महाराजा रणजीत सिंह के सिंहासन में ऐसा क्या खास? राघव चड्ढा ने जिसे ब्रिटेन से वापस लाने की मांग उठाई

आप नेता राघव चड्ढा ने कहा, "मैं मांग करता हूं कि भारत सरकार अपने राजनयिक संबंधों का उपयोग करके ब्रिटेन सरकार से बात करे और उस सिंहासन को भारत वापस लाने का प्रयास करे. सिंहासन हमारे देश में वापस आना चाहिए. हमें महाराजा रणजीत सिंह के जीवन से प्रेरणा मिलती है."

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महाराजा रणजीत सिंह का सिंहासन
नई दिल्ली:

संसद के मानसून सत्र का आज चौथा दिन है. इस सत्र में नीट का मुद्दा छाया है, जिस पर विपक्षी नेता सरकार को घेर चुके हैं. इस बीच संसद में आप नेता राघव चड्ढा ने महाराजा रणजीत सिंह के स्वर्ण सिंहासन को ब्रिटेन से वापस लाने की मांग उठाई. राज्यसभा सांसद ने सरकार से अनुरोध किया कि देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से सिंहासन को भारत वापस लाया जाए.

लंदन के इस संग्रहालय में सिंहासन

फिलहाल यह सिंहासन वर्तमान में लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय में रखा हुआ है.अपने भाषण में, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद ने महाराजा रणजीत सिंह के जीवन और शासन के महत्व पर जोर दिया, उनकी वीरता, राज्य की नीतियों और मानवता पर प्रकाश डाला. उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह सिंहासन को लाने के लिए ब्रिटेन के साथ राजनयिक संबंधों का उपयोग करे, ताकि राजा की कहानियों से आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिले.

क्यों खास है सोने से बना ये सिंहासन

विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय के मुताबिक सुनार हाफ़िज़ मुहम्मद मुल्तानी ने महाराजा रणजीत सिंह के लिए यह सिंहासन बनाया था, ऐसा माना जाता है कि इसे 1805 और 1810 के बीच बनाया गया था. इस सिंहासन की बनावट से ही महाराजा के दरबार की भव्यता का अंदाजा हो जाता है. यह सिंहासन मोटी चादर के सोने से ढका हुआ है, जिसे कई बेशकीमती चीजों से सजाया गया है. इसका खास नुकीला बेस कमल की पंखुड़ियों के दो स्तरों से बना है. कमल पवित्रता और सृजन का प्रतीक है और पारंपरिक रूप से मूर्तिकला में हिंदू देवताओं के लिए एक सीट या सिंहासन के रूप में और चित्रकला में उनके चित्रण में उपयोग किया जाता है. सिख धर्मग्रंथों में कमल पवित्रता का एक रूपक भी है.

सिख खजाने की सामग्री, जिसमें सिंहासन भी शामिल है, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1849 में पंजाब पर कब्ज़ा करने के बाद ले ली गई थी. आभूषण और रत्न जड़ित कलाकृतियां, चांदी के फर्नीचर और दरबारी हथियारों की नीलामी लाहौर में विलय के तुरंत बाद की गई थी, लेकिन सिंहासन को लीडनहॉल स्ट्रीट में ईस्ट इंडिया कंपनी के संग्रहालय में प्रदर्शित करने के लिए लंदन भेज दिया गया था. सिंहासन को साउथ केंसिंग्टन संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसे बाद में विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय का नाम दिया गया.

राघव चड्ढा ने की ये मांग

राघव चड्ढा ने कहा, "मैं मांग करता हूं कि भारत सरकार अपने राजनयिक संबंधों का उपयोग करके ब्रिटेन सरकार से बात करे और उस सिंहासन को भारत वापस लाने का प्रयास करे. सिंहासन हमारे देश में वापस आना चाहिए. हमें महाराजा रणजीत सिंह के जीवन से प्रेरणा मिलती है." महाराजा रणजीत सिंह को "पंजाब का शेर" भी कहा जाता है. जिन्होंने पंजाब को एकजुट किया, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों, न्याय, समानता और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा दिया और उनकी विरासत भारत की सीमाओं से परे फैली हुई है.

राघव चड्ढा की मांग महाराजा रणजीत सिंह की अविश्वसनीय विरासत और योगदान को स्कूली पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने के आह्वान के साथ आई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि छात्र उनकी यात्रा और सुशासन के बारे में और अधिक जान सकें. इस कदम का उद्देश्य भारत के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक प्रतीकों में रुचि को पुनर्जीवित करना, राष्ट्रीय गौरव और एकता को बढ़ावा देना है.

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राघव चड्ढा ने ट्वीट कर दी जानकारी

आप नेता ने एक्स पर कहा, "मैंने यह भी मांग की कि हम अपने इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह जी की अविश्वसनीय विरासत और योगदान को अपनी स्कूली पाठ्यपुस्तकों में शामिल करें ताकि छात्र उनकी यात्रा और सुशासन के बारे में जान सकें."

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