मुंबई में अस्तित्व बचाने में कामयाब रही कांग्रेस, अगर MVA होता साथ तो क्या मजबूत होता 'हाथ'?

कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जिसने कभी मुंबई को अपना महापौर दिया था. हालांकि, इस चुनाव में 24 सीट पर सिमट जाना न केवल उम्मीदों को एक झटका है, बल्कि शहरी क्षेत्रों में उसकी बढ़ती अप्रासंगिकता का संकेत भी है.

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  • बीएमसी चुनाव में कांग्रेस ने मात्र चौबीस सीटें जीतकर पिछली बार के मुकाबले प्रदर्शन में गिरावट दिखाई
  • हालांकि कांग्रेस ने काफी हद तक अपने कोर वोट बैंक अल्पसंख्यक और झुग्गी-बस्तियों वाले इलाकों में बनाए रखा
  • मुंबई के कई इलाकों में भाषाई और धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई
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मुंबई:

देश के सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के हुए चुनावों के शुक्रवार को सामने आए नतीजों में कांग्रेस को महज 24 सीटें ही मिल पायी. कांग्रेस अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब तो रही, लेकिन पिछली बार के मुकाबले इस बार उसका प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा. कांग्रेस बीएमसी चुनाव 152 सीटों पर लड़ी थी, जबकि बाकी सीट उसने अपने सहयोगी वंचित बहुजन आघाडी (वीबीए), राष्ट्रीय समाज पक्ष और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (गवई गुट) के लिए छोड़ दी थी.

महायुति की लहर में भी कांग्रेस ने बड़ी पार्टियों को छोड़ 'एकला चलो' की राह पर ठीक-ठाक प्रदर्शन किया. इस बार 24 सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाली कांग्रेस 2017 के चुनाव में 31 सीटें जीतकर तीसरे नंबर की पार्टी बनी थी. पिछली बार की तुलना में इस बार कुछ सीटों में गिरावट आयी है, लेकिन महायुति की लहर के बावजूद, मौजूदा त्रिकोणीय और जटिल राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है.

कांग्रेस के लिए क्या काम आया?

अल्पसंख्यक और झुग्गी-बस्तियों वाले इलाकों में कांग्रेस का कोर वोट बैंक काफी हद तक पार्टी के साथ जुड़ा दिख रहा है. पार्टी ने बड़े राजनीतिक विवादों के बजाय स्थानीय नागरिक सुविधाओं और वार्ड-स्तरीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित रखा, जो कुछ चुनिंदा वार्डों में जीत दिलाने में सफल रहा.

कांग्रेस ने मुंबई के कुछ चुनिंदा इलाकों में अपनी पॉकेट सुरक्षित रखी है. हालांकि पार्टी पिछली बार का आंकड़ा नहीं छू पाई, लेकिन स्वतंत्र रूप से लड़ते हुए 24 सीटें जीतना यह संकेत देता है कि मुंबई में कांग्रेस को पूरी तरह नकारा नहीं गया है, बल्कि वह अब कुछ विशिष्ट शहरी इलाकों तक सिमट गई है.

वीबीए, आरएसपी और आरपीआई के साथ गठबंधन का फायदा नहीं

प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वीबीए, आरएसपी और आरपीआई (गवई) के साथ गठबंधन से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ. कांग्रेस ने विपक्षी महा विकास आघाडी (एमवीए) के घटकों शिवसेना(उबाठा) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के साथ गठबंधन नहीं करने का फैसला किया था. उसे आशंका थी कि शिवसेना(उबाठा) और राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के हाथ मिलाने से उसका उत्तर भारतीय और अल्पसंख्यक वोट बैंक उससे दूर जा सकता है.

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पारंपरिक रूप से शहर के कई हिस्सों को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, लेकिन भाषाई और धार्मिक ध्रुवीकरण और प्रति-ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस ने भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना दोनों के मुकाबले अपनी पकड़ खो दी. कांग्रेस एक ठोस मुद्दा तलाशने में संघर्ष करती नजर आई. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम), समाजवादी पार्टी और अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा ने कांग्रेस के पारंपरिक समर्थन आधार में सेंध लगाई.

24 सीट पर सिमटना कांग्रेस की उम्मीदों को झटका

कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जिसने कभी मुंबई को अपना महापौर दिया था. हालांकि, इस चुनाव में 24 सीट पर सिमट जाना न केवल उम्मीदों को एक झटका है, बल्कि शहरी क्षेत्रों में उसकी बढ़ती अप्रासंगिकता का संकेत भी है. वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए ) के साथ गठबंधन से कांग्रेस को दलित वोटों के एकजुट होने की उम्मीद थी, लेकिन प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के पास ये समीकरण सफल नहीं हो पाया.

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