- ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के कारण मोरबी सिरेमिक हब में प्राकृतिक गैस की भारी कमी और कीमतों में वृद्धि हुई है.
- मोरबी के सिरेमिक उद्योगपतियों ने गैस संकट के चलते कम से कम एक महीने तक उत्पादन बंद रखने का फैसला किया है.
- युद्ध के कारण बढ़ी लॉजिस्टिक्स लागत से विदेशी खरीदार माल उठाने से पीछे हट रहे हैं और कंटेनर वापस लौट रहे हैं.
ईरान, इजरायल-अमेरिका जंग का असर भारत पर पड़ता दिख रहा है. इस जंग और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के माहौल ने भारत की अर्थव्यवस्था के एक बड़े स्तंभ 'मोरबी सिरेमिक हब' (टाइल्स हब) को हिलाकर रख दिया है. युद्ध के कारण नेचुरल गैस और प्रोपेन गैस की भारी किल्लत और आसमान छूती कीमतों ने दुनिया के इस दूसरे सबसे बड़े सिरेमिक क्लस्टर को घुटनों पर ला दिया है. स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि मोरबी के उद्योगपतियों ने स्वेच्छा से कम से कम एक महीने तक उत्पादन बंद रखने का कड़ा फैसला लिया है.
गैस संकट और अनिश्चितता का साया
सिरेमिक उद्योग के लिए गैस रीढ़ की हड्डी के समान है. युद्ध के कारण सप्लाई चेन बाधित होने से गैस कंपनियों ने न केवल आपूर्ति कम कर दी है, बल्कि आने वाले दिनों में कीमतों में भारी बढ़ोतरी के संकेत भी दिए हैं. अनियमित गैस सप्लाई और अनिश्चित बाजार को देखते हुए मोरबी के कारखानों ने अपने भट्टों (Kilns) को ठंडा करने का निर्णय लिया है.
उद्योगपतियों का कहना है कि अधूरी और महंगी गैस के साथ फैक्ट्रियां चलाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है. पूर्व अध्यक्ष (मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन) निलेश जेतपरिया के अनुसार, गैस की कमी और बढ़ती लागत ने पूरे गणित को बिगाड़ दिया है, जिससे फिलहाल उत्पादन रोकना ही एकमात्र विकल्प बचा है.
विदेशी खरीदारों ने खींचे हाथ, कंटेनर होने लगे वापस
युद्ध का असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं है. अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर 'वॉर चार्ज' (युद्ध शुल्क) बढ़ने से लॉजिस्टिक्स की लागत कई गुना बढ़ गई है. इसके परिणामस्वरूप विदेशी खरीदार अब माल उठाने से पीछे हट रहे हैं. डराने वाली बात यह है कि टाइल्स से भरे कई कंटेनर बंदरगाहों से वापस लौटने लगे हैं, जिससे करोड़ों रुपये के आर्थिक नुकसान की आशंका जताई जा रही है.
कामगारों का पलायन: सूने पड़े कारखाने, भरी हुई ट्रेनें
फैक्ट्रियां बंद होने का सबसे दर्दनाक पहलू उन हजारों मजदूरों पर पड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी इन मशीनों से जुड़ी थी. काम बंद होने के बाद अब मजदूरों के पास अपने वतन लौटने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.
रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़
मोरबी से कामाख्या जाने वाली साप्ताहिक ट्रेन और अन्य राज्यों को जाने वाली ट्रेनों में मजदूरों की भारी भीड़ देखी जा रही है. पैर रखने तक की जगह नहीं होने के बावजूद मजदूर किसी भी तरह घर पहुंचने की कोशिश में हैं. यहां काम करने वाले बिहार-यूपी के मजदूर वापस लौट रहे हैं.
निजी बसों का सहारा
रेलवे के अलावा निजी ट्रैवल्स की बसें भी मजदूरों से खचाखच भरी नजर आ रही हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के हजारों कामगार अब अपने गांवों की ओर कूच कर रहे हैं. उद्योगपति केजी कुंडारिया ने बताया कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो आने वाले समय में जब फैक्ट्रियां दोबारा खुलेंगी, तब कुशल श्रम (Skilled Labor) की कमी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरेगी.
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