राहुल को आई कांशीराम की याद, यूपी चुनाव से पहले बड़ा दांव, कांग्रेस के ऐसे थे BSP नेता से रिश्ते

कांशीराम का अपने राजनीतिक जीवन में कांग्रेस के साथ यही एकमात्र रिश्ता बना, जो केवल चुनाव तक रह सका. बहुमत से दूर कांशीराम अब नए साथी की तलाश में थे जो उन्हें थोड़े ही दिनों बाद मिला बीजेपी की शक्ल में. बीजेपी के समर्थन से एक बार फिर मायावती फरवरी 1997 में मुख्यमंत्री बनीं.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • राहुल गांधी ने कांशीराम की जयंती पर दलितों को लुभाने के लिए कांग्रेस की भूमिका पर नई रणनीति अपनाई है
  • 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोटों के समर्थन से कांग्रेस-सपा गठबंधन को उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता मिली थी
  • कांग्रेस और सपा दोनों दल 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में दलित वोट बैंक को साझा करने के लिए प्रयासरत हैं
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।
लखनऊ:

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बसपा संस्थापक और दिग्गज दलित नेता कांशीराम की जयंती के अवसर पर एक नया दांव खेला. अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए राहुल गांधी ने कांशीराम के बहाने दलितों को लुभाने की कोशिश की. लखनऊ में कांशीराम की जयंती के अवसर पर आयोजित सामाजिक परिवर्तन दिवस में कांशीराम को भारतरत्न देने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया. प्रस्ताव पारित होते समय राहुल गांधी मंच पर मौजूद थे. राहुल ने अपने भाषण में बड़ा पासा फेंकते हुए कहा कि अगर नेहरू जी ज़िंदा होते, तो कांशीराम कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते. इतना ही नहीं, उन्होंने यहां तक कहा कि अगर कांग्रेस ने दलितों को लेकर अपना काम ठीक से किया होता, तो कांशीराम को इतनी मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ती. 

क्‍या है राहुल की रणनीति?

कांशीराम की 2006 में हुई मृत्यु के बाद संभवतः पहला मौका है, जब राहुल गांधी कांशीराम जयंती के किसी कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. इसके पीछे की वजह साफ़ समझी जा सकती है. 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में दलितों के एक बड़े वर्ग ने इंडिया गठबंधन के दोनों सहयोगियों, कांग्रेस और सपा, का खूब साथ दिया था, जिसके चलते उन्हें जबरदस्त सफलता मिली और उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 43 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. एक बार फिर दोनों सहयोगी दलों की कोशिश इसी दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने की है. 

कांग्रेस-सपा की एक ही नजह नजर 

कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है, लेकिन राहुल गांधी दो दिन पहले ही जयंती से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हो गए, जबकि सपा की ओर से भी 15 मार्च को एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. ऐसे में, सपा और कांग्रेस कांशीराम जयंती के दिन भले ही मंच साझा ना करें, लेकिन दोनों का निशाना वही वोट बैंक है जो सालों से ज़्यादातर बसपा या बीजेपी के खाते में जाता रहा है. उम्मीद है कि दोनों दल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में साथ उतरेंगे और इसलिए दलित वोटों को एकसाथ करने के लिए अभी से लग गए हैं. 

कांग्रेस-BJP के लिए क्‍या थी कांशीराम की सोच?

वैसे कांशीराम से कांग्रेस या बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के रिश्ते पर नज़र डालें, तो उसे मौकापरस्ती से ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता था. ये बात कांशीराम ख़ुद स्वीकार भी करते थे. दरअसल, उनका मानना था कि समाज के पिछड़े और दलितों को न्याय और सम्मान दिलवाने के लिए सबसे ज़रूरी है सत्ता पर काबिज़ होना , और इसलिए इस लक्ष्य को पाने के लिए कोई भी राजनीतिक रास्ता अपनाने से गुरेज नहीं था. कांग्रेस से भी उनका नाता इसी सिद्धांत का प्रतीक था. वैसे कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को कांशीराम सांपनाथ और नागनाथ की संज्ञा देते थे. अपने इसी राजनीतिक सिद्धांत के तहत 1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांशीराम ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया और मिलकर चुनाव लड़ा. गठबंधन के तहत बीएसपी ने 296 जबकि कांग्रेस ने 126 सीटों पर चुनाव लड़ा. चुनाव में बीएसपी को 67 जबकि कांग्रेस को 33 सीटों पर जीत हासिल हुई, यानि बहुमत से कोसों दूर. तब उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड एक ही राज्य थे और विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 425 हुआ करती थी. 

Advertisement

जब कांशीराम ने किया था बीजेपी से गठबंधन

कांशीराम का अपने राजनीतिक जीवन में कांग्रेस के साथ यही एकमात्र रिश्ता बना, जो केवल चुनाव तक रह सका. बहुमत से दूर कांशीराम अब नए साथी की तलाश में थे जो उन्हें थोड़े ही दिनों बाद मिला बीजेपी की शक्ल में. बीजेपी के समर्थन से एक बार फिर मायावती फरवरी 1997 में मुख्यमंत्री बनी. हालांकि, ये दोस्ती भी छह महीने बाद ही टूट गई. 

ये भी पढ़ें :- कांग्रेस ने कभी सम्मान नहीं दिया, फिर अब कैसे...? कांशीराम को लेकर राहुल गांधी पर भड़कीं मायावती

Advertisement

यहां ये बताना ज़रूरी है कि इसके पहले वो मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और बीजेपी के साथ एक-एक बार गठबंधन कर चुके थे. 1993 में उन्होंने बाबरी मस्जिद घटना के बाद मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाया और एक विवादास्पद नारा दिया- ' मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम'. ये गठबंधन 1995 में टूट गया और पहली बार बीजेपी के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन ये गठबंधन भी महज कुछ महीने ही चल सका. 

ये भी पढ़ें :- कांग्रेस ने कभी सम्मान नहीं दिया, फिर अब कैसे...? कांशीराम को लेकर राहुल गांधी पर भड़कीं मायावती

Featured Video Of The Day
Iran Israel War: जंग में अमेरिका-इजरायल के खिलाफ डटा ईरान, क्या बोले मुसलमान? | Iran War News
Topics mentioned in this article