- इंदौर के भट्टारोड में 70 साल के नंदलाल पाल की उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद अस्पताल में मौत हुई.
- नंदलाल पाल को पहले वर्मा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया, फिर बड़े अस्पताल में कार्डियक अरेस्ट से निधन हुआ.
- परिवार का आरोप है कि नंदलाल पाल की तबीयत खराब होने का कारण गंदा नर्मदा का पानी पीना था.
इंदौर के भट्टारोड की एक पतली-सी गली में, एक पुरानी कुर्सी रखी है. धूप उसी पर पड़ती है, हवा भी वहीं से गुजरती है पर अब उस पर बैठने वाला कोई नहीं है. सत्तर साल के नंदलाल पाल उसी कुर्सी पर बैठते थे. सुबह की धूप लेते, राह चलते लोगों से हाल पूछते, और कभी-कभी सिर्फ चुपचाप बैठे रहते. मंगलवार की सुबह वे उसी कुर्सी से उठे और फिर कभी लौटकर नहीं आए.
भागीरथपुरा निवासी नंदलाल पाल को 28 दिसंबर को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद वर्मा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था. मंगलवार सुबह तबीयत बिगड़ी, दूसरा बड़े अस्पताल में शिफ्ट किया गया वहीं उन्होंने दम तोड़ दिया. डॉक्टरों ने कारण बताया कार्डियक अरेस्ट. लेकिन घर वालों के लिए यह सिर्फ एक मेडिकल टर्म नहीं है.
उनके लिए यह उस पानी की कहानी है जो उन्होंने पिया और उसके बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गई. नंदलाल के बेटे सिद्धार्थ पाल के हाथ में पिता की तस्वीर है. वो उसे सीने से लगाए रोते हैं, बाहर रखी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बस इतना कहते हैं, “अब उस कुर्सी पर बैठने वाला चला गया.”
मोबाइल में पिता की तस्वीर दिखाते नंदलाल के पुत्र, पीछे गुमसुम बैठीं घर की महिलाएं.
सिद्धार्थ की उम्र 30 साल है. दोनों बहनों की शादी हो चुकी है. मां पहले ही गुजर चुकी थीं. घर में नंदलाल और सिद्धार्थ ही थे. वो बताते हैं, “मैं ओंकारेश्वर गया हुआ था. पड़ोसियों को चाबी देकर गया था, उन्हें कहकर गया था पिताजी के लिये सुबह सात बजे दरवाज़ा खोल देना. सुबह फोन आया कि हालत बिगड़ रही है. मैं तुरंत लौट आया, सवारी छोड़ दी, पैसे भी नहीं लिए.”
पड़ोसियों ने कपड़े बदले, अस्पताल ले गए. डॉक्टर बोले बीपी कम है, उल्टी-दस्त रुक नहीं रहे. दिन भर में 30–35 डायपर बदले गए. मंगलवार सुबह वे बोल भी नहीं पा रहे थे. डॉक्टर को बुलाया गया, फिर एंबुलेंस से दूसरे अस्पताल ले गए लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
“उन्होंने पूरी कोशिश की,” सिद्धार्थ कहते हैं. “लेकिन बचा नहीं पाए.” घर में रिश्तेदार जमा हैं फूफा जी आए हैं, बड़ी मां आई हैं ...दूर के लोग आए हैं. पर कोई नेता, कोई अफसर, कोई प्रशासनिक चेहरा नहीं आया.
पिता की मौत और उसके बाद की कहानी बताते सिद्धार्थ.
नंदलाल के बेटे सिद्धार्थ ने कहा- “कल जब शव उठाया गया, मीडिया के साथी थे उन्होंने मदद की. सिद्धार्थ ने आगे बताया कि. “कह दिया गया है कि दो लाख का चेक मिलेगा… कैलाश विजयवर्गीय जी, रमेश जी, पार्षद बैठे थे, बोले आपका काम हो जाएगा. पर कोई घर पर नहीं आया.”
नंदलाल नर्मदा का पानी पीते थे. “पानी गंदा आता था,” सिद्धार्थ कहते हैं. “हम छोड़ देते थे थोड़ी देर, फिर छानकर पीते थे. रोटी, दवा, सब मैं ही देता था. वो बिल्कुल ठीक थे… सबसे बात करते थे.”
वह फिर उसी कुर्सी की तरफ देखते हैं. “पैसे का मैं क्या करूंगा अब? वो कुर्सी पर बैठने कभी नहीं आएंगे. पैसे का मैं क्या करूंगा उनके बिना?” गली में वही कुर्सी है. धूप भी वही है. हवा भी वही है. बस अब उस पर बैठने वाला कोई नहीं है.
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