लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ सोमवार को बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन चर्चा और मतदान कराया जाएगा. कांग्रेस, सपा के अलावा तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों के सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करने का संकेत दिया है.लेकिन क्या आपको पता है कि देश में पहली बार किस लोकसभा स्पीकर के खिलाफ कब अविश्वास प्रस्ताव आया था. दरअसल, पहला अविश्वास प्रस्ताव 72 साल पहले देश के पहले लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ आया था. देश की आजादी के पहले 1946 में वो स्पीकर चुने गए और 1956 में मृत्युपर्यंत इस पद पर रहे थे. तब विपक्षी सांसदों ने ये अविश्वास प्रस्ताव स्पीकर पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए दिया था.
मुस्लिम लीग के प्रत्याशी को हराकर जीते थे मावलंकर
1946 में केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly) के अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में जीवी मावलंकर ने मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार के समर्थने वाले उम्मीदवार पारसी उद्योगपति सर कावासजी जहांगीर को कांटे की लड़ाई में हराया था. तब मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान के लिए सब कुछ झोंक चुकी थी. जबकि कांग्रेस और अन्य दल भारत की राष्ट्रवादी पहचान बचाने में जुटे थे. कांग्रेस प्रत्याशी मावलंकर को 66 वोट और जहांगीर को 63 वोट मिले. मुकाबला इतना कड़ा था कि बीमार होने के बावजूद कांग्रेस के कई सांसदों को व्हील चेयर और स्ट्रेचर पर सदन में लाया गया था. वो सिर्फ 3 वोटों से जीते थे. सेठ गोविंद दास भी व्हील चेयर पर सदन में आए थे.
सरदार पटेल को मानते थे गुरु
उनकी जीत के रणनीतिकारों में सरदार वल्लभभाई पटेल की अहम भूमिका थी, जिन्होंने निर्दलीय सदस्यों को राजी किया कि एक राष्ट्रवादी ही स्पीकर बने. मावलंकर ने स्पीकर बनते ही अंग्रेजी की पारंपरिक विग पहनने से इनकार कर दिया और गांधी टोपी पहनी.फिर 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में उन्हें स्पीकर चुना गया.हार से हताश मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना का दिल भी मावलंकर ने अपनी निष्पक्षता से जीत लिया.कहा जाता है कि सदन में एक बार नेहरू ने उत्तेजित होते हुए कोई बात कही तो मावलंकर ने उन्हें भी सदन की गरिमा याद दिलाई.
पहले लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव
पहले लोकसभा स्पीकर गणेश वासुदेव मावलंकर (जीवी मावलंकर) के खिलाफ दिसंबर 1954 में ये प्रस्ताव आया था. इसके बाद हुकुम सिंह 1966 में और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ भी ऐसा प्रस्ताव आया था.अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले विपक्षी दलों के सांसदों में आचार्य जेबी कृपलानी, सारंगधर दास और अन्य 21 विपक्षी सांसद शामिल थे. हिंदू महासभा के टिकट पर जीते ग्वालियर के लोकसभा सांसद डॉक्टर एनबी खरे भी इस प्रस्ताव के हस्ताक्षकर्ताओं में से थे.
नेहरू का पक्ष लेने का आरोप लगा था
विपक्ष का आरोप था कि मालवंकर लोकसभा की कार्यवाही में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पक्ष लेते हैं. बहस के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता. स्पीकर नियमों की व्याख्या सरकार के फायदे के हिसाब से करते हैं. हालांकि नेहरू ने लोकसभा में सदन का पिता कहा था. लोकसभा में कांग्रेस के बहुमत के कारण ये अविश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से गिर गया. मावलंकर 1956 में अपनी मृत्यु तक इस पद पर रहे.
'अध्यक्ष को पूरी तरह निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन मावलंकर जी का झुकाव अक्सर सत्तापक्ष की ओर रहता है.विपक्षी सदस्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त समय नहीं दिया जाता.
आचार्य जेबी कृपलानी, नेता विपक्ष
अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में किसने क्या कहा था
मैं इस सदन के किसी भी सदस्य की तुलना में अध्यक्ष को बेहतर जानता हूं, वे न केवल इस सदन के अध्यक्ष हैं, बल्कि वे हमारे मार्गदर्शक और 'सदन के पिता' ऐसे महान व्यक्ति पर अविश्वास जताना लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.
जवाहरलाल नेहरू, तत्कालीन प्रधानमंत्री
मावलंकर ने 6 साल जेल में बिताए
जीवी मावलंकर का का जन्म 27 नवंबर 1888 को बड़ौदा अब वडोदरा गुजरात में हुआ था. उन्हें दादासाहेब भी कहा जाता था. अहमदाबाद से स्कूली पढ़ाई के बाद मुंबई से LLB की थी.वो सरदार वल्लभभाई पटेल के करीब आए थे.उन्होंने असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 6 साल जेल में बिताए.
- वो बांबे लेजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष रहे
- 1946 में केंद्रीय विधानसभा का अध्यक्ष चुना गया.
- 1947-1952 आजादी के बाद संविधान सभा अध्यक्ष बने
- 1952 में भारत की पहली लोकसभा के स्पीकर बने
संसदीय नियमों की शुरुआत की
आज लोकसभा और राज्यसभा में जिन नियमों (Rules of Procedure) का पालन देखते हैं. इनमें से ज्यादातर नींव मावलंकर ने अपने कार्यकाल में रखी थी. संसद में प्रश्न काल की अहमियत बढ़ाने में उनका बड़ा योगदान था.
स्पीकर पद की परंपरा 100 साल पुरानी
भारत की संसदीय परंपरा में स्पीकर पद की परंपरा ब्रिटिश शासन के दौरान मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार और गवर्नमेंट ऑप इंडिया एक्ट 1919 के दौरान पड़ी. इसी में यह तय किया गया कि चुने गए स्पीकर को सदन में वोट के जरिये हटाया जा सकता है. वर्ष 1925 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में विट्ठलभाई पटेल को अध्यक्ष चुना गया था. उन्होंने स्पीकर चुने जाने के साथ ही कहा था कि अब वो किसी दल से संबंधित नहीं हैं और पूरी निष्पक्षता से सभी पार्टियों के लिए काम करेंगे. उसके बाद इब्राहिम रहमुत्ला और षणमुखम शेट्टी 1930 और 1935 में स्पीकर बने. अब्दुल रहीम 1945 तक स्पीकर रहे और उन्हीं के खिलाफ पहली बार (आजादी के पहले) पद से हटाने का प्रस्ताव आया.














