भारतीय सेना आज आधुनिक, मोबाइल, रणनीतिक और आत्मनिर्भर स्वरूप में तेजी से परिवर्तित हो रही है. डिजिटल एकीकरण, AI, रियल-टाइम डेटा और सुरक्षित संचार पर फोकस के साथ साथ भैरव जैसी नई मोबाइल ड्रोन-आधारित यूनिट्स तथा नए हथियारों के साथ सेना अत्यंत फुर्तीली व बहु-क्षेत्रीय युद्ध के लिए तैयार है. यह परिवर्तन न केवल सीमा सुरक्षा बल्कि भविष्य की अनिश्चित चुनौतियों के लिए भी भारतीय सेना को विश्वस्तरीय, तकनीक-संचालित शक्ति बना रहा है.
रुद्र ब्रिगेड से अलग कैसे है IBG?
सेना पहले ही सात रुद्र ब्रिगेड खड़ी करने की योजना की घोषणा कर चुकी है, जिनमें से दो सक्रिय हो चुकी हैं. रुद्र ब्रिगेड एक ऑल-आर्म्स, टेर्रेन और टास्क-स्पेसिफिक संरचना है, जिसे विशेष और रक्षात्मक प्रकृति के सक्रिय अभियानों के लिए डिज़ाइन किया गया है. इसमें 3000 से 3500 सैनिकों के बीच होगी और इसकी कमान ब्रिगेडियर रैंक का अधिकारी संभालेगा.वहीं IBG अपेक्षाकृत बड़ी, अधिक मोबाइल और आक्रामक संरचना है, जिसे सीमित समय में निर्णायक सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार किया गया है.
क्यों पड़ी IBG की ज़रूरत?
2001 में संसद पर हमले के बाद शुरू हुए ऑपरेशन पराक्रम के दौरान सैनिकों की तैनाती में कई सप्ताह लग गए थे. इस देरी ने सेना और सरकार दोनों को यह सोचने पर मजबूर किया कि परमाणु पृष्ठभूमि में एक तेज़ और सीमित युद्ध क्षमता विकसित की जाए. 2016 के उरी हमले और 2017 के डोकलाम गतिरोध के बाद IBG की अवधारणा को औपचारिक रूप मिला. 2018 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने इसे भारतीय सेना की भविष्य की संगठनात्मक संरचना बताया था. 2018 से 2020 के बीच IBG को पाकिस्तान और चीन दोनों मोर्चों पर परखा गया.
सूत्रों के अनुसार इसका औपचारिक रोलआउट 2021 में होना था, लेकिन कोविड-19 महामारी और पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ लंबे गतिरोध के कारण इसमें देरी हुई. रक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों का कहना है कि IBG की संरचना काफी हद तक पहले ही तैयार थी और 17 माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स की इकाइयाँ लंबे समय से इसी मॉडल पर काम कर रही थीं. जाहिर सी बात है सेना अब आक्रमक, लचीला और घातक बन रही है ताकि किसी हालात का बिना किसी देरी के बख़ूबी जवाब दे सके .
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