- संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होने की संभावना है.
- अविश्वास प्रस्ताव के लिए दो सांसदों के हस्ताक्षर, 50 सदस्यों का समर्थन और 14 दिन का नोटिस जरूरी है.
- विपक्ष के 118 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिसमें TMC भी शामिल है.
संसद के बजट सत्र का आज दूसरा चरण शुरू होने जा रहा है. इस दौरान सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होने की संभावना है. लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ विपक्ष ने बजट सत्र के पहले चरण में ही नोटिस दिया था, जिस पर 118 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं. उस वक्त इस नोटिस पर तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने हस्ताक्षर नहीं किया था, लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि वे विपक्ष के लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करेंगे.
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए नियम ये है कि दो सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए, 14 दिन का नोटिस देना होगा और सदन में 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए. लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के इस मामले में कांग्रेस के तीन सांसदों मोहम्मद जावेद, कोडिकुनिल सुरेश और मल्लू रवि ने नोटिस दिया है और उसके समर्थन में विपक्ष के 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं. नोटिस में कहा गया है कि सदन में नेता प्रतिपक्ष और अन्य विपक्षी नेताओं को बोलने नहीं दिया गया. आठ विपक्षी सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित किया गया. विपक्ष की महिला सांसदों के खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए गए.
नोटिस मंजूर होने के बाद होगी बहस
एक बार इस नोटिस के मंजूर होते ही बहस का समय निर्धारित किया जाएगा और लोकसभा में बहस होगी. लोकसभा के अध्यक्ष इस बहस के दौरान अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे. वैसे नियम है कि लोकसभा की कार्यवाही का संचालन उपाध्यक्ष करेंगे, लेकिन अभी तक उपाध्यक्ष का चयन नहीं हुआ है, इसलिए सभापति के पैनल में जो सबसे वरिष्ठ सांसद होंगे, वही अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे. इस मामले में जगदंबिका पाल के अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने की संभावना है.
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कब-कब लाया गया अविश्वास प्रस्ताव?
- यह पहली बार नहीं है कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास लाया गया हो. संसद के इतिहास में सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष जीवी मावलंकर के खिलाफ 1954 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. उस वक्त जेबी कृपलानी विपक्ष का नेतृत्व कर रहे थे और अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले नेता थे विग्नेश्वर मिश्रा. जेबी कृपलानी ने 1951 में कांग्रेस से अलग होने के बाद कृषक मजदूर प्रजा पार्टी बनाई थी, जिसका विलय उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में कर दिया था. हालांकि मावलंकर के खिलाफ ये अविश्वास प्रस्ताव 489 के मुकाबले 364 वोटों से गिर गया था.
- 1966 में लोकसभा अध्यक्ष हुकुम सिंह के खिलाफ मधु लिमये अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे, लेकिन पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण उसे स्वीकार नहीं किया गया.
- 1987 में लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ सीपीएम नेता सोमनाथ चट्टर्जी अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे. थंबी दुरई उस वक्त उपाध्यक्ष थे और यह प्रस्ताव भी गिर गया था.
इसके साथ ही दिसंबर 2024 में राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था. विपक्ष के 60 सदस्यों ने उस अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उपसभापति हरिवंश ने उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था.
क्या विपक्ष के पास है पर्याप्त संख्या
अब सबसे बड़ा सवाल क्या विपक्ष के पास संख्या है, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए साधारण बहुमत यानी 272 तो चाहिए ही. विपक्ष के पास तृणमूल के समर्थन देने के बाद भी बहुमत का आंकड़ा नहीं है. मौजूदा लोकसभा में सरकार के पास 293 सांसदों का समर्थन है, जिसमें बीजेपी के 240, जेडीयू के 16 और टीडीपी के 12 सांसदों और एनडीए के अन्य दलों को मिलाकर पर्याप्त बहुमत है. वहीं विपक्ष के पास कांग्रेस के 99 और समाजवादी पार्टी, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस और अन्य को मिलाकर 238 सांसद ही हैं यानी वोटिंग की नौबत आई तो लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा. हालांकि विपक्ष बहस के दौरान लोकसभा अध्यक्ष के बहाने सरकार पर अपनी भड़ास निकालने से नहीं चूकेगा.














