मौत से महज 90 दिन दूर थी मां, फिर बेटे ने खोजा ऐसा रास्ता... आज हजारों जिंदगियों के लिए संजीवनी बनी BigOHealth

बिगओहेल्थ प्‍लेटफॉर्म के फाउंडर गौरव कुमार ने एनडीटीवी से खास बातचीत में कहा कि सिर्फ 90 दिन... डॉक्‍टरों ने मेरे मां के भविष्य को एक संख्या में सिमटा दिया. लेकिन मैं सिर्फ अपनी मां को खोने से ही नहीं डरा था. मैं इसलिए भयभीत था, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि आगे क्या करना है?

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  • गौरव कुमार की मां को चौथे चरण का लीवर कैंसर था, डॉक्टरों ने केवल तीन महीने जीवित रहने की संभावना बताई थी
  • गौरव ने अस्पताल के अलग-अलग विभागों से सलाह लेकर अपनी मां के लिए सर्जरी का दूसरा विकल्प प्राप्त किया था
  • सर्जरी के बाद गौरव की मां का जीवन लगभग दो साल बढ़ा, जो नेटवर्क और जागरूकता की कमी को दर्शाता है
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नई दिल्‍ली:

कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका नाम सुनते ही मन में घबराहट हो जाती है. साल 2023 में 27 वर्षीय गौरव कुमार की मां को पता चला कि उसकी मां को कैंसर है. अस्‍पताल में डॉक्‍टर्स ने बताया कि अब उनकी मां के पास बेहद कम समय है. गौरव की 49 वर्षीय मां को चौथे स्‍टेज का लीवर कैंसर था. डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से बताया कि उनकी मां के पास सिर्फ तीन महीने का समय है. मां इस दौरान घर पर ही ध्‍यान रखिए. सोचिए एक बेटे पर क्‍या बीती होगी, जब डाक्‍टरों ने बताया होगा कि अपकी मां 90 दिनों बाद चल बसेंगी. गौरव ने एनडीटीवी को बताया कि इस मुश्किल समय में उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी.  

सिर्फ 90 दिन का समय...

एनडीटीवी से खास बातचीत में गौरव उस पल को याद करते हुए कहते हैं, 'सिर्फ 90 दिन... डॉक्‍टरों ने मेरे मां के भविष्य को एक संख्या में सिमटा दिया. लेकिन मैं सिर्फ अपनी मां को खोने से ही नहीं डरा था. मैं इसलिए भयभीत था, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि आगे क्या करना है?' गौरव बताते हैं कि इस अनिश्चितता ने भारत के कैंसर विज्ञान तंत्र में गहरी दरारें उजागर कीं, वे दरारें जिन्होंने बाद में बिगओहेल्थ (BigOHealth) की दिशा तय की, जो एक हेल्‍थटेक वेंचर है जिसकी सह-स्थापना उन्होंने अपने इंजीनियरिंग साथी शुभम के साथ की थी.

अस्‍पताल के एक डिपार्टमेंट ने कहा- हां, दूसरे ने न 

कोई लाइलाज बीमारी के बाद परिवार के लोग कई डॉक्‍टरों से सलाह लेते हैं. इस उम्‍मीद में की कहीं, कोई चमत्‍कार हो जाए. दिल्ली और मुंबई के अस्पतालों में, अलग-अलग विशेषज्ञों से मिलते हैं. हर बार मिलने पर नई फाइलें जुड़ती जाती हैं. दिल्ली के एक प्रमुख अस्पताल समूह में स्थिति लगभग तय लग रही थी. कैंसर लीवर तक फैल चुका था. सर्जरी संभव नहीं थी. लेकिन गौरव ने हार नहीं मानी. अपने प्रोफेशनल कॉन्‍टैक्‍ट्स के जरिए गौरव ने एक और आंतरिक समीक्षा का अनुरोध किया. इस बार उसी अस्पताल के एक अलग डिपार्टमेंट द्वारा. लेकिन इस बार आकलन बदल गया. मामले में लीवर की जांच आवश्यक थी. डॉक्टरों ने कहा कि सर्जरी संभव है. गौरव को एक बार तो यकीन ही नहीं हुआ.

ज्‍यादातर लोगों को दूसरा ऑप्‍शन नहीं मिला

सर्जरी हुई और गौरवकी मां का जीवन लगभग दो साल बढ़ गया. उन्‍होंने ने एनडीटीवी को बताया, 'यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि मुझे पता था कि किससे संपर्क करना है. अस्‍पताल के एक विभाग ने मना कर दिया. दूसरे ने हां कह दिया. अधिकांश परिवारों को यह दूसरा विकल्प नहीं मिलता.' छोटे शहरों के या बड़े अस्पतालों में नेटवर्क न रखने वाले मरीजों के लिए, अक्सर एक ही राय अंतिम निर्णय बन जाती है. गौरव के अनुसार, पहुंच और जागरूकता के बीच का यह अंतर भारत में कैंसर के क्षेत्र में सबसे बड़ी कमियों में से एक है.

हजारों पन्‍नों को मैनेज करना

माँ के इलाज के दौरान, गौरव को एक और चुनौती का सामना करना पड़ा, वो था- सूचनाओं का अंबार. कैंसर के इलाज के वर्षों में परिवारों के पास सैकड़ों, कभी-कभी हजारों, पन्नों के मेडिकल रिकॉर्ड जमा हो जाते हैं. स्कैन, बायोप्सी रिपोर्ट, कीमोथेरेपी चार्ट, सर्जिकल नोट्स और लैब परिणाम. हर एडवाइज से पहले, देखभाल करने वाले फाइलों को व्यवस्थित करते हैं. डॉक्टरों को, अक्सर समय की कमी के कारण, वर्षों के इतिहास को मिनटों में देखना पड़ता है. गौरव कुमार ने एनडीटीवी को बताया, 'उन क्षणों में परिवार डेटा मैनेजर की तरह काम करते हैं. वे बस मौजूद रहना चाहते हैं. इस अनुभव ने एक संरचनात्मक समस्या को उजागर किया. जब सूचना बिखरी हुई होती हैं, तो देखभाल करना मुश्किल हो जाता है. 

व्यक्तिगत संकट से प्लेटफ़ॉर्म रणनीति तक

बिगओहेल्थ जो शुरुआत में हेल्‍थकेयर तक केंद्रित था, गौरव कुमार के व्यक्तिगत अनुभव के बाद कैंसर संबंधी निर्णय में सलाह देने की ओर मुड़ने लगा. कंपनी ने ऑनकोवॉल्ट विकसित किया, जो कैंसर रोगियों के चिकित्सा रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक प्लेटफ़ॉर्म है. रिपोर्टों को वर्गीकृत किया जाता है, समय के हिसाब से व्यवस्थित किया जाता है और संक्षिप्त रिपोर्ट में प्रस्तुत किया जाता है, जिसका उद्देश्य कैंसर विशेषज्ञों को रोगी की पूरी यात्रा की जानकारी देती है. कंपनी का कहना है कि गोपनीयता बनाए रखने के लिए विश्लेषण से पहले रोगी डेटा को पहचान रहित कर दिया जाता है. 

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