पाटण. कल्पना कीजिए एक ऐसे लाचार पिता की, जिसकी नन्हीं और सबसे लाडली बेटी एक दिन स्कूल से घर लौटते वक्त हादसे का शिकार हो जाती है और हमेशा के लिए दुनिया छोड़ जाती है. उस पिता के दिल पर क्या गुजरी होगी? कोई भी आम इंसान इस सदमे में टूट जाता. लेकिन उस पिता ने अपनी आंखों के आंसुओं को एक ऐसी जिद में बदल दिया, जिसने भारतीय बिजनेस का इतिहास ही बदल कर रख दिया. उन्होंने खुद से वादा किया कि मैं अपनी बेटी का नाम इस देश के कोने-कोने में अमर कर दूंगा. दोस्तों, वो लाडली बेटी थी निरूपमा, जिसे घर में प्यार से 'निरमा' बुलाते थे, और वो पिता थे करसनभाई पटेल. आज भले ही आप निरमा वॉशिंग पाउडर का इस्तेमाल करते हों या नहीं, लेकिन बचपन का वो विज्ञापन आपको जरूर याद होगा "वाशिंग पाउडर निरमा... दूध सी सफेदी निरमा से आए रंगीन कपड़ा भी खिल-खिल जाए..." यह सिर्फ एक विज्ञापन नहीं, बल्कि एक पिता का अपनी स्वर्गीय बेटी के लिए अनोखा ट्रिब्यूट था.
इस कहानी की शुरुआत होती है साल 1945 से, गुजरात के पाटण के एक गरीब किसान परिवार में जन्मे करसनभाई पटेल से. तंगी के बावजूद पिता ने उन्हें केमिस्ट्री से बीएससी करवाई ताकि बेटे को एक अच्छी नौकरी मिल सके. करसनभाई ने पिता की इच्छा का मान रखा और लैब असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू किया. बाद में साल 1969 में उन्हें माइनिंग विभाग में सरकारी नौकरी भी मिल गई. परिवार के दिन सुधरने लगे थे, लेकिन करसनभाई की आंखों में तो बिजनेस का सपना तैर रहा था.
देश की गरीबी देखकर आया आइडिया
उस दौर में देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था. वॉशिंग पाउडर जैसी चीज आम लोगों के लिए एक विलासिता थी. लोग कपड़े धोने के लिए राख या सोडे का इस्तेमाल करते थे. करसनभाई ने इसी मजबूरी को भांप लिया. उन्होंने अपनी केमिस्ट वाली समझ का इस्तेमाल कर एक सस्ता और बेहतरीन वॉशिंग पाउडर बनाने की ठानी. वे दिनभर सरकारी नौकरी करते और रात को घर पर एक्सपेरिमेंट.
बेटी के जाने का दुख, फिर खुद से किया 'वो वादा'
तभी उनकी जिंदगी में एक भयानक तूफान आया. उनकी लाडली बेटी निरूपमा का एक सड़क हादसे में निधन हो गया. इस सदमे ने करसनभाई को झकझोर कर रख दिया. लेकिन उन्होंने अपनी बेटी के नाम को हमेशा-हमेशा के लिए अमर करने का फैसला किया. उन्होंने खुद से वादा किया कि वे अपनी 'निरमा' को पूरी दुनिया में मशहूर कर देंगे.
कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया जो हाथों के लिए सुरक्षित था और पर्यावरण के अनुकूल भी. पैकेट पर अपनी बेटी की सिम्बॉलिक तस्वीर लगाई और नाम रखा निरमा. ये उनकी स्वर्गीय बेटी निरुपमा का ही नाम था.
करसनभाई की गारंटी से वायरल हो गया निरमा
अब चुनौती थी इसे बेचने की. शुरुआत में किसी दुकानदार ने उन्हें भाव नहीं दिया. करसनभाई के पास दो ही रास्ते थे या तो हार मान लें या खुद मैदान में उतरें. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. वे रोज सुबह दफ्तर जाने से पहले साइकिल पर निरमा के पैकेट लादकर निकल पड़ते और घर-घर जाकर इसे बेचते. जब लोगों ने इसे इस्तेमाल किया, तो यह उनके लिए जादुई साबित हुआ. उस वक्त बाजार पर राज करने वाले 'सर्फ' की कीमत ₹15 किलो थी, जबकि करसनभाई ने निरमा की कीमत रखी मात्र ₹3 किलो. साथ ही उन्होंने गारंटी दी कि अगर कपड़ा साफ न हुआ, तो पूरे पैसे वापस. बस फिर क्या था, निरमा की मांग आग की तरह फैल गई.
करसनभाई ने साल 1972 में अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह बिजनेस में जुट गए. साल 1975 में आया टीवी और रेडियो का वो ऐतिहासिक विज्ञापन "सबकी पसंद निरमा". हेमा, रेखा, जया और सुषमा जैसे किरदारों के साथ सीधे गृहणियों के दिलों में जगह बनाई गई. निरमा अब घर-घर की पहली पसंद बन चुका था.
हिंदुस्तान यूनिलीवर और घड़ी डिटर्जेंट ने लगाई सेंध
बेशक, बाद में कॉम्पिटिशन बढ़ा. हिंदुस्तान यूनिलीवर ने 'व्हील' उतारा और 'घड़ी' डिटर्जेंट ने भी बाजार में सेंध लगाई. निरमा पर 'सस्ता ब्रांड' होने का ठप्पा लग गया, जिसे वे प्रीमियम सेगमेंट में जाकर भी नहीं हटा पाए. लेकिन करसनभाई थमे नहीं. उन्होंने भांप लिया था कि वक्त बदल रहा है, इसलिए उन्होंने अपने बिजनेस को एजुकेशन, सीमेंट और सोडा ऐश जैसे बड़े सेक्टर्स में डायवर्सिफाई कर दिया.
आज भले ही वाशिंग पाउडर के बाजार में निरमा की हिस्सेदारी सिर्फ 6% रह गई हो, लेकिन करसनभाई पटेल ने अपनी बेटी का नाम अमर करने का जो वादा खुद से किया था, उसे सौ फीसदी पूरा कर दिखाया. आज करसनभाई देश के सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं. ₹3 की साइकिल से शुरू हुआ सफर आज 3.45 बिलियन डॉलर के अंपायर में बदल चुका है. इसे कहते हैं जिद और जज्बे की असली कहानी.
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