Explainer: पेट्रोल बचाने के लिए PM मोदी का कार पूलिंग आइडिया सुपरहिट, लेकिन भारत में क्यों फंसा है कानूनी पेंच? समझिए

Carpooling in India: कैसे मोटर व्हीकल एक्ट का पेंच, टैक्सी यूनियनों का विरोध और इंश्योरेंस कंपनियों के नियम आम नौकरीपेशा लोगों के लिए कारपूल करना आफत बना रहे हैं? समझिए पूरी बात

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भारत में कार पूलिंग को लेकर क्या कहता है कानून
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  • भारत में प्राइवेट वाहन का पैसे लेकर सवारी ढोना मोटर वाहन अधिनियम के तहत गैरकानूनी है
  • कानून में कार पूलिंग को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित नहीं किया गया है, लेकिन इसे लागू करने में कठिनाई आती है
  • इंश्योरेंस कंपनियां कार पूलिंग को कमर्शियल इस्तेमाल मानकर दुर्घटना में क्लेम अस्वीकार कर देती हैं
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नई दिल्ली:

देशभर में इन दिनों पेट्रोल-डीजल के संभावित संकट से निपटने के उपायों पर गंभीर चर्चा हो रही है. मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने की अपील की है. इसकी मिसाल पेश करते हुए खुद पीएम मोदी समेत देश के तमाम मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, नेताओं और आला अफसरों ने अपने काफिले की गाड़ियां भी कम कर दी हैं. पीएम मोदी की इस अपील में ईंधन बचाने के लिए 'कार पूलिंग' (Car Pooling) का एक अहम सुझाव भी शामिल है. कार पूलिंग का सीधा सा मतलब है- अपनी गाड़ी में अकेले सफर करने के बजाय, एक ही दिशा में जा रहे अन्य लोगों या सहकर्मियों के साथ सफर साझा करना. दुनिया के कई देशों में यह व्यवस्था बेहद आम है और वहां की सरकारें इसे सक्रिय रूप से बढ़ावा भी देती हैं. लेकिन भारत में, खासकर दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और महाराष्ट्र के बड़े शहरों में यह इतना आसान नहीं है. यहां ऑफिस जाने वालों के लिए अपनी गाड़ी में सहकर्मियों को बिठाना या कारपूलिंग ऐप्स का इस्तेमाल करना किसी झमेले से कम नहीं है. एक तरफ आरटीओ (RTO) का चालान कटने का डर सताता है, तो दूसरी तरफ टैक्सी यूनियनों के भारी विरोध का सामना करना पड़ता है. ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या भारत में कारपूलिंग सच में गैरकानूनी है?  जब देश के प्रधानमंत्री खुद इसकी वकालत कर रहे हैं, तो आखिर इसके रास्ते में कानूनी रोड़े क्या हैं? आइए इस पूरे विवाद को विस्तार से समझते हैं.

कार पूलिंग पर विवाद क्यों?

भारत में मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) 1988 के तहत सफेद नंबर प्लेट वाली गाड़ियां यानी प्राइवेट वाहन का कमर्शियल इस्तेमाल यानी पैसे लेकर सवारी ढोना गैरकानूनी है. कमर्शियल काम के लिए पीली नंबर प्लेट और कमर्शियल परमिट अनिवार्य है. इस परमिट के लिए कैब ड्राइवर कमर्शियल फीस, रोड टैक्स और  कमर्शियल इंश्योरेंस के भारी भरकम पैसे चुकाते हैं. उनका आरोप है कि प्राइवेट कार वाले बिना ये टैक्स दिए उनका रोजगार छीन रहे हैं. इसलिए अक्सर टैक्सी यूनियन कार पूलिंग कर रहे लोगों को परेशान करते हैं. कई मामलों में टैक्सी यूनियन से जुड़े लोग कार पूलिंग कर रहे लोगों के साथ मारपीट तक कर देते हैं.

दिल्ली-नोएडा में कैब चलाने वाले रोशन लाल बताते हैं कि ओला, उबर जैसे ऐप कार पूलिंग का विकल्प ही नहीं देते. ऐसे में वो चाहकर भी इसे नहीं कर सकते. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ प्राइवेट गाड़ी वाले दिल्ली से गुड़गांव या दूसरे शहर जाते हैं तो पैसे लेकर दूसरे लोगों को भी कार में बैठाते हैं. ऐसा करके वो अपना पेट्रोल का खर्चा भी बचाते हैं और एक्स्ट्रा कमाई भी करते हैं. ऐसे कार वालों को कोई टैक्स भी नहीं देना होता. लेकिन इससे हम कैब वालों का नुकसान होता है.

अगर देखा जाए तो तकनीकी रूप से अपनी गाड़ी में किसी को बिठाकर बिना मुनाफे के सिर्फ पेट्रोल और टोल का खर्च बांटना यानी कॉस्ट शेयरिंग अपराध नहीं है. लेकिन सड़क पर ट्रैफिक पुलिस या RTO के सामने यह साबित करना बहुत मुश्किल होता है कि आप मुनाफा नहीं कमा रहे हैं.

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भारत में कार पूलिंग को लेकर क्या कहता है कानून?

दिल्ली हाई कोर्ट के वकील अनुज कुमार ढाका ने NDTV को बताया कि कार पूलिंग के लिए कोई स्पष्ट कानून नहीं है. उनके मुताबिक, कानून कार पूलिंग को नहीं रोकता, बल्कि सिस्टम इसे ठीक से लागू नहीं कर पा रहा है. हमारे कानून में मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत 'शेयर्ड मोबिलिटी'का प्रावधान पहले से है. एक्ट की धारा 2(7) मोटर कैब में 'फेयर-शेयरिंग' यानी किराया बांटने को कानूनी मान्यता देती है.

अधिनियम की धारा 67 राज्य सरकारों को यह अधिकार देती है कि वे इसके लिए नियम बनाएं, किराया तय करें और यात्रियों का शोषण रोकें. इसके अलावा, आपातकालीन स्थिति में सरकार धारा 115 के तहत 'सिंगल-ऑक्यूपेंसी' यानी गाड़ी में सिर्फ अकेले ड्राइवर वाले वाहनों पर प्रतिबंध भी लगा सकती है.

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ढाका कहते हैं कि  जब टैक्सी यूनियन या ट्रांसपोर्ट सिंडिकेट हड़ताल करते हैं या शेयर्ड राइड्स को डरा-धमकाकर रोकते हैं, तो यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) का उल्लंघन है, जो देश में कहीं भी निर्बाध घूमने की आजादी देता है. इसके अलावा, यह मोटर वाहन अधिनियम की धारा 74 और 178 का भी उल्लंघन माना जाता है.

कार पूलिंग में इंश्योरेंस वाला भी है पेंच

बात सिर्फ पुलिस के चालान या टैक्सी यूनियनों के गुस्से तक ही सीमित नहीं है. असली झटका तब लगता है जब खुदा-ना-खास्ता गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाए. आपने अपनी जेब से लाखों का इंश्योरेंस कराया होगा, लेकिन कारपूलिंग ऐप से पेट्रोल का खर्च लेते ही आपकी पॉलिसी 'रद्दी का टुकड़ा' बन जाती है. इंश्योरेंस कंपनियां इसे कमर्शियल इस्तेमाल मानकर क्लेम रिजेक्ट कर देती हैं. यानी गाड़ी का नुकसान भी आपका और सह-यात्रियों के इलाज का खर्च भी आपकी जेब से. इसलिए भारत में ज्यादातर लोग अपनी निजी गाड़ी में कार पूलिंग करने से बचते हैं.

दूसरे देशों में क्या है नियम

भारत में जहां कार पूलिंग झंझट का मामला है, तो वहीं दुनिया के कई देशों ने इसका स्मार्ट और व्यावहारिक समाधान निकाला है. यूरोप के देशों में इसे लेकर कानून है. वहां कोई ड्राइवर अगर कार पूलिंग के जरिए केवल तेल और टोल की लागत वसूल रहा है यानी कोई मुनाफा नहीं कमा रहा है, तो उसे कमर्शियल नहीं माना जाएगा. वहीं अमेरिका में तो सरकार कारपूल करने वालों को अपराधी की तरह रोकने के बजाय उनके लिए एक्सप्रेसवे पर अलग से हाई-ऑक्यूपेंसी व्हीकल लेन्स (HOV Lanes) रिजर्व रखती है, जिससे कारपूल करने वाले लोग ट्रैफिक से बचकर तेजी से निकल जाते हैं और वहां की बीमा कंपनियां भी नो-प्रॉफिट कारपूलिंग पर पूरा क्लेम देती हैं.

कार पूलिंग देश की जरूरत क्यों बन गई?

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव की वजह से होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई लगभग ठप पड़ गई है. यहां से दुनिया के 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई होती है. भारत भी अपना आधे से ज्यादा कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से आयात करता है. अगर यह सप्लाई बाधित होती है, तो देश में ईंधन की कमी और भयंकर महंगाई आ सकती है. इसलिए ईंधन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास जरूरी है. इसमें कार पूलिंग काफी प्रभावी उपाय साबित हो सकता है. 

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आखिर समाधान क्या है?

कार पूलिंग ईंधन संकट के समय काफी कामयाब उपाय हो सकता है. लेकिन इसे बढ़ावा देने के लिए सिर्फ लोगों से अपील करना काफी नहीं है, बल्कि सिस्टम में भी बदलाव की जरूरत है. इसके लिए सरकारों को मजबूत इच्छाशक्ति दिखानी होगी. कार पूलिंग का विरोध करने से किसी यूनियन का भला नहीं है. सरकार को कैब ड्राइवरों और यूनियनों के साथ मिलकर एक रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल तैयार करना होगा. इसके अलावा बीमा कंपनियों को भी पॉलिसी में बदलाव करना होगा और कारपूलिंग के लिए भी कवरेज देना होगा.

केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है. हाल ही में मंत्रालय ने 'भारत टैक्सी' प्लेटफॉर्म शुरू किया है. सरकार इस ऐप में ही कार पूलिंग का ऑप्शन जोड़ सकती है. ऐप में ही सफर का किराया वगैरह दिखे. इससे कार पूलिंग करने वाले ड्राइवर और सफर करने वाले यात्रियों की जानकारी भी उपलब्ध हो सकेगी. इससे सफर सुरक्षित और आसान हो सकेगा.

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