषाओं की बहुलता के कारण आने वाली कठिनाइयों के बावजूद हम हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा (राजभाषा) के रूप में अपनाने में सफल रहे हैं. यह देश में सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है। मैं इसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखता हूं, जब हम यह विचार करते हैं कि स्विट्जरलैंड जैसे छोटे देश में तीन से कम आधिकारिक भाषाएं नहीं हैं और दक्षिण अफ्रीका में दो आधिकारिक भाषाएं हैं. यह एक समन्वय की भावना और देश को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने के संकल्प को दर्शाता है कि जिन लोगों की भाषा हिंदी नहीं है, उन्होंने स्वेच्छा से इसे आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया है.'

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मुगल काल का उदाहरण देकर कहा था- अरबी और फारसी जनता की भाषा नहीं बनीं

इसके आगे वह कहते है, 'अब (भाषा) थोपने का कोई सवाल ही नहीं है. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजी और मुस्लिम साम्राज्य के दौरान फारसी, अदालती और आधिकारिक भाषाएं थीं। यद्यपि लोगों ने उनका अध्ययन किया और उनमें दक्षता हासिल की, फिर भी कोई यह दावा नहीं कर सकता कि उन्हें बड़े पैमाने पर देश के लोगों द्वारा स्वेच्छा से अपनाया गया था.' अब सवाल क्षेत्रीय भाषाओं का था. इस पर भी राजेंद्र प्रसाद ने जवाब दिया था. उनता कहना था, 'इतिहास में पहली बार हमने एक ऐसी भाषा को स्वीकार किया है, जो पूरे देश में सभी आधिकारिक उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाने वाली भाषा होगी. मुझे आशा है कि यह एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा के रूप में विकसित होगी जिस पर सभी समान रूप से गर्व महसूस करेंगे, जबकि प्रत्येक क्षेत्र को न केवल अपनी अनूठी भाषा विकसित करने की स्वतंत्रता होगी बल्कि उसे इसके लिए प्रोत्साहित भी किया जाएगा. इसमें उसकी संस्कृति और परंपराएं समाहित हैं। 

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राजेंद्र प्रसाद ने कहा- हिंदी भाषा वालों की जिम्मेदारी कि समावेशी बनाएं

राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि संक्रमण (बदलाव) की अवधि के दौरान अंग्रेजी का उपयोग व्यावहारिक कारणों से अपरिहार्य माना जाएगा. इस निर्णय से किसी को भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है, जो विशुद्ध रूप से व्यावहारिक विचारों से प्रेरित है। अब पूरे देश का और विशेष रूप से हिंदी भाषी लोगों का कर्तव्य है कि वे इसे इस तरह से आकार दें और विकसित करें कि यह समावेशी भाषा बन सके और सभी लोग इसे स्वीकार करें.

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