मुस्लिम देश मलेशिया, जहां 1500 साल हिंदू राजाओं का रहा शासन, शिव-विष्णु के मंदिर आज भी गवाह, दौरे पर PM मोदी

PM Modi in Malaysia: मलेशिया का इतिहास हजारों वर्षों तक हिंदू और बौद्ध संस्कृति से जुड़ा रहा है. कई हिंदू राजाओं ने हजारों सालों तक मलेशिया पर अपना शासन चलाया. चोल वंश का मलेशिया के इतिहास में आज भी अमिट छाप है. मलेशिया में प्राचीन हिंदू मंदिर आज भी हैं.

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Malaysia News
नई दिल्ली:

Malaysia History: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के दौरे पर दक्षिण पूर्व एशियाई देश मलेशिया पहुंचे हैं, जहां मलेशियाई पीएम अनवर इब्राहिम ने खुद एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया. आसियान देश मलेशिया से भारत के हजारों साल पुराने व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. यहां आज भी 50 से ज्यादा हिंदू और बौद्ध मंदिर इसका गवाह हैं. मलेशिया 14वीं-15वीं शताब्दी इस्लाम के आगमन से पहले लगभग 1500 सालों तक हिंदू और बौद्ध धर्म के प्रभाव में रहा. इंडोनेशिया, कंबोडिया की तरह दक्षिण-पूर्व एशिया के देश मलेशिया में कभी हिंदू शासकों का साम्राज्य फैला था. दक्षिण भारत के प्रतापी राजा राजेंद्र चोल की यहां समुद्री विजय का इतिहास भी है. 

मलेशिया में हिंदुओं की आबादी

मलेशिया की कुल आबादी लगभग 3.5 करोड़ है. इसमें हिंदू आबादी करीब 6.3% से 6.5% है. मलेशिया में लगभग 22 से 23 लाख हिंदू रहते हैं. यहां अधिकांश हिंदू तमिल मूल के हैं. मलेशिया की कुल हिंदू आबादी का लगभग 85% से 90% हिस्सा यानी करीब 20 लाख तमिल और तमिलनाडु से जुड़े हैं.बाकी के 10-15% हिंदुओं में मलयाली, तेलुगु, पंजाबी और उत्तर भारतीय हैं. दुनिया में भारतीय मूल की आबादी के मामले में मलेशिया दूसरी पायदान पर है. 

PM Modi in Malaysia

दो हजार साल पुराना समुद्री व्यापार 

भारतीय व्यापारी और विद्वान पहली शताब्दी के आसपास समुद्री रास्तों से मलय प्रायद्वीप पहुंचे और वहां संस्कृत भाषा, हिंदू धर्म और शासन की प्रणालियों  का वहां प्रसार किया. मलेशिया के राजाओं ने भी महाराजा की उपाधियां अपनाईं और ब्राह्मणों को सलाहकार बनाया.

कदाहारम या केदाह (Langkasuka/Kedah Tua)

यह मलेशिया का सबसे पुराना राज्य माना जाता है. दूसरी सदी में यानी आज से 1800-1900 साल पहले हिंदू धर्म के प्रभाव में आया. प्राचीन तमिल साहित्य में इसे कदाहारम कहा गया है. केदाह की बुजांग वैली (Bujang Valley) में आज भी 50 से अधिक हिंदू-बौद्ध मंदिरों के अवशेष मिलते हैं.

श्रीविजय साम्राज्य (Srivijaya Empire)

मलेशिया 7वीं से 13वीं शताब्दी तक श्रीविजय साम्राज्य के प्रभाव में रहा. इसका केंद्र सुमात्रा (इंडोनेशिया) में था, लेकिन मलय प्रायद्वीप का एक बड़ा हिस्सा उनके शासन के अधीन था. ये हिंदू और महायान बौद्ध धर्म का एक बड़ा केंद्र बना. मलेशिया के राजा चोल साम्राज्य के साथ व्यापारिक और राजनयिक संबंध रखते थे.

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चोल साम्राज्य का इतिहास 

मलयेशिया के इतिहास में 11वीं शताब्दी में बड़ा घटना घटी.जब बड़ी नौसेना ताकत रखने वाला राजेंद्र चोल प्रथम ने दक्षिण भारत से जाकर वहां हमला बोला. दक्षिण भारत के चोल वंश ने  1025 ईस्वी में श्रीविजय के नियंत्रण वाले मलय बंदरगाह (जैसे केदाह) पर हमला किया. ताकि समुद्री व्यापार मार्ग पर अपना कब्जा जमा सकें. फिर कई दशकों तक मलेशियाई क्षेत्र  में चोलों का प्रभाव रहा.

मजापहित साम्राज्य (Majapahit Empire)

मजापहित साम्राज्य (13वीं से 15वीं सदी) वो अंतिम महान हिंदू साम्राज्य था, जिसने मलेशिया के कई प्रांतों पर राज किया. मजापहित के शासन में हिंदू संस्कृति, वास्तुकला और कानूनी प्रणाली अपनी चरम सीमा पर थी.

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हिंदू साम्राज्य का पतन

मलेशिया में 14वीं शताब्दी के अंत और 15वीं शताब्दी में हालात बदलने लगे. 1400 ईस्वी के करीब पालमबांग के एक राजकुमार परमेश्वर (Parameswara) ने मलक्का की स्थापना की.  पहले वह हिंदू शासक था लेकिन बाद में उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया और अपना नाम सुल्तान इस्कंदर शाह रख लिया. उसने मलक्का सल्तनत की स्थापना की.

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अरब देशों से व्यापार बढ़ा

अरब और भारतीय मुस्लिम व्यापारियों के साथ बेहतर व्यापारिक संबंधों के लिए स्थानीय शासकों ने धीरे-धीरे इस्लाम अपनाना शुरू कर दिया.सूफी संतों के प्रचार और सामाजिक समानता के संदेश ने भी आम आबादी को प्रभावित किया.

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संस्कृत के शब्द मलेशियाई भाषा में

मलेशिया में भले ही शासन बदल गया लेकिन मलेशिया में आज भी हिंदू संस्कृति के प्रतीक अस्तित्व में हैं.मलय भाषा के हजारों शब्द संस्कृत से निकले हैं (जैसे राजा, भक्ति, सुयर्गा (स्वर्ग), नरक, पुआसा (उपवास) आदि. 'हिकायत सेरी राम' (Ramayana का मलय संस्करण) भी वहां की सांस्कृतिक विरासत है.मलेशिया के राजा का राज्याभिषेक (Coronation) आज भी कई हिंदू-ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों से मिलता-जुलता है.कई मलय मुसलमानों के नाम आज भी संस्कृत मूल के होते हैं.

चोल साम्राज्य का इतिहास

इतिहासकार बताते हैं कि 11वीं शताब्दी में जब राजेंद्र चोल ने समुद्री अभियान चलाया था, तो बुजांग वैली (कदाहारम) उनके नियंत्रण में आ गई थी. चोलों ने यहां शिव और विष्णु के मंदिरों के विस्तार और रखरखाव में बड़ी भूमिका निभाई थी.यहां पुरातत्व संग्रहालय (Bujang Valley Archaeological Museum) है. ये मलेशिया का सबसे पुराना ऐतिहासिक स्थल है.

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राजेंद्र चोल प्रथम का इतिहास

दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापारिक मार्गों पर श्रीविजय साम्राज्य का शासन था और वो चीन और भारत के बीच होने वाले व्यापार पर भारी टैक्स वसूलते थे और भारतीय व्यापारियों को परेशान करते थे. राजेंद्र चोल प्रथम अपने व्यापारियों के लिए रास्ता साफ करना चाहते थे. अपनी नौसैनिक शक्ति (Navy) के प्रदर्शन और ताकत दिखाना चाहते थे.

सबसे आधुनिक नौसेना 

राजेंद्र चोल ने बंगाल की खाड़ी को पार करने के लिए एक विशाल बेड़ा तैयार किया. इसमें जहाजों के साथ-साथ हजारों की संख्या में सैनिक और युद्ध के हाथी भी शामिल थे. यह उस समय की दुनिया की सबसे आधुनिक नौसेना मानी जाती थी.

कदाहारम (मलेशिया) की विजय

चोल सेना ने 1025 ईस्वी के आसपास सबसे पहले कदाहारम (आधुनिक केदाह और बुजांग वैली) पर हमला किया. चोलों ने श्रीविजय के राजा संग्राम विजयातुंगवर्मन को बंदी बना लिया.उन्होंने मलेशिया के तटीय क्षेत्रों जैसे पन्नई और मलयुर पर कब्जा किया.राजेंद्र चोल ने 'कदाहारम कोंडन' (कदाहारम को जीतने वाला) की उपाधि धारण की.

चोल शासन का प्रभाव

चोलों ने वहां सीधे शासन करने के बजाय स्थानीय राजाओं पर अपनी अधीनता कायम की. वहां धर्म और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला.बुजांग वैली में मिले कई मंदिरों की वास्तुकला चोल शैली (Dravidian Architecture) से प्रेरित हैं. यहां संस्कृत और तमिल का प्रसार हुआ. चोलों की जीत के बाद केदाह (मलेशिया) दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गया.तंजौर (तमिलनाडु) के प्रसिद्ध राजराजेश्वर मंदिर के शिलालेखों में राजेंद्र चोल की इस 'समुद्र पार विजय' का जिक्र है.

दुनिया के बड़े मुस्लिम देश
इंडोनेशिया : 24.2 करोड़
पाकिस्तान : 24 करोड़
भारत : 20 करोड़
बांग्लादेश : 15 करोड़
नाइजीरिया : 9.7 करोड़
मलेशिया: 3.2 करोड़

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