ओवैसी ने जीत लीं 126 सीटें, महाराष्ट्र में AIMIM की बढ़ती ताकत किसके लिए खतरे की घंटी?

महाराष्‍ट्र निकाय चुनाव में ओवैसी की पार्टी AIMIM की सफलता संकेत देती है कि शहरी मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक दलों से इतर विकल्प तलाश रहा है. ओवैसी 'प्रतीकात्मक राजनीति' से आगे बढ़कर स्थानीय सत्ता में भागीदारी की ओर बढ़ रही है.

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  • महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं के चुनावों में AIMIM ने 126 सीटें जीती हैं
  • AIMIM ने छत्रपति संभाजीनगर में 33 सीटें जीतकर अपनी सामाजिक और संगठनात्मक पकड़ को मजबूत किया है
  • मुंबई महानगरपालिका चुनावों में AIMIM ने 8 सीटें हासिल कर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से आगे निकल गई है
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मुंबई:

महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव नतीजों ने इस बार राज्य की राजनीति में एक अहम संकेत दिया है. यह संकेत है- ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की लगातार और रणनीतिक बढ़त का. सीमित संसाधनों, तीखे विरोध और आंतरिक चुनौतियों के बावजूद AIMIM ने इन चुनावों में 126 सीटें जीतकर यह साबित कर दिया कि पार्टी अब महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में एक स्थायी और प्रभावी ताकत बन चुकी है. सबसे अहम बात यह है कि AIMIM ने 29 में से 12 महानगरपालिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जो पार्टी के 'धीमे लेकिन स्थिर विस्तार' (Slow and Steady Rise) की कहानी कहती है.  

छत्रपति संभाजीनगर: AIMIM का गढ़ और सबसे बड़ी जीत

AIMIM का सबसे शानदार प्रदर्शन छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व औरंगाबाद) महानगरपालिका में देखने को मिला, जहां पार्टी ने 33 सीटें हासिल कीं. यह परिणाम 2015 के चुनावों की तुलना में एक बड़ा उछाल है, जब AIMIM को यहां 24 सीटें मिली थीं. यानी पार्टी ने 9 सीटों की शुद्ध बढ़त दर्ज की. यह जीत केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह बताती है कि AIMIM ने यहां अपना सामाजिक आधार और संगठनात्मक पकड़ दोनों मज़बूत की है. छत्रपति संभाजीनगर अब AIMIM के लिए सिर्फ एक नगर निगम नहीं, बल्कि राज्य स्तर पर राजनीतिक प्रयोगशाला बन चुका है.

महानगरपालिकाओं में AIMIM का प्रदर्शन

  • छत्रपति संभाजीनगर– 33
  • मालेगांव – 21
  • नांदेड़– 14
  • अमरावती – 12
  • धुले– 10
  • सोलापुर– 8
  • मुंबई (BMC)– 8
  • नागपुर– 6
  • ठाणे– 5
  • अकोला– 3
  • अहिल्यानगर– 2
  • जालना– 2

यह आंकड़े बताते हैं कि AIMIM का प्रभाव केवल मराठवाड़ा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विदर्भ, उत्तर महाराष्ट्र और मुंबई महानगर तक फैल चुका है. 

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इम्तियाज़ जलील: नेतृत्व, संघर्ष और संगठन

इन चुनावों में AIMIM की सफलता के केंद्र में रहे पूर्व सांसद और AIMIM महाराष्ट्र अध्यक्ष इम्तियाज़ जलील. उन्‍हें चुनावों से पहले पार्टी को सीट बंटवारे को लेकर आरोप, आंतरिक असंतोष और स्थानीय नेतृत्व के टकराव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा. विरोधियों ने यहां तक दावा किया कि पार्टी भीतर से कमजोर हो रही है. लेकिन इम्तियाज़ जलील ने इन सभी चुनौतियों के बीच संगठन को एकजुट रखा. उन्होंने स्थानीय नेतृत्व को निर्णायक भूमिका दी, टिकट वितरण में सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता दी, शहरी मुद्दों (रोज़गार, शिक्षा, बुनियादी सुविधाएं) को केंद्र में रखा और नतीजा यह हुआ कि AIMIM ने विरोध और विवादों के बावजूद मैदान में बेहतर प्रदर्शन किया.

असदुद्दीन ओवैसी की कैंपेनिंग: राष्ट्रीय चेहरा, स्थानीय असर

इन चुनावों में AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की सक्रिय प्रचार भूमिका भी निर्णायक रही. ओवैसी की रैलियों और सभाओं ने पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह भरा. युवा और अल्पसंख्यक मतदाताओं को जुटाने का काम किया. AIMIM को 'केवल विरोध की राजनीति' से आगे ले जाकर स्थानीय शासन का विकल्प के रूप में पेश किया. विशेष रूप से मराठवाड़ा और मुंबई में उनकी सभाओं का सीधा असर वोट प्रतिशत और सीटों पर दिखाई दिया.

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BMC चुनाव: मुंबई में AIMIM का बड़ा सियासी संदेश

मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव AIMIM के लिए रणनीतिक सफलता साबित हुए. पार्टी ने यहां 8 सीटें जीतीं, जबकि 2017 के BMC चुनावों में AIMIM को केवल 2 सीटें मिली थीं यानी इस बार 6 सीटों की सीधी बढ़त हुई है. AIMIM ने मुस्लिम बहुल इलाकों में मज़बूत पकड़ बनाई. वार्ड नंबर 134, 136, 137, 138, 139, 140, 143 और 145 से AIMIM की जीत ने यह साफ कर दिया कि पार्टी अब मुंबई में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के विकल्प के रूप में उभर रही है. खास बात यह भी रही कि AIMIM मनसे से आगे निकल गई, जिसे BMC में 6 सीटें मिलीं. यह तुलना राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

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बदलती शहरी राजनीति और AIMIM का भविष्य

AIMIM की यह सफलता संकेत देती है कि शहरी मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक दलों से इतर विकल्प तलाश रहा है. ओवैसी 'प्रतीकात्मक राजनीति' से आगे बढ़कर स्थानीय सत्ता में भागीदारी की ओर बढ़ रही है. पार्टी ने खुद को केवल विरोधी नहीं, बल्कि नगर प्रशासन में दखल रखने वाली ताकत के रूप में स्थापित किया है. हालांकि, चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं (विस्तार के साथ संगठनात्मक अनुशासन, नए वर्गों तक पहुंच और गठबंधन राजनीति) लेकिन मौजूदा नतीजे यह साफ करते हैं कि AIMIM अब महाराष्ट्र की नगर निगम राजनीति में अनदेखी नहीं की जा सकने वाली शक्ति बन चुकी है. 2026 के महानगरपालिका चुनाव AIMIM के लिए केवल सीटों की जीत नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश हैं- AIMIM आई है, टिकने के इरादे से.

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