भारत मंडपम में शर्टलेस प्रदर्शन, गठबंधन के सहयोगी भी रहे कूट, कांग्रेस में ही पड़ गई फूट?

AI समिट के दौरान कांग्रेस के यूथ विंग के विरोध प्रदर्शन से उसके ही सहयोगी नाखुश हैं. उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से संदेश दिया कि विरोध का तरीका और मंच दोनों सोच-समझकर चुनना चाहिए था. पढ़ें सहयोगी दलों ने इस मसले पर किन शब्दों में कांग्रेस का साथ छोड़ा.

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  • AI समिट के दौरान युवा कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन पार्टी को महंगा पड़ गया. सहयोगी दलों ने उससे दूरी बना ली है.
  • यूथ कार्यकर्ताओं का शर्ट उतारकर AI समिट के दौरान प्रदर्शन करना कांग्रेस पार्टी के अंदर भी नहीं सराहा गया.
  • अखिलेश यादव, आदित्य ठाकरे, बाहुल सुप्रियो समेत सहयोगी दलों के कई नेताओं ने भी इस पर नाखुशी जताई है.
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राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई समिट के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की युवा इकाई के प्रदर्शन ने विपक्षी खेमे में दरार पैदा कर दी है. इस घटना के बाद इंडिया गठबंधन के कई सहयोगी दलों ने सार्वजनिक रूप से कांग्रेस से दूरी बना ली है, जिससे विपक्ष की एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं. घटना तब विवाद में आई जब यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने शर्ट उतारकर प्रदर्शन किया. इस कदम पर कांग्रेस के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए. वरिष्ठ नेता मार्गरेट अल्वा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनुशासन और जिम्मेदारी सर्वोपरि होनी चाहिए. उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से संदेश दिया कि विरोध का तरीका और मंच दोनों सोच-समझकर चुनना चाहिए.

इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही कांग्रेस पर हमला बोल चुके थे, लेकिन अब पार्टी के भीतर से उठती आवाजों ने स्थिति और असहज बना दी है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन स्थान का चयन गलत रहा. हालांकि पार्टी लाइन तय होने के बाद कई नेता सोशल मीडिया पर प्रदर्शन के समर्थन में उतर आए.

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सहयोगी दलों ने सुनाई खरी-खोटी

कांग्रेस के लिए असली चुनौती विपक्षी दल नहीं, बल्कि उसके अपने सहयोगी बनते दिख रहे हैं. संसद में साथ रणनीति बनाने वाले दलों ने भी इस मुद्दे पर अलग रुख अपना लिया है. संसद में सरकार के खिलाफ मजबूती से खड़ी रहने वाली समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने भी इस मामले में कांग्रेस का दामन छोड़ दिया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि बीजेपी झूठी पार्टी है, सरकार भम्र फैलाती है झूठ भी बोलती है लेकिन फिर भी वे इस तरह के प्रदर्शनों के पक्ष में नहीं हैं जो विदेशी प्रतिनिधियों के सामने और विदेश में देश की छवि को नुकसान पहुंचाएं.

वहीं आरजेडी के मनोज झा ने कहा कि देश में इस सरकार को लेकर गुस्सा है कई मुद्दों को लेकर खासकर भारत अमेरिकी ट्रेड डील को लेकर, फिर भी वो एआई समिट में प्रदर्शन को अच्छा विकल्प नहीं मानते हैं. मनोज झा का कहना है कि प्रदर्शन के सही जगह का चुनाव जरूरी होता है, जगह दूसरी होनी चाहिए थी.

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वहीं शिव सेना उद्धव गुट के अरविंद सावंत और आदित्य ठाकरे का भी बयान आया है जिसमें उन्होंने कांग्रेस से दूरी बनाई है. अरविंद सावंत कहते हैं कि राजनीति में विरोध का अधिकार सबको है मगर प्रदर्शन करने की जगह की समझ भी होनी चाहिए. एआई का मंच अंतरराष्ट्रीय था यहां से बचना चाहिए था. जबकि आदित्य ठाकरे का कहना है कि एआई समिट एक प्रोफेशनल प्लेटफार्म था यहां पर राजनैतिक विरोध प्रदर्शन नहीं होना चाहिए था.

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पश्चिम बंगाल के आईटी मंत्री बाबुल सुप्रियो ने सोशल मीडिया पर यूथ कांग्रेस के प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया दी, उन्होंने लिखा कि जिस मंच पर अंतरराष्ट्रीय नेता और वैश्विक उद्योग जगत के प्रमुख लोग मौजूद हों, वहां इस तरह का प्रदर्शन देश की प्राथमिकताओं को लेकर गलत संदेश देता है. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक मतभेदों के लिए संघर्ष किया जा सकता है, लेकिन इसकी कीमत देश की गरिमा और सम्मान को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जानी चाहिए.

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राजनीतिक संदेश और गठबंधन पर असर

यानी इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों ने कांग्रेस को आईना दिखाने का काम किया है, सहयोगी दलों की यह प्रतिक्रिया कांग्रेस को एक स्पष्ट संकेत है कि राजनीति अपनी जगह है मगर जहां देश की गरिमा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की प्रतिष्ठा या उसकी छवि की बात होगी वो कांग्रेस की गलत नीतियों पर उसका साथ छोड़ भी सकते हैं. 

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यह कांग्रेस के लिए बड़ी सीख है क्योंकि कई नेता गाहे बगाहे कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाते रहे हैं और समय-समय पर यह चर्चा भी उठती रही है कि गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी या एमके स्टालिन जैसे क्षेत्रीय नेता कर सकते हैं. 

हालांकि संख्याबल के आधार पर लोकसभा में कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और विपक्ष के नेता भी कांग्रेस के ही हैं, यह उसे औपचारिक बढ़त जरूर दिलाता है लेकिन मौजूदा विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन में नेतृत्व केवल संख्या से नहीं, बल्कि भरोसे और समन्वय से तय होता है.

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