ऐन चुनाव से पहले भूपेन बोरा के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को असम में कितना नुकसान? एक बार फिर लीडरशिप नाकाम

भूपेन के पार्टी छोड़ने के बाद गुवाहाटी पहुंची प्रियंका गांधी ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार पूरे प्रदेश के ब्लॉक अध्यक्षों के साथ बैठक की तब भूपेन के इलाक़े के ब्लॉक अध्यक्ष भी मौजूद रहे और पार्टी को भरोसा दिलाया कि ‘नेता’ के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस भूपेन के बीजेपी में शामिल होने का इंतज़ार कर रही थी.

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असम चुनाव को लेकर प्रियंका गांधी हैं तैयार
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  • असम प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा ने विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर BJP जॉइन की है
  • भूपेन बोरा का कांग्रेस से तीस वर्षों का जुड़ाव रहा और वे पिछड़े वर्ग के कूच राजवंशी समाज से आते हैं
  • बोरा के इस्तीफे से कांग्रेस को सामाजिक समीकरणों में बड़ा नुकसान हुआ
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नई दिल्ली:

असम प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा रविवार को औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बोरा ने इसी हफ़्ते के पहले दिन यानी सोमवार को कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर पार्टी को बड़ा झटका दिया. हालांकि रविवार को कांग्रेस के किए राहत की बात यह रही कि बोरा के साथ कोई और बड़ा नेता या बड़ी संख्या में कार्यकर्ता बीजेपी दफ्तर नहीं पहुंचे. 

सवाल है कि बोरा के तौर पर कांग्रेस ने क्या खोया है और क्या उसकी भरपाई हो पाएगी? 

बोरा का कांग्रेस से जुड़ाव बीते तीस सालों का था. उन्होंने एनएसयूआई की छात्र राजनीति से शुरू कर यूथ कांग्रेस से होते हुए ख़ुद को प्रदेश की राजनीति में स्थापित किया. 2006 और 2011 में उन्होंने लखीमपुर जिले की बिहपुरिया विधानसभा से विधानसभा चुनाव जीता. सीएम तरुण गोगोई ने उन्हें अपनी सरकार में संसदीय सचिव बनाया. इस बीच भूपेन बोरा कांग्रेस आलाकमान की नज़र में आ गए और उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय टीम में सचिव बनाया गया. लेकिन 2016 विधानसभा चुनाव में बोरा अपनी सीट नहीं बचा पाए. 2021 में भी हार का सिलसिला जारी रहा. 2021 विधानसभा चुनाव के फौरन बाद बोरा को असम प्रदेश कांग्रेस की कमान मिल गई. 

कांग्रेस आलाकमान ने दो वजहों से बोरा पर भरोसा किया. पहला था संगठन में उनका लंबा अनुभव.. दूसरा था सामाजिक समीकरण.. भूपेन बोरा पिछड़े वर्ग में आने वाले कूच राजवंशी जाति से हैं. इस समाज की बड़ी तादाद पूरे असम में है. ब्रह्मपुत्र घाटी के आधा दर्जन जिलों जैसे लखीमपुर, तेजपुर, धेमाजी, दरंग, बरपेटा आदि में इस समाज के लोग प्रभावी संख्या में हैं.

अब जब भूपेन बोरा बीजेपी चले गए हैं तो कांग्रेस को असली झटका इसी मोर्चे पर लगा है. भले ही बोरा की पूरे असम में कोई बड़ी अपील ना रही हो लेकिन उन्हें अपने समाज का बड़ा और गंभीर नेता माना जाता है. यही वजह है कि भूपेन के इस्तीफे के अगले ही दिन सीएम हिमंत बिस्वा सरमा उनके घर पहुंच गए. बोरा पहले से हिमंत के करीबी रहे हैं. 2015 में बीजेपी में शामिल होने से पहले हिमंता ख़ुद कांग्रेस में ही थे. 

भूपेन से जुड़े डैमेज कंट्रोल के लिए कांग्रेस यही संदेश देने की कोशिश कर रही है वो सीएम हिमंत बिस्वा सरमा के साथ काफ़ी पहले से संपर्क में थे और कांग्रेस की रणनीति उन्हें बताते रहते थे. सामाजिक मोर्चे पर कांग्रेस रिपुन बोरा का इस्तेमाल कर सकती है जो उसी समाज से आते हैं और भूपेन के ठीक पहले असम प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे. लेकिन ख़ुद रिपुन बोरा भी प्रदेश अध्यक्ष से हटाए जाने के बाद कांग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे लेकिन दो सालों में घर वापसी कर ली. 

बहरहाल कांग्रेस के लिए असम विधानसभा चुनाव की कमान अब प्रियंका गांधी ने संभाल ली है. गुवाहाटी में दो दिन स्थानीय नेताओं के साथ लंबी बैठक के बाद प्रियंका दिल्ली में उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दे रही हैं और मजबूत गठबंधन की रणनीति बना रही हैं. उन्होंने गुवाहाटी में बीजेपी सरकार के खिलाफ़ चार्जशीट जारी किया. 

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भूपेन बोरा को भुला कर कांग्रेस जोर शोर से असम की बीजेपी सरकार की कथित नाकामियों और सीएम के कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाने में जुट गई है. आने वाले दिनों में कांग्रेस लुभावनी घोषणाएँ भी करेगी और मन ही मन में किसी चमत्कार की दुआ भी मांगेगी.

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