- जर्मन राजदूत ने कहा कि भारत में अक्षय ऊर्जा की परियोजनाएं बहुत विशाल, महत्वकांक्षी और असरकारी हैं.
- 2047 तक भारत का ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य भी है. ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को इस लक्ष्य से जोड़ा गया है.
- भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में अहम सफलता हासिल की है, इसमें पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन भी शामिल है
नई दिल्ली में एक बयान आया और उसने भारत के ऊर्जा भविष्य को लेकर उम्मीदों से भरा एक बहुत सकारात्मक सवाल खड़ा कर दिया. सवाल यह कि क्या जो देश इस समय सबसे अधिक ऊर्जा का इम्पोर्ट करने वाले टॉप तीन देशों में शामिल है, वो आने वाले वर्षों में खुद ऊर्जा एक्सपोर्ट करने वाला देश बन सकता है?
दरअसल इस उम्मीद को भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन के उस बयान से बल मिला जो उन्होंने इंडो-जर्मन इंडस्ट्रीज डायलॉग में दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों में भारत ऊर्जा निर्यातक बन सकता है और जर्मनी उन देशों में शामिल हो सकता है जो भारत से ग्रीन हाइड्रोजन खरीदेंगे.
एकरमैन ने गुजरात के कच्छ में विशाल अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने जिस पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा क्षमता विकसित किए हैं, वे बेहद असरकारी हैं. उन्होंने भारत के ग्रीन हाइड्रोजन कार्यक्रम को बेहद महत्वाकांक्षी बताते हुए कहा कि जर्मनी और भारत हाइड्रोजन तकनीक पर बहुत ठोस तरीके से साथ काम कर रहे हैं.
उन्होंने जर्मन कंपनी थायसेनक्रुप और भारतीय कंपनी भेल के बीच ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़े उपकरणों के लिए समझौते को भी अहम बताया. इस दौरान उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक को स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग से जोड़ना, ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में एक बड़ा कदम है. दरअसल ये वो तकनीक है जिसमें पानी में बिजली प्रवाहित कर के उसमें मौजूद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है. तो क्या भारत की ऊर्जा कहानी बदलती हुई दिखाई दे रही है.
भारत तो एनर्जी खरीदने वाला देश है?
आज बेशक भारत, दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा खरीदारों में शामिल है. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार पिछले कई वर्षों से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बात करते रहे हैं. 2047 तक भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाना सरकार के दीर्घकालिक विजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को इसी लक्ष्य से जोड़ा गया है.
यहां एक अहम बात समझने वाली है कि भारत तेल या गैस निर्यातक बनने की तैयारी नहीं कर रहा. बल्कि ग्रीन एनर्जी एक्सपोर्टर बनने की तैयारी कर रहा है.
लेकिन सवाल ये भी उठता है कि आखिर भारत किस तरह की एनर्जी बेच सकता है?
तो इसका जवाब है- ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया, ग्रीन मेथनॉल, स्वच्छ बिजली आधारित औद्योगिक ऊर्जा उत्पाद और संभवतः ग्रीन एविएशन फ्यूल भी.
इन सभी ऊर्जा उत्पादों की खास बात यह है कि इन्हें बनाने के लिए कोयला, तेल या गैस की जरूरत नहीं होती. ये सस्ती और स्वच्छ बिजली के इस्तेमाल से भी बन सकती हैं.
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फैक्ट्री में बहुत अधिक ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाली कई मीट्रिक टन की भट्टी भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन से भी चलाई जा सकेगी.
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ग्रीन हाइड्रोजन आखिर है क्या?
ग्रीन हाइड्रोजन के बारे में हाल के दिनों में खूब चर्चा हुई है. भारत में ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में कई बड़े कदम उठाए जा रहे हैं, जिसमें परमाणु ऊर्जा से इसका उत्पादन और पहली हाइड्रोजन ट्रेन का संचालन शामिल है.
जब पानी को बिजली की मदद से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग किया जाता है, तो इसे इलेक्ट्रोलाइसिस कहते हैं. इसके लिए सौर या पवन जैसे अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है, बदले में जो हाइड्रोजन तैयार होती है उसे ही ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है. यानी ग्रीन हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है, जिसका निर्माण जीवाश्म ईंधनों के बजाय, सौर या पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल करके किया जाता है.
भारत सरकार द्वारा अधिसूचित मानकों के अनुसार, इस तरह से बनाया गया हाइड्रोजन ग्रीन तभी माना जाता है, जब इस प्रक्रिया से होने वाला कुल उत्सर्जन बहुत कम, यानी हर 1 किग्रा हाइड्रोजन बनाने पर 2 किलो CO₂ से ज्यादा न हो. ग्रीन हाइड्रोजन बायोमास (जैसे कृषि अपशिष्ट) को हाइड्रोजन में बदलकर भी बनाया जा सकता है, बशर्ते उत्सर्जन उसी निर्धारित सीमा से नीचे रहे.
यानी इसमें न कोयला जलता है, न तेल और न ही गैस. सबसे बड़ी बात ये कि कार्बन उत्सर्जन भी करीब-करीब शून्य होता है. इसी वजह से दुनिया इसे भविष्य का स्वच्छ ईंधन मान रही है.
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दुनिया को ग्रीन हाइड्रोजन की जरूरत क्यों पड़ने वाली है?
दुनिया में कई उद्योग ऐसे हैं जिन्हें केवल बिजली से नहीं चलाया जा सकता. उदाहरण के लिए- स्टील, उर्वरक, शिपिंग, रिफाइनरी, भारी ट्रक, विमानन क्षेत्र.
इन क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन की जगह लेने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन को सबसे बड़े विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. यही कारण है कि यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे कई देश पहले से ही भविष्य के आयात स्रोत तलाश रहे हैं.
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जर्मनी भारत से हाइड्रोजन क्यों खरीदना चाहता है?
क्योंकि जर्मनी के पास तकनीक है, लेकिन उसके पास भारत जैसी विशाल सौर क्षमता नहीं है. केवल क्षेत्रफल के आधार पर ही देखें तो जर्मनी का क्षेत्रफल भारत का महज 10.86% है.
इसके अलावा यूरोपीय अर्थव्यवस्था में जर्मनी, इटली और आयरलैंड उन देशों में शामिल हैं, जहां बिजली की लागत सबसे अधिक है. इसकी सबसे बड़ी वजह यहां बिजली बनाने की लागत समेत, भारी भरकम टैक्स और पर्यावरणीय शुल्क जोड़ा जाना है.
अब चूंकि जर्मनी में आबादी भारत की तुलना में महज साढ़े पांच फीसद है, तो अगर वो बिजली के घरों के मौजूदा बुनियादी ढांचों के अतिरिक्त निर्माण करेगा तो उसकी लागत अधिक बैठेगी और उस लागत को बिजली के बिल में अपनी जनता से वसूलेगा, तो ऐसी स्थिति में मौजूदा प्रति यूनिट बिजली का रेट और अधिक आसमान छूने लगेगा. जो पहले से रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रहा है.
दरअसल, यूक्रेन-रूस युद्ध ने जर्मनी और यूरोप की रूसी ऊर्जा पर पुरानी भारी निर्भरता को तो खत्म कर दिया है, लेकिन अब वो अमेरिका, नॉर्वे और एलएनजी जैसे नए विकल्पों पर निर्भर हो गए हैं. पहले यह निर्भरता रूस पर थी. लेकिन अब वहां बिजली बेतहाशा महंगी हो गई है. इसकी वजह से उद्योगों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
वर्तमान निर्भरता कम करने के लिए जर्मनी और यूरोप ने सोलर और पवन ऊर्जा जैसे हरित विकल्पों पर अपना निवेश तेजी से बढ़ाया है, पर ये भविष्य में पर्याप्त नहीं होंगे क्योंकि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जितना वो निवेश करेंगे, उतना ही लागत आमजनों से बिजली बिल के माध्यम से लेंगे. ऐसे में उनके पास सबसे बढ़िया विकल्प पर्यावरण के अनुकूल बिजली आयात करना है.
जहां जर्मनी के पास भारत का केवल 10 फीसद जमीन है. वहीं इसके उलट भारत के पास विशाल धूप वाले क्षेत्र, बड़े सौर पार्क, लंबी समुद्री तटवर्ती इलाके, तेजी से बढ़ती विंड एनर्जी सेक्टर है, जहां अपेक्षाकृत कम लागत वाली बिजली का उत्पादन होता है. यही वजह है कि दुनिया भारत को संभावित ग्रीन हाइड्रोजन सप्लायर के रूप में देखने लगी है.
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दुनिया के मौजूदा ऊर्जा निर्यातक कौन हैं?
अगर आज की दुनिया को देखें तो ऊर्जा निर्यात का मतलब मुख्य रूप से तेल और गैस के निर्यात हैं. इन ऊर्जा निर्यातक देशों में सऊदी अरब, रूस, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा प्रमुख नाम हैं.
इन देशों ने दशकों तक तेल और गैस बेचकर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर राज किया है. पर अब दुनिया भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रौद्योगिकी समेत एनर्जी भी संक्रमण काल से गुजर रही है. इस नए दौर में सवाल ये है कि अगला बड़ा ऊर्जा निर्यातक कोई तेल उत्पादक देश ही होगा, या फिर वह देश जिसके पास सबसे ज्यादा सस्ती ग्रीन एनर्जी होगी?
यहीं पर भारत की एंट्री होती है, जो बेशक तेल का किंग नहीं है, पर अक्षय ऊर्जा की महाशक्ति बनने की रेस में जरूर शामिल हो चुका है.
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