Exclusive: सपनों पर यकीन करें, महिलाएं कमजोर नहीं... संयुक्त राष्ट्र का सम्मान जीतने वालीं मेजर स्वाति कुमार की NDTV से खास बातचीत

सूडान में काम के लिए संयुक्त राष्ट्र का सम्मान जीतने वाली मेजर स्वाति कुमार कहती हैं कि हमें अपने सपनों पर यकीन करना चाहिए, कुछ भी असंभव नहीं हैं. महिलाएं हर काम कर सकती हैं, क्‍योंकि हम कमजोर नहीं हैं.

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  • मेजर स्वाति भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी हैं जिन्हें सूडान में यूनाइटेड नेशंस सेक्रेटरी जनरल अवार्ड मिला
  • मेजर स्वाति ने 18 महीने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में काम करते हुए सामुदायिक जागरूकता अभियान चलाए
  • सूडान में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन उत्पीड़न के मामलों की रिपोर्टिंग और समाधान में भी उनका योगदान रहा
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नई दिल्‍ली:

भारतीय सेना की महिला अफसर अब उपलब्धियों के नए आसमान छू रही हैं. मेजर स्वाति कुमार को दक्षिण सूडान में बेहतर काम के लिये यूनाइटेड नेशंस सक्रेटरी जनरल अवार्ड से सम्मानित किया गया है. वह भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी हैं, जिन्हें ये सम्मान मिला है.  बेंगलुरु की रहने वालीं मेजर स्वाति 2018 में सेना में भर्ती हुईं. सेना में आने से पहले स्वाति ने कॉरपॉरेट दुनिया में भी काम किया, उन्होंने बेंगलुरु से ही इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की. लेकिन सेना में काम करने के जुनून ने उन्हें सेना में खींच लिया. आज वो सेना के ईएमई ब्रांच में कार्यरत हैं. 2024 में मेजर स्वाति को संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में 18 महीने काम करने का मौका मिला. 

सवाल- आपको किस तरह के सम्मान से नवाजा गया है, जरा उसके बारे मे बताएं? 
जवाब- यह यूएन सेक्रेटरी जनरल अवार्ड है, जिसमें पांच कैटेगरी हैं. मुझे यह सम्मान जेंडर कैटेगरी में मिला है. इसमें हमारी फीमेल सोल्जर अपने मेल सोल्जर के साथ मिलकर ऑपरेशनल एरिया में वहां के पेट्रोल और इंगेजमेंट एक्टिविटी कर रहे थे. उसके लिये यह अवार्ड मिला है.

सवाल- आप 18 महीने साउथ सूडान में रहीं. अपने कुछ काम के बारे में और जानकारी दें. 
जवाब-  हमारा काम वहां पर काफी विस्तृत था. वहां अब भी सामुदायिक संघर्ष चल रहा है. हमने वहां ऑपरेशन पेट्रोल किए. जैसे शार्ट पेट्रोल से लेकर लॉन्‍ग पेट्रोल किए. बाहर 48 घंटे तक रहना पड़ा. एयर पेट्रोल भी किए. चूंकि वहां बारिश ज्यादा होती है, इस वजह से ज्यादातर रास्ते बंद रहते हैं, तो हम या तो हेलीकॉप्टर से जाते थे या फिर रिवर पेट्रोल के लिये कहीं जाते थे. वहां पर हम किसी कम्युनिटी में जाते थे, वहां के जो लीडर्स से उनसे इंटरेक्शन करते थे. वहां की जो महिलायें होती थीं, उनसे बात करते थे. दो तीन घंटे उनके बीच रहकर अवेयरनेस फैलाती थी. 

सवाल- क्या वहां जान का भी खतरा था?
जवाब- जी, ऑपरेशनल एक्टिविटी थी, तो यह रहेगा ही. लेकिन  कनफ्लिक्टके कारण वहां पर महिलाओं के साथ सेक्शुअल हैरेसमेंट के केस ज्यादा होते थे. उनसे बात करके कुछ पता लगता था, तो हम उसे रिपोर्ट करते थे. जो हमें जानकारी मिलती थी, उसे सिविलियन पार्ट को भी देते थे. खासकर वहां पर भी जिम्मेदार लोग होते थे जिनको काम करना होता था . उसका सबसे बड़ा फायदा हुआ कि ग्रास रूट लेवल पर जो संगठन था और जो यूएन ऑथिरिटी थी, उनके बीच हमने लिंक बनाया. 

सवाल- आपको जाने से पहले सेना में ट्रेनिंग मिली होगी, वो कितना काम आई.
जवाब- उस ट्रेनिंग के कारण ही यह सब हो पाया. ऑपरेशनली डिप्लॉय होकर काम करना आसान नहीं होता. यहां मिले अनुभव के बाद ही हम किसी और देश में जाकर सर्व कर पाए. इंडियन आर्मी में कहते हैं कि सर्विस बिफोर सर्व. इसमें प्रोफेशनलिज्म, इंटिग्रेटी के बाद जो आपके काम की वजह से जिम्मेदारी है. आप दूसरे देश में भी जो काम कर रहे है, वहां भी अपने फ्लैग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. आप जब यूनिफॉर्म पहनते हो अपना सारा काम ऑटोमेटिक अच्छे तौर पर करते हो.

सवाल- आपकी सेना की सर्विस भी काफी कठिन इलाके में रही है कहां सिक्किम तो कहां लद्दाख तो ये सारे अनुभव भी सूडान में काफी काम आया होगा.
जवाब- यहां का अनुभव और ट्रेनिंग के बाद जो काम करने जाते है अपने ट्रूप्स के साथ काम करते है उनसे आप टीम के साथ काम करना सीखते हैं,  वहां पर भी ट्रूप्स ही आपके साथ होते हैं. टीम का सपोर्ट तो बहुत जरूरी है, ये मेरा ही अवॉर्ड नहीं है. हमने महिला सोल्जर के साथ मिलकर काम किया. इसीलिए ये इम्पैक्ट हुआ है. 

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सवाल- वहां कोई परेशानी आपको हुई?
जवाब- हम सब वहां यूनिफॉर्म पर्सनल ही गए थे, किसी कठिनाई से निबटने की हमारी पहले से ही ट्रेनिंग हो रखी है. वहां जाकर भी आप उसी एनवायरमंट में रहते हैं. काम सारा वैसे ही करना होता है. 

सवाल- आपके बारे में पढ़ा कि आपने इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की, आपने कॉरपोरेट में काम किया है और फिर आप फौज में आईं. इतना सब होने के बाद फौज को क्यों चुना?
जवाब- फौज में आने का मकसद था कि जो मुझे मिला वो मैं कम्युनिटी को देना चाहती थी. मैं देश के लिए भी काम करना चाहती थी. तो मेरा मुख्य लक्ष्य यही था, भले ही मैंने इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की थी. मुझे लगा देश के लिए भी कुछ करना चाहिए. मैंने फिर SSB का ऐप्लीकेशन भरा, इंटरव्यू दिया और इसी वजह से मैं यहां हूं. 

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सवाल- आप जैसा जो बनना चाहती हैं उन महिलाओं को आप क्या कहेंगी?
जवाब- मैं उनको कहना चाहूंगी कि अपने सपनों पर यकीन करें. जो भी मैंने किया है वो सिर्फ मेरी वजह से नहीं है मेरे साथ मेरे परिवार और सीनियर्स का सपोर्ट था. मेरा विश्वास था कि मैं कर पाऊंगी. तो इसीलिए मैं आगे हूं और सबको यही कहूंगी कि खुद पर भरोसा रखोगे, हिम्मत दिखाओगे  तो मेहनत फल लाएगी. 

सवाल- महिलाओं को लोग कमजोर समझते हैं. समाज के एक तबके की अभी भी यही सोच है... आपको क्या लगता है?
जवाब- मुझे नहीं लगता कि महिलाएं कमजोर हैं... उनमें वो शक्ति है कि वो जो भी सोचेंगी कर पाएंगी... मैं जो बता रही हूं वो सिर्फ महिला के लिए नहीं पुरुषों के लिए भी कह रही हूं, अपने ऊपर भरोसा है तो ये काम अच्छे से कर पाएंगे. जब आप यूनिफॉर्म पहनते हो या लीडरशीप में आते हो तो ये नहीं देखा जाता कि आप मेल हो या फीमेल हो, ये देखा जाता है कि ये काम आपको मिला है और ये आपको करना है.

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