नेवल अभ्यास 'मिलन' का गवाह बनेगा हिंद महासागर; चीन-पाकिस्तान-तुर्किए को सीधा संदेश

हिंद महासागर में नौसेना के अभ्यास 'मिलन' में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, रूस, कोरिया, जर्मनी, ब्रिटेन, ईरान और भारत हिस्सा ले रहे हैं. इससे चीन, पाकिस्तान और तुर्किए को सीधा संदेश मिलेगा.

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  • हिंद महासागर में फरवरी से शुरू हो रहे मिलन 2026 नौसैनिक अभ्यास में 72 देशों की नौसेनाएं भाग लेंगी
  • अभ्यास के दौरान पहले दो दिन हार्बर फेज में बंदरगाह पर और बाद में समुद्र में युद्धाभ्यास होगा
  • अमेरिका, रूस, ईरान सहित कई विरोधी देशों की नौसेनाएं एक साथ इस बहुपक्षीय अभ्यास में हिस्सा लेंगी
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नई दिल्ली:

हिंद महासागर में अब तक के सबसे बड़े नौसैनिक अभ्यास का गवाह बनने जा रहा है. 19 फरवरी से विशाखापट्टनम में शुरू होने जा रहे इस अभ्यास को 'मिलन 2026' नाम दिया गया है. एक्सरसाइज के शुरुआती दो दिनों तक हार्बर फेज में अभ्यास होगा. यानी इस दौरान सभी नेवल जहाज बंदरगाह में अभ्यास करेंगे. इस दौरान ये जहाज किसी संभावित युद्ध में आने वाली परिस्थितियों का रियल टाइम अभ्यास करेंगे. इसके बाद 25 फरवरी तक 'सी फेज' यानी समुद्र में अभ्यास होगा.

मित्रता और कूटनीतिक संदेश 

मित्रता और सहयोग पर आधारित अभ्यास 'मिलन' में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, रूस, कोरिया, जर्मनी, ब्रिटेन, ईरान और भारत हिस्सा ले रहे हैं. ये देखना वाकई में दिलचस्प है कि एक तरफ जहां अमेरिका के एयरक्राफ्ट कैरियर ईरान की घेराबंदी में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत में दोनों के नेवल शिप एक साथ अभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं. वहीं इस जगह अमेरिका और रूस भी एक साथ, एक पाले में खड़े दिखेंगे. ये इस बात को दर्शाता है कि भारत किसी भी तरह की बातचीत के लिए कूटनीतिक तौर पर एक महत्वपूर्ण ग्राउंड है. 

इसके अलावा 19 देशों के साथ कुल मिलाकर 72 देश अभ्यास में जुटे हैं. लेकिन इसमें तीन देशों के वॉरशिप नहीं है. ये तीन देश पाकिस्तान-चीन और तुर्किए हैं. यानी भारत ने न सिर्फ अभ्यास को आयोजित किया है, बल्कि ये कूटनीतिक संदेश भी दिया है कि भारत किसी भी सूरत में आतंकवाद और उसे शह देने वाले देशों से कोई सैन्य गठजोड़ नहीं रखेगा. भारत का हर समझौता अब साझा हित के आधार पर ही तय किया जाएगा.

जो देश इस अभ्यास में अपने जहाज लेकर नहीं आए हैं, उन्होंने उसकी जगह अपने डेलिगेशन भेजे हैं. यहां पर विदेश से 19 जंगी जहाज आये हैं. करीब 70 देशों वाले इस 'मिलन' अभ्यास में सारे क्वाड देशों (भारत-अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया-जापान) के नौसेना की मौजूदगी बड़ा संकेत हैं. भारत ने हमेशा क्वाड को एक अहम संगठन माना है. और अब साझा अभ्यास में चारों देश की नौसेना एक साथ एक दुश्मन से लड़ने का अभ्यास करेंगी.

'मिलन' की शुरुआत 

मिलन नौसैनिक अभ्यास की अंडमान-निकोबार से शुरुआत 1995 में हुई. शुरुआत में इस अभ्यास का दायरा काफी सीमित था. तब सिर्फ अंडमान-निकोबार के आसपास के 6 से 7 देश ही इसमें हिस्सा लेते थे. लेकिन 2020 के बाद यह बहुपक्षीय समुद्री अभ्यास बन गया. 2026 का मिलन इस मायने में खास है क्योंकि इसका आयोजन इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और आईओएनएस के साथ किया जा रहा है. 

एक दुश्मन-साझा लक्ष्य और आपसी हित पर जोर

इस अभ्यास के पीछे ये सोच है कि सामान सोच वाली नौसेनाएं आपस मे मिलकर एक दूसरे की रणनीति सीखें ताकि कल कोई समुद्री ऑपेरशन करने का मौका आये तो आपस में किसी तरह के तालमेल की कमी न हो. मिलन अभ्यास को इसलिए भी याद किया जाएगा कि एक दूसरे के धुर विरोधी देश अपने जंगी जहाज के साथ अभ्यास में भागीदार बने हैं. हाल के सालों में यह पहली बार है कि एक ही सैन्य अभ्यास में अमेरिका भी है ,रूस भी है, ऑस्ट्रेलिया भी है और ईरान भी. सबसे बड़ी बात यह भी है कि किसी के होने से किसी को कोई दिक्कत नही हैं. यह भारत की नेवल डिप्लोमेसी को भी दिखाता है कि भारतीय नौसेना के बुलावे पर दुनिया की बड़ी नौसेनाएं बड़े, बावजूद आपसी मतभेद के एक मंच पर आसानी से जुट जाते हैं.

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