नीतीश के दरबार में पुराने सिपाहियों की वापसी? आरसीपी सिंह की जदयू में घर वापसी के संकेत के क्या हैं मायने

फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ़ नहीं है, लेकिन संकेत बिल्कुल साफ़ हैं. अगर आरसीपी सिंह जदयू में लौटते हैं, तो यह सिर्फ एक नेता की घर वापसी नहीं होगी, बल्कि यह नीतीश कुमार की उस बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होगी, जिसके तहत वे बिखरे हुए कुनबे को फिर से समेटने की कोशिश कर रहे हैं.

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  • पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की JDU में संभावित वापसी बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर रही है
  • आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे हैं और जदयू संगठन को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही थी
  • जदयू में घर वापसी अभियान की तैयारी चल रही है, पार्टी पुराने लोगों की वापसी करवा रही है
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पटना:

बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. वजह है पूर्व केंद्रीय मंत्री और कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले आरसीपी सिंह की जनता दल (यूनाइटेड) में संभावित वापसी. पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है कि आरसीपी सिंह एक बार फिर नीतीश कुमार के साथ खड़े नज़र आ सकते हैं. खुद आरसीपी सिंह का बयान यह आपको जल्द ही पता चल जाएगा इन अटकलों को और मज़बूत कर रहा है.

क्यों अहम है आरसीपी सिंह की वापसी?

आरसीपी सिंह कोई साधारण नेता नहीं हैं. वे लंबे समय तक नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे हैं. प्रशासनिक सेवा से लेकर राजनीति तक का उनका सफर नीतीश कुमार के साथ जुड़ा रहा. जदयू के भीतर संगठनात्मक ढांचे को मज़बूत करने, रणनीति बनाने और दिल्ली से पटना तक समन्वय बैठाने में उनकी अहम भूमिका रही है. यही वजह है कि जब वे पार्टी से अलग हुए थे, तो इसे नीतीश कुमार के लिए एक बड़ा झटका माना गया था. अब अगर आरसीपी सिंह की वापसी होती है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की वापसी नहीं होगी, बल्कि यह संकेत देगा कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने भरोसेमंद साथियों को साथ लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

घर वापसी अभियान की तैयारी?

सूत्रों की मानें तो जदयू में यह वापसी किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं रह सकती. पार्टी के भीतर और बाहर ऐसे कई नेता हैं, जो समय के साथ या तो नाराज़ होकर अलग हो गए या फिर हाशिये पर चले गए. अब चर्चा है कि संगठन को मज़बूत करने के लिए नीतीश कुमार एक तरह से घर वापसी अभियान शुरू कर सकते हैं.

इस अभियान का मकसद साफ़ है पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि को कम करना, पुराने कैडर को फिर से सक्रिय करना और 2025 के बाद के राजनीतिक समीकरणों के लिए जदयू को मज़बूत स्थिति में लाना.

आरसीपी सिंह दे रहे हैं सधा हुआ बयान?

जब आरसीपी सिंह से खरमास के बाद जदयू में वापसी को लेकर सीधा सवाल पूछा गया, तो उन्होंने साफ़ तौर पर न हां कहा, न ना. उनका जवाब था यह आपको जल्द ही पता चल जाएगा. राजनीति में ऐसे बयान अक्सर बड़े संकेत माने जाते हैं. अगर वापसी की कोई संभावना नहीं होती, तो वे सीधे इनकार भी कर सकते थे. लेकिन उनके इस जवाब ने यह साफ़ कर दिया कि बातचीत चल रही है और फैसला पूरी तरह से नकारात्मक नहीं है.

जदयू का आधिकारिक रुख क्या है?

जदयू की तरफ से भी इस मुद्दे पर बयान आया है, लेकिन बेहद संतुलित शब्दों में. पार्टी का कहना है कि जनता दल (यूनाइटेड) आदरणीय डॉ. राममनोहर लोहिया के सपनों की पार्टी है. लोहिया के सप्तक्रांति के विचारों के आधार पर नीतीश कुमार सात निश्चय के तहत विकसित बिहार की परिकल्पना को आगे बढ़ा रहे हैं.

पार्टी नेताओं का साफ़ कहना है कि जो भी व्यक्ति नीतीश कुमार के नेतृत्व में आस्था रखता है, पार्टी के संविधान में विश्वास करता है और जदयू से जुड़ना चाहता है उसका स्वागत है. किसी एक व्यक्ति को लेकर पार्टी सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी करने से बच रही है, लेकिन दरवाज़े खुले होने का संदेश साफ़ है.

विपक्ष ने किया तंज

बिहार कांग्रेस ने इस पूरे मामले को जदयू का आंतरिक विषय बताते हुए तंज भी कसा है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर आरसीपी टैक्स के बिना जदयू नहीं चल पा रहा, तो शायद पार्टी को एक बेहतर वसूलीबाज की ज़रूरत है, और इसी वजह से आरसीपी सिंह को वापस लाया जा रहा है. यह बयान भले ही राजनीतिक कटाक्ष हो, लेकिन इससे यह भी साफ़ होता है कि विपक्ष इस संभावित वापसी को हल्के में नहीं ले रहा.

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बीजेपी का क्या कहना है?

बीजेपी की तरफ से प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सकारात्मक रही है. बीजेपी नेताओं का मानना है कि आरसीपी सिंह बेहद अनुभवी, सुलझे हुए और रणनीतिक सोच रखने वाले नेता हैं. उन्होंने लंबे समय तक नीतीश कुमार के साथ कदम से कदम मिलाकर काम किया है. बीजेपी का यह भी कहना है कि अगर आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी होती है, तो इससे न सिर्फ जदयू का संगठन मज़बूत होगा, बल्कि एनडीए गठबंधन को भी मजबूती मिलेगी. यानी बीजेपी इस संभावित घटनाक्रम को गठबंधन के लिहाज़ से फायदेमंद मान रही है.

नीतीश कुमार की मजबूरी या रणनीति?

जदयू के भीतर इस समय अंदरूनी बेचैनी साफ़ दिख रही है. पार्टी में कुछ नेताओं को लेकर असंतोष है, जिन्हें विरोधी भूंजा पार्टी कहकर तंज कसते हैं. नेतृत्व पर दबाव है, संगठन को लेकर सवाल उठ रहे हैं और भविष्य की रणनीति को लेकर भी असमंजस है. ऐसे में नीतीश कुमार दो मोर्चों पर काम कर रहे हैं. एक तरफ वे पुराने साथियों को वापस लाकर पार्टी को भीतर से मज़बूत करना चाहते हैं, तो दूसरी ओर यात्राओं और राजनीतिक संदेशों के ज़रिए बीजेपी पर भी दबाव बनाए हुए हैं.

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आरसीपी सिंह की वापसी जदयू के संगठनात्मक संतुलन और आने वाले राजनीतिक समीकरणों के लिहाज़ से बेहद अहम मानी जा रही है. इससे पुराने कार्यकर्ताओं को यह संदेश जाएगा कि पार्टी एक बार फिर अपने अनुभव और पुराने भरोसे पर लौट रही है. वहीं विपक्ष के लिए यह एक नई चुनौती भी हो सकती है.

फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ़ नहीं है, लेकिन संकेत बिल्कुल साफ़ हैं. अगर आरसीपी सिंह जदयू में लौटते हैं, तो यह सिर्फ एक नेता की घर वापसी नहीं होगी, बल्कि यह नीतीश कुमार की उस बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होगी, जिसके तहत वे बिखरे हुए कुनबे को फिर से समेटने की कोशिश कर रहे हैं. अब सबकी निगाहें उसी जल्द पर टिकी हैं, जिसका ज़िक्र आरसीपी सिंह ने खुद किया है.

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