Explainer: संसद कितने घंटे काम कर रही है? हर मिनट 2.5 लाख रुपये का, फिर कामकाज ठप रहने का नुकसान कितना बड़ा?

मानसून सत्र 2026 में लगातार हंगामे और स्थगन के कारण संसद का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ है. दोनों सदनों की कार्यवाही का अनुमानित खर्च 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट माना जाता है. ऐसे में कामकाज ठप रहने का नुकसान कितना बड़ा और कीमत कौन चुका रहा है?

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संसद के प्रत्येक सदन के संचालन में हर एक मिनट सवा लाख रुपये का अनुमानित खर्च आता है
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  • संसद सत्र के संचालन का अनुमानित खर्च 2.5 लाख प्रति मिनट माना जाता है. हालांकि वास्तविक नुकसान कहीं बड़ा है.
  • संसद में लगातार व्यवधानों से प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधेयकों पर चर्चा जैसी संसदीय प्रक्रियाएं प्रभावित होती हैं.
  • पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू का मानना है कि लगातार व्यवधान संसद की भूमिका को कमजोर करते हैं.

मानसून सत्र के 15वें दिन संसद के दोनों सदनों में एक बार फिर कार्यवाही नहीं हो सकी. दोनों सदनों को सोमवार की सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. 20 जुलाई को शुरू हुए संसद के मानसून सत्र के पहले दिन दोनों सदनों ने आधे घंटे से थोड़ा अधिक काम किया. यह सत्र 13 अगस्त तक चलना है और अभी दोनों सदनों की चार सिटिंग और बाकी है. लेकिन अब तक की 15 सिटिंग में आलम ये है कि दोनों सदनों कुल मिलाकर 39 घंटे भी काम नहीं हुए हैं.

अब तक मानसून सत्र के 15 दिनों के दौरान दोनों सदन रोजाना करीब आधा घंटा ही काम करते आ रहे हैं. हालांकि इस दौरान 28 जुलाई को लोकसभा ने 8.83 घंटे काम किया तो 30 जुलाई को 6.65 घंटे काम किया. जो इस सत्र में इन दोनों सदनों का सर्वाधिक कामकाजी दिन रहा. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर लगातार हंगामे और स्थगन के कारण संसद का कामकाज कितना हुआ और इसका नुकसान कितना बड़ा है?

लोकतंत्र के सबसे बड़े मंच संसद में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सरकार से सवाल पूछते हैं, नीतियों पर बहस करते हैं, कानून बनाते हैं और देश से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा होती है. लेकिन जब संसद बार-बार हंगामे की वजह से ठप हो जाए, तो नुकसान केवल उस दिन की कार्यवाही का नहीं होता, बल्कि कानून बनाने की प्रक्रिया और सीधे तौर पर सरकार की जवाबदेही भी प्रभावित होती है, साथ ही इसका आर्थिक नुकसान करदाताओं के करोड़ों रुपये की बर्बादी के तौर पर भी होता है.

सवाल ये भी उठ रहा है कि संसद नहीं चलने की असली कीमत आखिर कौन चुका रहा है? संसद ठप होने का मतलब महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का नहीं होना, जनता के मुद्दे का नहीं उठाया जाना, सरकार की जवाबदेही तय नहीं हो पाना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ना है.

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संसद का एक मिनट कितना महंगा?

संसद का संचालन एक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है. इसमें सांसदों के बैठने से लेकर सचिवालय, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी सुविधाएं, अनुवाद सेवाएं, कर्मचारियों का वेतन और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाएं शामिल होती हैं. इसी वजह से संसद की कार्यवाही का हर मिनट काफी महंगा माना जाता है.

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पूर्व संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने साल 2012 में बताया था कि संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही चलने का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट आता है. इसमें लोकसभा और राज्यसभा, दोनों का खर्च शामिल है. इस अनुमान के मुताबिक प्रत्येक सदन के संचालन में करीब 1.25 लाख प्रति मिनट खर्च होते हैं. 

ऐसे में अगर दोनों सदन कुल एक घंटे काम करे तो इस पर 1.5 करोड़ रुपये की लागत आती है. हालांकि यह अनुमान एक दशक से अधिक पुराना है. तब से वेतन, सुरक्षा और अन्य प्रशासनिक खर्च बढ़ चुके हैं. इसलिए वास्तविक खर्च इससे अधिक हो सकता है. लेकिन सरकार की ओर से कोई नया आधिकारिक अनुमान उपलब्ध नहीं कराया गया है इसलिए आज भी यही आंकड़ा सबसे अधिक प्रचलित है.

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संसद को कितने घंटे चलना चाहिए?

आम तौर पर, कुछ मौकों को छोड़कर संसद की बैठक छह घंटे के लिए तय होती है. ये मौके- राष्ट्रपति का भाषण और स्पीकर का चुनाव वगैरह होते हैं. हालांकि, संसद अपना काम पूरा करने के लिए तय कामकाज के घंटों को बढ़ा सकती है. कार्यवाही के छह घंटे में दोपहर के एक घंटे का भोजन अवकाश शामिल नहीं होता.

यानी यदि संसद का एक कार्य दिवस पूरा चलता है, तो छह घंटे के दौरान सांसदों को प्रश्न पूछने, विधेयकों पर चर्चा करने, विभिन्न मंत्रालयों को जवाब देने और जनहित के मुद्दे उठाने का अवसर मिलता है.

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लेकिन मानसून सत्र में ऐसा नहीं हो सका. लगातार हंगामे के कारण सदन बार-बार स्थगित होते रहे और तय समय के अनुसार कामकाज नहीं हो पाया.

बता दें कि पिछले 20 सालों में लोकसभा ने अपने तय समय का 81% काम किया है. वहीं राज्यसभा ने पिछले 20 सालों में अपने तय समय का 76% काम किया है.

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15 दिन का सत्र, लेकिन काम कितना हुआ?

मानसून सत्र के पहले 15 दिनों में दोनों सदनों को कुल 90 घंटे तक काम करना चाहिए था. लेकिन लगातार व्यवधानों के कारण वास्तविक स्थिति इससे काफी अलग रही.

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार. अब तक राज्यसभा करीब 23 घंटे ही चल सकी. वहीं लोकसभा ने तो इससे भी कम लगभग 16 घंटे का ही काम किया. यानी कुल मिलाकर करीब 39 घंटे का काम हुआ है, जबकि 15 सत्रों में दोनों सदनों में कुल 180 घंटे की कार्यवाही होनी चाहिए थी.

इसका मतलब है कि दोनों सदनों का निर्धारित समय का बड़ा हिस्सा हंगामे और स्थगन की वजह से चला गया. राज्यसभा में यह 63 घंटे तो लोकसभा में 74 घंटे होता है.

यदि इसे मिनटों में देखा जाए तो राज्यसभा में 3780 मिनट और लोकसभा में 4440 मिनट कार्यवाही नहीं हुई.

इन आंकड़ों के आधार पर राज्यसभा में व्यवधान के कारण लगभग 47.25 करोड़ का नुकसान हुआ. तो लोकसभा में यह लगभग 55.50 करोड़ रुपये होता है.

यह आंकड़े प्रति सदन 1.25 लाख रुपये प्रति मिनट की लागत के आधार पर लगाया गया है.

हालांकि वास्तविक खर्च इससे अधिक भी हो सकता है क्योंकि यह गणना 2012 के अनुमान पर आधारित है.

संसद नहीं चलने का असल नुकसान क्या?

संसद नहीं चलने का अर्थ सिर्फ इतना नहीं है कि करोड़ों रुपये खर्च हो गए. असल नुकसान यह है कि जिन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए थी, वे अधूरे रह जाते हैं. सांसद सरकार से जवाब नहीं मांग पाते. महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तार से बहस नहीं हो पाती.

लगातार हंगामे की वजह से न तो प्रश्नकाल और न ही शून्य काल जैसी महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रियाएं भी प्रभावी ढंग से नहीं चल सकीं. यही वे घंटे होते हैं जब सांसद सरकार से सीधे सवाल पूछते हैं और जनता से जुड़े तत्काल मुद्दे सदन में उठाते हैं.

प्रश्नकाल (Question Hour) वह समय होता है जब सांसद विभिन्न मंत्रालयों से सीधे सवाल पूछते हैं और सरकार को जवाब देना पड़ता है.

शून्य काल (Zero Hour) के दौरान सांसद अपने क्षेत्र और देश से जुड़े तत्काल महत्व के मुद्दे उठाते हैं.

लेकिन इस मानसून सत्र में लगातार हंगामे के कारण ये दोनों प्रक्रियाएं सामान्य रूप से संचालित नहीं हो सकीं.

यहां तक कि बगैर किसी बहस के विधेयक भी पारित हुए. 31 जुलाई को रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ ऐंड डेथ (संशोधन) विधेयक लोकसभा में बिना चर्चा के पारित कर दिया गया. इसके बाद दोनों सदनों की कार्यवाही समय से पहले स्थगित कर दी गई.

संसदीय जानकारों का मानना है कि किसी भी विधेयक पर विस्तृत चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है. बहस के दौरान विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों अपने सुझाव रखते हैं, संशोधन प्रस्तावित करते हैं और संभावित कमियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं. यदि बहस का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो संसद की विचार-विमर्श वाली भूमिका कमजोर पड़ती है.

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पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने क्या कहा?

संसदीय कामकाज का अध्ययन करने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च का कहना है कि संसद वह मंच है जहां सरकार की नीतियों और विधेयकों की विस्तार से जांच होनी चाहिए. संस्था के अनुसार जब संसद का समय लगातार व्यवधानों में चला जाता है, तब सांसद प्रभावी तरीके से मंत्रियों से सवाल नहीं पूछ पाते. इसके अलावा विधेयक या तो बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं या फिर लंबित रह जाते हैं.

पीआरएस का यह भी कहना है कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संसद का उद्देश्य उन्हीं मतभेदों को चर्चा और सहमति के माध्यम से हल करना है.

पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने क्यों जताई थी चिंता?

संसदीय व्यवधानों पर पूर्व उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के पूर्व सभापति एम. वेंकैया नायडू भी पहले चिंता जता चुके हैं.

साल 2021 में राम जेठमलानी स्मृति व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि संसद की कार्यवाही बाधित करना किसी भी सांसद का विशेषाधिकार नहीं माना जा सकता.

उन्होंने कहा था कि सांसदों के विशेषाधिकार इसलिए दिए गए हैं ताकि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र की आवाज संसद तक पहुंचा सकें, न कि सदन की कार्यवाही ठप कर दें.

नायडू के अनुसार लगातार व्यवधान दूसरे सांसदों को भी अपनी बात रखने से रोकते हैं, कानून बनने की प्रक्रिया को धीमा करते हैं और संसद को अपनी संवैधानिक भूमिका निभाने से रोकते हैं.

उन्होंने कहा था कि देश को 'व्यवधान वाली नहीं, बल्कि प्रभावी ढंग से काम करने वाली विधानसभाओं और संसद' की जरूरत है.

संसद की उत्पादकता में गिरावट क्यों चिंता का विषय है?

वेंकैया नायडू ने अपने भाषण में राज्यसभा की उत्पादकता के आंकड़ों का भी उल्लेख किया था.

उनके अनुसार 1978 से 1996 के बीच कई वर्षों में राज्यसभा की उत्पादकता 100 फीसद से भी अधिक रही थी. इसके बाद यह धीरे-धीरे घटने लगी. उन्होंने बताया था कि 2004 से 2014 के बीच उत्पादकता लगभग 78 फीसद रही, जबकि उसके बाद यह घटकर करीब 65 फीसद तक पहुंच गई.

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