झारखंड के धनबाद से आपराधिक नेटवर्क और राज्य पुलिस के बीच ऑन‑गोइंग खेल का एक नया निर्णायक मोड़ आ चुका है. प्रिंस खान गैंग का माना जाने वाला उसका दाहिना हाथ और डिजिटल थिंक टैंक 'सैफी अब्बास नकवी' उर्फ सैफी उर्फ मेजर अब धनबाद पुलिस की हिरासत में है. इंटरपोल और झारखंड‑बंगाल पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में उसे दुबई से गिरफ्तार कर कोलकाता लाया गया, और अब उसे धनबाद पुलिस के 3‑दिन के रिमांड पर भेज दिया गया है. पुलिस को उम्मीद है कि इस रिमांड में गैंग के नेटवर्क, फंडिंग, फरार सरगना प्रिंस खान के ठिकाने और रंगदारी के बंटवारे तक जैसे कई राज खुलेंगे.
सैफी अब्बास कौन है?
सैफ अब्बास नकवी उर्फ सैफी उर्फ मेजर धनबाद से ताल्लुक रखने वाला शख्स है, जिसे गैंग के भीतर सैफी और मेजर के नाम से जाना जाता है. पुलिस और जांच एजेंसियों के मुताबिक प्रिंस खान और गोपी खान के बाद गैंग में सैफी की हैसियत नंबर तीन की थी. यानी गैंग का एक मजबूत और भरोसेमंद स्तंभ. वह गैंग में 'टेक्नोक्रेट' और डिजिटल थिंक टैंक की भूमिका निभाता था. उसके पास अच्छी इंग्लिश, तेज दिमाग और डिजिटल मीडिया की गहरी समझ है, जिसे गैंग ने धमकी, ऑनलाइन वसूली और ऑपरेशन मैनेजमेंट के लिए भरपूर इस्तेमाल किया.
दुबई में कैसे हुई गिरफ्तारी
सैफी करीब 5 साल से भगोड़ा था. वह यूएई के अजमान में छिपकर गैंग को ऑनलाइन और डिजिटल रूप से ऑपरेट कर रहा था. मीडिया रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि वह वहां एक लॉन्ड्री बिज़नेस चलाकर खुद को ढकोसला करता था, जबकि असली काम रंगदारी और फंड‑फ्लो मेनेजमेंट था. इंटरपोल की मदद से धनबाद पुलिस ने उसका डिजिटल ट्रेल ट्रैक किया और उसकी लोकेशन को दुबई‑अजमान क्षेत्र में पकड़ लिया. वहां से उसे गिरफ्तार कर भारत लाया गया.
उसे कोलकाता एयरपोर्ट पर इंटरपोल और झारखंड‑बंगाल टीम ने रिसीव किया, जहां प्रारंभिक पूछताछ की गई. बाद में उसे पश्चिम बंगाल से ट्रांजिट रिमांड पर धनबाद लाया गया और कोर्ट ने उसे 3 दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया, ताकि झारखंड पुलिस उससे गहन जांच कर सके.
गैंग में सैफी की भूमिका
सैफी रंगदारी वसूली के सिस्टम का बड़ा आर्किटेक्ट माना जाता है. व्यापारियों और दुकानदारों को वही धमकी भरे ऑडियो, वीडियो और मैसेज अक्सर उसी के जरिए भेजे जाते थे, जिससे डिजिटल डर को गैंग ने अपना मुख्य हथियार बना लिया था. वह गैंग के अवैध वित्तीय लेन‑देन, हवाला‑चैनल और बैंक‑अकाउंट मैनेजमेंट में भी अहम भूमिका निभाता था. रिपोर्ट्स के मुताबिक रंगदारी की रकम वही हवाला और अन्य निष्क्रिय स्ट्रक्चर के जरिए विदेश तक भेजवाता है.
लेकिन, पिछले कुछ महीनों में गैंग के भीतर रंगदारी के बंटवारे, फंड‑फ्लो में कमी और अलग‑अलग गुर्गों के नेटवर्क के कारण गैंग खुद‑ही टूटने लगा. कई गुर्गे ने अपना अलग नेटवर्क बनाया, जिससे प्रिंस खान से दूरी बढ़ी,कुछ ने रंगदारी देना बंद भी कर दिया,और रुपये का फ्लो कम होने से गैंग में बिखराव और भीतरी दरारें पैदा हो गईं.
रिमांड में क्या खुल सकते हैं राज?
पुलिस और एसटीएफ अब इस बात पर फोकस कर रहे हैं कि सैफी से पूछताछ से प्रिंस खान के वर्तमान ठिकाने, यात्रा‑रूट और उसके नए नेटवर्क की जानकारी निकल सकती है. गैंग के अन्य गुर्गों, फंड‑मैनेजर्स और हथियार‑सप्लाई चेन से जुड़े लोगों के नाम और भूमिका उजागर होने की उम्मीद है, जिससे झारखंड‑बंगाल‑बिहार तक फैला अंडरवर्ल्ड नेटवर्क ध्वस्त हो सकता है.














