- पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने अपनी नई किताब 'द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड' लॉन्च की है
- इस किताब में सैन्य मिथकों और रहस्यों को उजागर करने का प्रयास किया गया है
- जनरल नरवणे ने किताब की अनबॉक्सिंग करते हुए इसका वीडियो भी साझा किया है
पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने फिर अपनी एक नई किताब लॉन्च की है. जनरल मनोज नरवणे ने अपनी नई किताब की लॉन्च की अनबॉक्सिंग भी की और वीडियो भी बनाया. पूर्व आर्मी चीफ की किताब का नाम द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज है. पूर्व थलसेना प्रमुख ने बताया कि उन्हें ये किताब लिखने का आईडिया कांग्रेस सांसद शशि थरूर से मिला है.
पूर्वी सेना चीफ जनरल मनोज नरवणे ने अपेन एक्स हैंडल पर अपनी नई किताब The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries को लॉन्च करने के बाद बताया कि मुझे इस किताब को लिखने का आइडिया एक दोस्त के घर शशि थरूर की किताब “ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स” को देखने के बाद आया. जनरल मनोज नरवणे ने आगे कहा कि उनकी यह किताब भारतीय सशस्त्र बलों के उन पहलुओं को सामने लाती है, जो अब तक कम चर्चा में रहे हैं और कई बार अजीब, दिलचस्प और बेहद मजेदार भी हैं. किताब प्रेमियों के लिए ये अमेजन पर उपलब्ध भी है.
किताब में क्या खास?
हाल ही में अपनी अप्रकाशित विवादित आत्मकथा “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” को लेकर चर्चा में रहे जनरल नरवणे ने अपनी नई किताब “द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज” में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़ी कई रोचक कहानियों, मिथकों और दंतकथाओं का जिक्र किया है.यह किताब भारतीय सशस्त्र बलों की विरासत और रहस्यों की एक दिलचस्प झलक पेश करती है.
किताब की भूमिका में जनरल मनोज नरवणे बताते हैं कि शशि थरूर की किताब “ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स” ने उन्हें काफी प्रभावित किया था. यह किताब अंग्रेजी भाषा की खास‑खास और अनोखी बातों पर आधारित लेखों का संग्रह है.उन्होंने बताया कि अगर अंग्रेजी भाषा की छोटी‑छोटी खासियतों और अजीब पहलुओं पर इतनी दिलचस्प किताब लिखी जा सकती है, तो फिर भारतीय सेना पर इसी तरह की किताब क्यों नहीं लिखी जा सकती? जनरल मनोज नरवणे दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना प्रमुख (28वें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) के रूप में सेवा दी थी. नरवणे आगे लिखते हैं कि इस विचार का बीज उनके मन में किताब देखते ही पहले दिन आ गया था, लेकिन वे इस पर गंभीरता से विचार केवल 2025 के मध्य में ही कर पाए.
बदलूराम कौन थे?
रूपा प्रकाशन की ओर से प्रकाशित इस किताब में जनरल मनोज नरवणे ने कई दिलचस्प किस्से साझा किए हैं. इसमें बताया गया है कि लोकप्रिय नारा ‘चक दे फट्टे' की जड़ें वास्तव में 17वीं और 18वीं सदी की सिख सेना में हैं. किताब में यह भी बताया गया है कि मशहूर गीत ‘बदलूराम का बदन' को किस घटना से प्रेरणा मिली. बदलूराम 1944 में कोहिमा की निर्णायक लड़ाई में शहीद हुए थे. किताब में लिखा है कि चाहे वह बाबा हरभजन की अमर गाथा हो, आईएनएस खुकरी का दुर्भाग्यपूर्ण अंत, वायुसेना के जवानों और उनके कॉल साइन की अनोखी कहानियां, या फिर पेडोंगी नामक सैन्य खच्चर का अद्भुत साहस,इस किताब में और भी बहुत कुछ मिलेगा. यह किताब हमारी सशस्त्र सेनाओं के उन पहलुओं को सामने लाती है, जो अब तक कम चर्चा में रहे हैं, कभी अजीब लगते हैं और कई बार बेहद मनोरंजक भी हैं, लेकिन साथ ही गहराई से शोध पर आधारित हैं.
‘बदलूराम का बदन' गीत अब असम रेजिमेंट का रेजिमेंटल एंथम बन चुका है और शिलांग के हैप्पी वैली स्थित रेजिमेंटल सेंटर में पासिंग‑आउट समारोह के दौरान होने वाली अटेस्टेशन परेड (कसम परेड) में गाया जाता है.जनरल नरवणे लिखते हैं कि marching, जोरदार कदमों की थाप, ताली और जोश से भरे कदमों के साथ गाया जाने वाला यह गीत देश की सीमाओं से भी आगे पहचान बना चुका है.
बदलूराम, असम रेजिमेंट की पहली बटालियन में राइफलमैन थे और कोहिमा में तैनात गारिसन का हिस्सा थे. युद्ध की शुरुआती झड़पों में वे शहीद हो गए थे.
जनरल नरवणे लिखते हैं कि बदलूराम की शहादत के बाद, उनकी कंपनी के क्वार्टरमास्टर (CQM) ने चाहे यह गलती से हुआ हो या जानबूझकर, बदलूराम का नाम राशन सूची से नहीं हटाया. जब तक सप्लाई लाइन खुली रही, बदलूराम के नाम पर मिलने वाला राशन आता रहा और धीरे‑धीरे एक छोटा सा अतिरिक्त भंडार जमा हो गया. यही घटना आगे चलकर इस मशहूर गीत और उससे जुड़ी परंपरा की प्रेरणा बनी.
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किताब में अनकही दास्तान
किताब में लिखा गया है कि जब जापानी सेनाओं ने कोहिमा में यूनिट को घेर लिया और सप्लाई लाइन कट गई, तब वही अतिरिक्त राशन का भंडार कई सैनिकों की जान बचाने में काम आया. 1946 में, मेजर एम. टी. प्रोक्तर इस कहानी से बेहद प्रभावित हुए.उन्हें यह सोचकर गहरा असर हुआ कि कैसे एक शहीद सैनिक के नाम पर अनजाने में लिया जाता रहा राशन, बाद में जीवन रक्षक साबित हुआ. इसी प्रेरणा से उन्होंने मशहूर मार्चिंग गीत ‘बदलूराम का बदन' की रचना की. जनरल मनोज नरवणे लिखते हैं कि वह चाहते थे कि ये कहानियां आम लोगों तक पहुंचें, अकादमिक कम और किस्सों के रूप में ज्यादा हों, लेकिन इनके पीछे सेनाओं की सोच और मूल्यों का संदेश जरूर हो.वह लिखते हैं,“ये कहानियां किसी धूल भरे संग्रहालय में छिपे जटिल सैन्य तथ्यों पर आधारित नहीं हो सकती थीं. इन्हें सतह के करीब होना था, ताकि आम पाठक उनसे जुड़ सकें,शायद उन बातों के जरिए, जिनसे वे रोज सामना करते हैं, भले ही उन्हें उनके ऐतिहासिक महत्व की जानकारी न हो.”
जनरल मनोज नरवणे के अनुसार, किताब में शामिल सभी कहानियों की जड़ें किसी न किसी सच्ची घटना में हैं, जो समय के साथ बार‑बार सुनाई जाने के कारण थोड़ा बदली‑संवरी गईं. उन्होंने कहा कि हर कहानी का उद्देश्य महत्वपूर्ण घटनाओं या व्यक्तित्वों को जीवंत रूप में सामने लाना है और साथ ही सशस्त्र बलों और आम नागरिक समाज के बीच की दूरी को पाटना, ताकि लोग इस दुनिया को थोड़ा नजदीक से समझ सकें. जनरल नरवणे ने बताया कि उनकी यह किताब मनोरंजन के लिए लिखी गई है, न कि किसी गंभीर अकादमिक अध्ययन या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए. इस बीच, जनरल नरवणे की आत्मकथा “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” को लेकर कुछ अनधिकृत प्रतियों के चलन की खबरों के बीच, प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने फरवरी में स्पष्ट किया था कि इस पुस्तक के प्रकाशन के विशेष अधिकार उन्हीं के पास हैं और यह किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है. जनरल नरवणे ने भी साफ किया है कि उनकी इस आत्मकथा की कोई भी प्रति चाहे छपे रूप में हो या डिजिटल अब तक प्रकाशित, वितरित या बेची नहीं गई है, और न ही आम लोगों के लिए उपलब्ध कराई गई है.
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