दिल्ली में एक पता था. जिसके लिए न चुनाव जीतना जरूरी था, न संसद का पास और न किसी बड़े नेता से मुलाकात. बस अपनी बात कहनी थी, हाथ में तख्ती उठानी थी और उम्मीद रखनी थी कि आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच ही जाएगी. वो पता था जंतर-मंतर. कभी यहां भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे अनशन पर बैठे, कभी निर्भया के लिए इंसाफ मांगती आवाजें पहुंचीं, कभी किसान आए तो कभी देश के लिए मेडल जीतने वाले पहलवान धरने पर बैठ गए. कुल मिलाकर जब भी किसी आम इंसान को लगता कि उसकी बात सत्ता तक नहीं पहुंच रही, तो उसके कदम इसी सड़क की तरफ बढ़ते थे. तीन दशकों में जंतर-मंतर विरोध का ऐसा पता बन गया, जिसे पूरा देश पहचानता था.
लेकिन अब यह पता बदल गया है. जंतर-मंतर वहीं है, उसकी करीब 300 साल पुरानी वेधशाला भी वहीं है, संसद और कनॉट प्लेस से उसकी दूरी भी नहीं बदली. बदला है उसका किरदार. दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया है. अब दिल्ली में रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली का CBD ग्राउंड प्रदर्शन के तय ठिकाने होंगे. यानी जिस जंतर-मंतर ने करीब तीन दशकों तक देश का गुस्सा, उम्मीद, आंदोलन और असहमति देखी, वहां अब प्रदर्शन नहीं होंगे.
कहानी विरोध से नहीं, आसमान से शुरू हुई थी
लेकिन जंतर-मंतर की पहली पहचान प्रदर्शन नहीं थी. इसकी कहानी करीब तीन सदी पीछे जाती है. 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने दिल्ली में इस खगोलीय वेधशाला का निर्माण करवाया था. यहां विशाल यंत्र बनाए गए जिनकी मदद से सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति तथा समय से जुड़ी गणनाएं की जाती थीं. दिल्ली का जंतर-मंतर जय सिंह की बनवाई पांच वेधशालाओं में शामिल था.
मुहम्मद शाह 'रंगीला' शुभ तिथियों और त्योहारों की सटीक गणना के लिए बेहतर तरीका चाहते थे. सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर के जरिए इसे संभव किया. आज यही जंतर-मंतर आधुनिक भारत में सत्ता के केंद्र के करीब मौजूद है.
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आज भी इसके लाल-गेरुए विशाल ढांचों के बीच बने सम्राट यंत्र, राम यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और मिसरा यंत्र इसकी वैज्ञानिक विरासत की कहानी कहते हैं. विडंबना देखिए, जिसे आसमान और समय को पढ़ने के लिए बनाया गया था, सदियों बाद उसी जगह के आसपास देश के राजनीतिक और सामाजिक समय की धड़कन पढ़ी जाने लगी.
आवाज सत्ता के करीब सुनाई देती थी
जंतर-मंतर के प्रोटेस्ट हब बनने में इसकी लोकेशन की बड़ी भूमिका रही. यह नई दिल्ली के बिल्कुल केंद्र में पार्लियामेंट स्ट्रीट पर, कनॉट प्लेस के पास मौजूद है. दिल्ली पर्यटन विभाग भी इसकी लोकेशन पार्लियामेंट स्ट्रीटबताता है और इसका नजदीकी मेट्रो स्टेशन पटेल चौक है.जंतर-मंतर की यही केंद्रीय स्थिति प्रदर्शनकारियों के लिए उसकी खासियत बनी क्योंकि यहां से संसद और केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण कार्यालयों के करीब अपनी मांग लेकर पहुंचना आसान हो जाता था. बाद में 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी यह दलील दर्ज हुई कि यहां प्रदर्शन करने वालों की आवाज को बल मिलता है और उन्हें ज्यादा दूर भेजने से उनका संदेश कमजोर पड़ सकता है.यानी जंतर-मंतर पर बैठना केवल धरना देना नहीं था. उसका पता भी संदेश का हिस्सा था.
पर जंतर-मंतर से पहले भी था एक 'जंतर-मंतर'
आज की पीढ़ी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का नाम सुनते ही जंतर-मंतर को याद करती रही है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था.एक दौर में सत्ता के सामने आवाज उठाने का बड़ा पता Boat Club के लॉन थे. इंडिया गेट और तत्कालीन राजपथ, अब कर्तव्य पथ, के आसपास के इलाके में बड़े प्रदर्शन होते थे. अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में विशाल किसान आंदोलन भी Boat Club पहुंचा था. बाद के वर्षों में सुरक्षा और व्यवस्था संबंधी चिंताओं के बीच वहां प्रदर्शनों पर पाबंदियां बढ़ीं और 1990 के दशक की शुरुआत में विरोध का केंद्र जंतर-मंतर की तरफ खिसक गया.साल 1993 के वक्त से जंतर-मंतर राजधानी के प्रमुख निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में उभरा और यहीं से 18वीं सदी की वेधशाला के पड़ोस में 20वीं और फिर 21वीं सदी के लोकतांत्रिक आंदोलनों की नई कहानी शुरू हुई.
नई दिल्ली में शनिवार, 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे एक प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेती पुलिस.
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1993...जब हजारों आवाजें यहां पहुंचीं
जंतर-मंतर के शुरुआती बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों में 1993 का 'जेल भरो' आंदोलन शामिल है. 33 संगठनों ने सरकार की आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ यहां प्रदर्शन किया था. संसद में भी इसका उल्लेख हुआ और एक सांसद ने करीब 25 हजार लोगों के इसमें शामिल होने का दावा किया था.इसके बाद जंतर-मंतर धीरे-धीरे ऐसा मंच बनता चला गया जहां किसान, ट्रेड यूनियन, छात्र, राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और व्यक्तिगत मुद्दों को लेकर आए लोग अपनी आवाज उठाने लगे.
अन्ना आए और देश की नजर जंतर-मंतर पर टिक गई
जंतर-मंतर की आधुनिक राजनीतिक पहचान में अप्रैल 2011 एक बड़ा पड़ाव है. 5 अप्रैल को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने यहां मजबूत जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर अनशन शुरू किया. आंदोलन ने जल्द ही राष्ट्रीय रूप ले लिया. सरकार संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी बनाने पर सहमत हुई और अन्ना हजारे ने 9 अप्रैल को अपना अनशन समाप्त किया. टीवी कैमरे जंतर-मंतर पर टिके और देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन फैल गया. इसके बाद जंतर-मंतर ऐसा नाम बन गया जिसे किसी पते की जरूरत नहीं थी. बस कहा जाता, "धरना जंतर-मंतर पर है."
निर्भया के लिए उठी आवाज भी यहां पहुंची
दिसंबर 2012 में दिल्ली में निर्भया के साथ हुई दरिंदगी के बाद जब देशभर में आक्रोश फूटा, जंतर-मंतर और उसके आसपास का इलाका भी इंसाफ और महिलाओं की सुरक्षा की मांग करने वाले प्रदर्शनों का महत्वपूर्ण केंद्र बना. बड़ी संख्या में लोग, खास तौर पर युवा, दिल्ली की सड़कों पर उतरे.इसके बाद के आने वाले वर्षों में भी किसानों, छात्रों, नागरिक संगठनों और दूसरी तमाम मांगों की आवाजें जंतर-मंतर पहुंचती रहीं. 2023 में देश के नामी-गिरामी पहलवानों का धरना भी इसी जगह को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आया. हाल के वर्षों में NEET से जुड़े आंदोलन भी यहां हुए और नतीजा देश के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के तौर पर सामने आया.
विरोध और आसपास रहने वालों के अधिकार टकराने लगे
हालांकि जंतर-मंतर की यही लोकप्रियता धीरे-धीरे उसकी सबसे बड़ी समस्या भी बनी. लगातार धरने, प्रदर्शन, लाउडस्पीकर, अस्थायी ढांचे और लंबे समय तक चलने वाले आंदोलनों को लेकर स्थानीय निवासियों की शिकायतें बढ़ीं. 2017 में National Green Tribunal ने जंतर-मंतर रोड पर धरने-प्रदर्शन रोकने और उन्हें दूसरी जगह स्थानांतरित करने का आदेश दिया था.लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल को नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और स्थानीय निवासियों के अधिकार, दोनों के संदर्भ में देखा. अदालत के सामने लगातार धारा 144 लगाकर सेंट्रल दिल्ली में सभाओं और प्रदर्शनों को प्रतिबंधित करने का मुद्दा भी था. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध की जगह संतुलन की बात कही और जंतर-मंतर के सीमित तथा नियंत्रित इस्तेमाल के लिए व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया. अदालत ने माना कि शांतिपूर्ण विरोध और प्रदर्शन मौलिक अधिकारों के दायरे में आते हैं, लेकिन दूसरे नागरिकों के अधिकारों का भी ध्यान रखना होगा.यानि संघर्ष तब भी वही था जो आज है: विरोध करने का अधिकार कहां तक और शहर की सामान्य जिंदगी का अधिकार कहां से?
फिर CJP आया और कहानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची
2026 में जंतर-मंतर एक बार फिर युवा आंदोलन की वजह से सुर्खियों में आया. CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और SIR में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर विरोध का आह्वान किया. हालिया विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के बीच मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.9 अक्टूबर की सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने वैकल्पिक प्रोटेस्ट साइट का सवाल उठा. अदालत ने ऐसे बड़े और खुले स्थान की जरूरत पर जोर दिया जहां प्रदर्शनकारियों को पीने का पानी, शौचालय और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें और वहां आपातकालिन प्रवेश-निकास भी प्रभावित न हो. अदालत ने सक्षम प्राधिकरण से इस दिशा में विचार करके उचित निर्णय लेने को कहा.महज दो दिन बाद, 11 अक्टूबर को पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले आदेश में जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के तौर पर डी नोटिफाई कर दिया गया.पुलिस कमिश्नर के आदेश में गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों का हवाला दिया गया.
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अब विरोध के तीन नए पते
दिल्ली में प्रदर्शन खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन उनके पते बदल गए हैं.अब रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली का CBD ग्राउंड प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल हैं. इन स्थानों पर प्रदर्शन के लिए विस्तृत और संशोधित SOP अलग से जारी करने की बात दिल्ली पुलिस ने कही है. इस तरह दिल्ली के प्रोटेस्ट मैप में एक और बदलाव हो गया. कभी बोट क्लब सत्ता तक आवाज पहुंचाने का बड़ा मंच था. वह जगह बदली तो जंतर-मंतर आया. अब तीन दशकों से ज्यादा समय बाद जंतर-मंतर की जगह विरोध की आवाजों को तीन दूसरे मैदान दिए गए हैं.
एक था जंतर-मंतर...
फिर भी जंतर-मंतर दिल्ली के नक्शे से कहीं नहीं जा रहा. 1724 में बने उसके खगोलीय यंत्र वहीं रहेंगे. सम्राट यंत्र पर सूरज की रोशनी भी पड़ेगी. कनॉट प्लेस और पार्लियामेंट स्ट्रीट की रफ्तार भी उसके आसपास चलती रहेगी. लेकिन दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में 2026 एक अलग लकीर जरूर खींच देगा, क्योंकि वह जगह जो करीब तीन दशकों तक देश में विरोध प्रदर्शन का पर्याय बनी रही, अब आधिकारिक तौर पर प्रदर्शन की जगह नहीं है. शायद जंतर-मंतर की कहानी की सबसे दिलचस्प बात भी यही है. जिस जगह को कभी वक्त मापने के लिए बनाया गया था, उसी जगह ने वर्षों तक अपने सामने से गुजरता देश का वक्त भी देखा. भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा देखा, इंसाफ मांगते युवाओं को देखा, किसान देखे, छात्र देखे, पहलवान देखे और लोकतंत्र में असहमति के बदलते रंग देखे.
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